2 सितंबर
अन्ना हजारे के खास सहयोगी और एक भूतपूर्व (या अभी भी नौकरी में?) आयकर अधिकारी अरविंद केजरीवाल को उनके विभाग से मिले हुए एक नोटिस से खबरें खड़ी हो गई हैं। विभाग ने उनसे नौ लाख रुपए की वसूली निकाली है जिसके पीछे तर्क यह है कि उन्होंने शर्तों के खिलाफ जाकर नौकरी छोड़ी थी। विभाग का यह भी कहना है कि इस भुगतान के बिना अब तक उनका इस्तीफा मंजूर ही नहीं हुआ है और सरकारी नियमों के मुताबिक वे अभी भी नौकरी में हैं। दूसरी तरफ केजरीवाल का कहना है कि उन्होंने कोई नियम नहीं तोड़ा। लेकिन इसके साथ उनका एक बड़ा दिलचस्प तर्क यह है कि नौकरी छोड़कर वे समाज सेवा के काम में लगे थे और विभाग चाहे तो उनसे यह वसूली माफ कर सकता है। यह बड़ा अजीब सा तर्क है और अभी तक आई हुई खबरों में अगर कोई गलतियां नहीं हैं तो यह हैरान इसलिए करता है कि सरकारी नियमों को तोडऩे के बाद किसी रियायत को पाने का तर्क इस देश की जनता अन्ना हजारे की टोली से शायद ही सुनना चाहे। इसके साथ-साथ आज की दूसरी खबर यह है कि अन्ना हजारे के मंच पर रामलीला मैदान में पूरे समय दिखने वाले उनके एक कवि साथी डॉ. कुमार विश्वास छत्तीसगढ़ में जिंदल के एक कार्यक्रम में आए हैं, वे जिंदल के विशेष विमान में सफर कर रहे हैं और जिंदल के गेस्ट हाऊस में ठहरे हुए हैं। यह बात अन्ना हजारे के सभी साथी जानते हैं कि छत्तीसगढ़ में जिंदल का सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ, सच लिखने वाले मीडिया के साथ कैसा सुलूक है और कौन-कौन से नियमों को तोडऩे के लिए जिंदल अदालती कटघरे में मुकदमा झेल रहा है।
कहने को इन तमाम बातों को लेकर कई तर्क दिए जा सकते हैं कि कविता पढऩे तो कोई कहीं भी जा सकता है या सरकार के नियम तोडऩे वालों को रियायत तो कई जगह दी ही जाती है। लेकिन जब पूरे देश के नेताओं और अफसरों को अन्ना की टोली एक साथ कटघरे में खड़ा करते हुए सबको भ्रष्ट, सबको दुष्ट सा साबित करने में रात-दिन एक करती है तो फिर उनके लिए कुछ अधिक कड़े नैतिक पैमाने तो लागू हो ही जाते हैं। गांधी की धोती पर अगर टैक्स चोरी हो तो वह एक अधिक बड़ा अपराध हो जाता है और साधारण लोग तो बिना टैक्स पटाए रात-दिन कई किस्म के सामान खरीदते ही रहते हैं।
इसी दौरान केंद्र सरकार की अलग-अलग जांच एजेंसियां बाबा रामदेव के पीछे हाथ धोकर पड़ी हैं और उन्हें स्कॉटलैंड में तोहफे में मिले एक टापू की जांच शुरू हो गई है और कुछ दूसरे मामले भी देखे जा रहे हैं। वे भी अन्ना की तरह रामलीला मैदान पर बैठकर पूरी की पूरी सरकार को भ्रष्ट कहते हुए उसके खिलाफ एक राष्ट्रीय आंदोलन की बात करते रहे और देश की जनता को सड़कों पर आने को कहते भी रहे। उनके दाएं हाथ, बालकृष्ण, के पासपोर्ट की गलत जानकारी को लेकर जांच चल रही है। इससे परे की अगर बात करें तो तमिलनाडु में पिछली सत्तारूढ़ पार्टी द्रमुक के खिलाफ मौजूदा मुख्यमंत्री जयललिता की सरकार कई किस्म की जांच कर रही है और बड़े-बड़े द्रमुक नेता जमीनों पर कब्जा करने के मामलों में जेल जा रहे हैं। भारतीय राजनीति में एक शब्द का बड़ा इस्तेमाल ऐसे मामलों में होता है-विच हंटिंग। मतलब चुड़ैल का शिकार। अपने विरोधी या प्रतिद्वंद्वी को जांच में उलझाना।
हमारा यह मानना है कि दुर्भावना से झूठे मामले खड़े करना तो अपराध है, लेकिन कोई सरकार के खिलाफ खड़ा है तो क्या इसीलिए उसके खिलाफ कोई कार्रवाई का मामला बनने पर भी चुप रहा जाए? अधिक से अधिक यह कहा जा सकता है कि उस तरह के मामलों में और लोग अगर हैं तो उनके खिलाफ भी कार्रवाई होनी चाहिए। अरविंद केजरीवाल सरकार की एक ऊंची कुर्सी पर बरसों रहे हैं और शायद उन्हें यह जानकारी होगी कि इस तरह इस्तीफा देने वाले या अनुबंध करने वाले लोगों के रिटायरमेंट के मामले कई बार बहुत जटिल हो जाते हैं और उनको निपटाने में बरसों लग जाते हैं। छत्तीसगढ़ में इसी किस्म का एक मामला है जिसमें सरकारी नौकरी से सामाजिक क्षेत्र में काम करने के लिए गए हुए एक आईएएस अफसर और अरविंद केजरीवाल जैसे ही दिल्ली के मोर्चों पर सक्रिय हर्षमंदर का इस्तीफा मंजूर होने और उन्हें पेंशन मिलने में शायद इस राज्य में पांच-दस बरस लग गए थे। इसलिए किसी एक को मिले नोटिसों को हम सीधे-सीधे दुर्भावना से जोडऩे के बजाय, नैतिकता और ईमानदारी का झंडा लेकर चलने वालों से पहले यह उम्मीद करेंगे कि वे किसी सरकारी रियायत की अपील करने या उसका हक जताने के बजाय अपने-आपको ऐसी नौबत से पूरी तरह बाहर साबित करें। हम न तो बाबा, अन्ना या केजरीवाल के भ्रष्टाचार के खिलाफ, सरकार के खिलाफ, नेताओं के खिलाफ आंदोलन को गलत समझते और न ही ऐसे आंदोलनकारियों के खिलाफ सरकार की सामान्य कार्रवाई को। जब किसी से भेदभाव करते हुए सिर्फ आंदोलनकारियों पर कार्रवाई हो तो वे इस बात की शिकायत कर सकते हैं। लेकिन छत्तीसगढ़ में हमने देखा है कि हर्षमंदर नाम के जिस अफसर ने गुजरात के दंगों में अटल सरकार की चुप्पी का तर्क देते हुए आईएएस से इस्तीफा दिया था उसने भी इस राज्य की सरकार से इस्तीफा मंजूर होने में बरसों लगने पर भी किसी राजनीतिक बदनीयत का आरोप नहीं लगाया था। इसलिए हम हर किस्म की सरकारी कार्रवाई को सीधे-सीधे बदला मानने के बजाय लोगों से यह उम्मीद करते हैं कि वे अपने-आपको पाक-साफ, बेकसूर साबित करके दिखाएं या फिर कम से कम इतना तो साबित करके दिखाएं कि उनके किस्म का बदला किसी भी और से नहीं लिया जा रहा है और उन्हें अकेले घेरकर मारा जा रहा है।
अन्ना हजारे के खास सहयोगी और एक भूतपूर्व (या अभी भी नौकरी में?) आयकर अधिकारी अरविंद केजरीवाल को उनके विभाग से मिले हुए एक नोटिस से खबरें खड़ी हो गई हैं। विभाग ने उनसे नौ लाख रुपए की वसूली निकाली है जिसके पीछे तर्क यह है कि उन्होंने शर्तों के खिलाफ जाकर नौकरी छोड़ी थी। विभाग का यह भी कहना है कि इस भुगतान के बिना अब तक उनका इस्तीफा मंजूर ही नहीं हुआ है और सरकारी नियमों के मुताबिक वे अभी भी नौकरी में हैं। दूसरी तरफ केजरीवाल का कहना है कि उन्होंने कोई नियम नहीं तोड़ा। लेकिन इसके साथ उनका एक बड़ा दिलचस्प तर्क यह है कि नौकरी छोड़कर वे समाज सेवा के काम में लगे थे और विभाग चाहे तो उनसे यह वसूली माफ कर सकता है। यह बड़ा अजीब सा तर्क है और अभी तक आई हुई खबरों में अगर कोई गलतियां नहीं हैं तो यह हैरान इसलिए करता है कि सरकारी नियमों को तोडऩे के बाद किसी रियायत को पाने का तर्क इस देश की जनता अन्ना हजारे की टोली से शायद ही सुनना चाहे। इसके साथ-साथ आज की दूसरी खबर यह है कि अन्ना हजारे के मंच पर रामलीला मैदान में पूरे समय दिखने वाले उनके एक कवि साथी डॉ. कुमार विश्वास छत्तीसगढ़ में जिंदल के एक कार्यक्रम में आए हैं, वे जिंदल के विशेष विमान में सफर कर रहे हैं और जिंदल के गेस्ट हाऊस में ठहरे हुए हैं। यह बात अन्ना हजारे के सभी साथी जानते हैं कि छत्तीसगढ़ में जिंदल का सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ, सच लिखने वाले मीडिया के साथ कैसा सुलूक है और कौन-कौन से नियमों को तोडऩे के लिए जिंदल अदालती कटघरे में मुकदमा झेल रहा है।
कहने को इन तमाम बातों को लेकर कई तर्क दिए जा सकते हैं कि कविता पढऩे तो कोई कहीं भी जा सकता है या सरकार के नियम तोडऩे वालों को रियायत तो कई जगह दी ही जाती है। लेकिन जब पूरे देश के नेताओं और अफसरों को अन्ना की टोली एक साथ कटघरे में खड़ा करते हुए सबको भ्रष्ट, सबको दुष्ट सा साबित करने में रात-दिन एक करती है तो फिर उनके लिए कुछ अधिक कड़े नैतिक पैमाने तो लागू हो ही जाते हैं। गांधी की धोती पर अगर टैक्स चोरी हो तो वह एक अधिक बड़ा अपराध हो जाता है और साधारण लोग तो बिना टैक्स पटाए रात-दिन कई किस्म के सामान खरीदते ही रहते हैं।
इसी दौरान केंद्र सरकार की अलग-अलग जांच एजेंसियां बाबा रामदेव के पीछे हाथ धोकर पड़ी हैं और उन्हें स्कॉटलैंड में तोहफे में मिले एक टापू की जांच शुरू हो गई है और कुछ दूसरे मामले भी देखे जा रहे हैं। वे भी अन्ना की तरह रामलीला मैदान पर बैठकर पूरी की पूरी सरकार को भ्रष्ट कहते हुए उसके खिलाफ एक राष्ट्रीय आंदोलन की बात करते रहे और देश की जनता को सड़कों पर आने को कहते भी रहे। उनके दाएं हाथ, बालकृष्ण, के पासपोर्ट की गलत जानकारी को लेकर जांच चल रही है। इससे परे की अगर बात करें तो तमिलनाडु में पिछली सत्तारूढ़ पार्टी द्रमुक के खिलाफ मौजूदा मुख्यमंत्री जयललिता की सरकार कई किस्म की जांच कर रही है और बड़े-बड़े द्रमुक नेता जमीनों पर कब्जा करने के मामलों में जेल जा रहे हैं। भारतीय राजनीति में एक शब्द का बड़ा इस्तेमाल ऐसे मामलों में होता है-विच हंटिंग। मतलब चुड़ैल का शिकार। अपने विरोधी या प्रतिद्वंद्वी को जांच में उलझाना।
हमारा यह मानना है कि दुर्भावना से झूठे मामले खड़े करना तो अपराध है, लेकिन कोई सरकार के खिलाफ खड़ा है तो क्या इसीलिए उसके खिलाफ कोई कार्रवाई का मामला बनने पर भी चुप रहा जाए? अधिक से अधिक यह कहा जा सकता है कि उस तरह के मामलों में और लोग अगर हैं तो उनके खिलाफ भी कार्रवाई होनी चाहिए। अरविंद केजरीवाल सरकार की एक ऊंची कुर्सी पर बरसों रहे हैं और शायद उन्हें यह जानकारी होगी कि इस तरह इस्तीफा देने वाले या अनुबंध करने वाले लोगों के रिटायरमेंट के मामले कई बार बहुत जटिल हो जाते हैं और उनको निपटाने में बरसों लग जाते हैं। छत्तीसगढ़ में इसी किस्म का एक मामला है जिसमें सरकारी नौकरी से सामाजिक क्षेत्र में काम करने के लिए गए हुए एक आईएएस अफसर और अरविंद केजरीवाल जैसे ही दिल्ली के मोर्चों पर सक्रिय हर्षमंदर का इस्तीफा मंजूर होने और उन्हें पेंशन मिलने में शायद इस राज्य में पांच-दस बरस लग गए थे। इसलिए किसी एक को मिले नोटिसों को हम सीधे-सीधे दुर्भावना से जोडऩे के बजाय, नैतिकता और ईमानदारी का झंडा लेकर चलने वालों से पहले यह उम्मीद करेंगे कि वे किसी सरकारी रियायत की अपील करने या उसका हक जताने के बजाय अपने-आपको ऐसी नौबत से पूरी तरह बाहर साबित करें। हम न तो बाबा, अन्ना या केजरीवाल के भ्रष्टाचार के खिलाफ, सरकार के खिलाफ, नेताओं के खिलाफ आंदोलन को गलत समझते और न ही ऐसे आंदोलनकारियों के खिलाफ सरकार की सामान्य कार्रवाई को। जब किसी से भेदभाव करते हुए सिर्फ आंदोलनकारियों पर कार्रवाई हो तो वे इस बात की शिकायत कर सकते हैं। लेकिन छत्तीसगढ़ में हमने देखा है कि हर्षमंदर नाम के जिस अफसर ने गुजरात के दंगों में अटल सरकार की चुप्पी का तर्क देते हुए आईएएस से इस्तीफा दिया था उसने भी इस राज्य की सरकार से इस्तीफा मंजूर होने में बरसों लगने पर भी किसी राजनीतिक बदनीयत का आरोप नहीं लगाया था। इसलिए हम हर किस्म की सरकारी कार्रवाई को सीधे-सीधे बदला मानने के बजाय लोगों से यह उम्मीद करते हैं कि वे अपने-आपको पाक-साफ, बेकसूर साबित करके दिखाएं या फिर कम से कम इतना तो साबित करके दिखाएं कि उनके किस्म का बदला किसी भी और से नहीं लिया जा रहा है और उन्हें अकेले घेरकर मारा जा रहा है।
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