19 सितंबर 11
देश के कई हिस्सों से बाढ़ का पानी उतरा नहीं था कि कई राज्यों में भूकंप से तबाही हुई। हालांकि पिछले कुछ महीनों में जापान से लेकर अमरीका तक कुदरत की जैसी मार इंसानों पर पड़ी है उसके मुकाबले भारत का अभी का नुकसान कुछ कम है लेकिन इस मौके पर इस देश में दो बातों पर सोचना जरूरी है। एक तो यह कि ऐसे मौके पर बचाव के लिए लोगों और सार्वजनिक सुविधाओं, निजी क्षमता का कैसे इस्तेमाल हो सकता है और पल भर में इसकी जानकारी के लिए किस तरह की तैयारी सरकार के स्तर पर करनी चाहिए। दूसरी बात यह कि इस देश में धर्म और आध्यात्म के नाम पर जिस तरह से लोगों की जेब से पैसा निकलता है, वह मुसीबत के वक्त गरीबों और घायलों के लिए भी निकलना चाहिए। ईसाई धर्म प्रचारकों और चर्च से नफरत करने वाले लोग भी यह मानते हैं कि भारत के सबसे पिछड़े हुए आदिवासी इलाकों में अगर इलाज और पढ़ाई का ढांचा खड़ा हो पाया तो वह सिर्फ अंगे्रजों के राज में चर्च के मार्फत हो पाया। और चर्च को यह पैसा भारत के ईसाईयों से नहीं मिला, बल्कि दुनिया के उन देशों से यह पैसा आया जहां लोगों को दान देने की एक आदत है। भारत में देखें तो हिंदू या जैन मठ-मंदिरों का पैसा बहुत ही कम समाज के काम आता है। धर्म के अपने ही लोगों के धार्मिक कामकाज पर अगर खर्च होता है तो उससे समाज का क्या फायदा? एक प्रतिमा के ऊपर अगर सौ किलो सोना चढ़ाया जाता है और वह सलाखों में कैद पड़े रहता है तो उससे किसका भला होता है? अभी सुप्रीम कोर्ट तक यह मामला चल ही रहा है कि किस तरह केरल के एक मंदिर के ट्रस्टी उस मंदिर के खजाने के कमरों को खोलने तक देने के लिए तैयार नहीं हैं। हमारे हिसाब से किसी ईश्वर को दौलत पर बिठाकर रखना आमतौर पर ईश्वर के नाम से जुड़ी हुई नसीहतों का बहुत बुरा अपमान है। जब तक इस दुनिया के दुख-तकलीफ को दूर करने के लिए ऐसी दौलत का इस्तेमाल न हो, तब तक, अगर कहीं कोई ईश्वर है तो, और अगर वह सुख-दुख को समझता है, तो वह ऐसी किसी दौलत पर चैन से सो नहीं सकता जो कि लाखों जिंदगियों को बचाने के काम आ सकती है।
हिंदुस्तान जैसे बड़े देश में हर बरस बहुत सी प्राकृतिक विपदाएं आती ही रहती हैं और कई दूसरे किस्म के हादसे भी होते हैं जिनमें सरकार की मदद मुसीबत के मारे लोगों के लिए काफी नहीं होती। ऐसे में यहां के लोगों की यह सभी किस्म की जिम्मेदारी है कि वे भरोसेमंद समाजसेवी ट्रस्ट पहचानकर उनके मार्फत लोगों की मदद का काम करें। हम कुछ बरस पहले तक प्रधानमंत्री राहत कोष की सिफारिश करते थे लेकिन पिछले दो-तीन बरसों में प्रधानमंत्री की नजरों के नीचे इस देश को जिस तरह से लूटा गया है उसके बाद अब हम यह नहीं चाहते कि लोगों का दिया गया दान भी कलमाडिय़ों के पेट में जाए। इसलिए लोग सीधे-सीधे मदद करें, अपने खुद के भरोसेमंद संगठन खड़े करें या मदद का कोई और रास्ता देखें। लेकिन अपनी न्यूनतम जरूरत से अधिक कमाने वाले लोग अगर अपनी जरूरतों को पूरा कर लेने के बाद बची कमाई का एक हिस्सा तय करके सबसे गरीबों को नहीं देते तो वे इंसान के रूप में इस धरती पर भी रहने के हकदार नहीं हैं, और यह उनका ईश्वर तय करे कि वे उसके मंदिर-मस्जिद में जाने लायक हैं या नहीं।
दूसरी बात यह कि समाज के लोगों की मदद करने की क्षमता का इस्तेमाल सरकार अगर ऐसे मौकों पर नहीं कर पाती तो हम इसे एक बहुत बड़ी नाकामयाबी मानेंगे। राहत के लिए, बचाव और मदद के लिए अगर स्वयंसेवकों को पहले से लिस्ट बनाकर तैयार करके रखा जाए, उनके हुनर, उनकी क्षमता, उनके साधन की लिस्ट बनाकर उसे तुरंत इस्तेमाल में लगाने की योजना बनाई जाए तो बहुत सी जिंदगियां बच सकती हैं। आज भारत में जहां आबादी है वहां पर औसतन हर चार-छह लोगों के बीच एक टेलीफोन है। ऐसे में पल भर में लोगों तक पहुंचा जा सकता है और ऐसे लोगों की कमी नहीं होगी जो उत्साह के साथ थोड़ी बहुत मेहनत करें, खून देने को तैयार हो जाएं, अपनी गाड़ी में कुछ लोगों को अस्पताल तक ढो लें, कुछ लोगों को खाना खिला दें, कुछ के लिए दवाईयां खरीद दें।
आपदा प्रबंधन के लिए हम पहले भी कुछ बार यह सुझा चुके हैं कि हर प्रदेश, जिले और शहर के स्तर पर एम्बुलेंस, अस्पताल, बुलडोजर, क्रेन से लेकर बाकी तमाम साधन और सुविधाओं को नक्शे पर दर्ज करके रखना चाहिए और उनसे जुड़े तमाम लोगों के नंबर-पते रखना चाहिए ताकि तुरंत उन्हें बुलाया जा सके बजाय इसके कि जब आग लगी हो तब कुआं खोदने के लिए कुदाली की दूकान का पता ढूंढा जाए। अब तक ऐसी किसी योजना के बारे में हमें पता नहीं लगा है और अगर जनता की भागीदारी, सार्वजनिक और निजी ढांचे की भागीदारी ऐसी किसी योजना में हुई होती तो वह हमें सुनाई तो पड़ी ही होती। विचार का यह कॉलम बहुत अधिक तकनीकी बातों को लिखने का नहीं होता, लेकिन ऐसी तैयारी के बारे में चर्चा होनी चाहिए।
देश के कई हिस्सों से बाढ़ का पानी उतरा नहीं था कि कई राज्यों में भूकंप से तबाही हुई। हालांकि पिछले कुछ महीनों में जापान से लेकर अमरीका तक कुदरत की जैसी मार इंसानों पर पड़ी है उसके मुकाबले भारत का अभी का नुकसान कुछ कम है लेकिन इस मौके पर इस देश में दो बातों पर सोचना जरूरी है। एक तो यह कि ऐसे मौके पर बचाव के लिए लोगों और सार्वजनिक सुविधाओं, निजी क्षमता का कैसे इस्तेमाल हो सकता है और पल भर में इसकी जानकारी के लिए किस तरह की तैयारी सरकार के स्तर पर करनी चाहिए। दूसरी बात यह कि इस देश में धर्म और आध्यात्म के नाम पर जिस तरह से लोगों की जेब से पैसा निकलता है, वह मुसीबत के वक्त गरीबों और घायलों के लिए भी निकलना चाहिए। ईसाई धर्म प्रचारकों और चर्च से नफरत करने वाले लोग भी यह मानते हैं कि भारत के सबसे पिछड़े हुए आदिवासी इलाकों में अगर इलाज और पढ़ाई का ढांचा खड़ा हो पाया तो वह सिर्फ अंगे्रजों के राज में चर्च के मार्फत हो पाया। और चर्च को यह पैसा भारत के ईसाईयों से नहीं मिला, बल्कि दुनिया के उन देशों से यह पैसा आया जहां लोगों को दान देने की एक आदत है। भारत में देखें तो हिंदू या जैन मठ-मंदिरों का पैसा बहुत ही कम समाज के काम आता है। धर्म के अपने ही लोगों के धार्मिक कामकाज पर अगर खर्च होता है तो उससे समाज का क्या फायदा? एक प्रतिमा के ऊपर अगर सौ किलो सोना चढ़ाया जाता है और वह सलाखों में कैद पड़े रहता है तो उससे किसका भला होता है? अभी सुप्रीम कोर्ट तक यह मामला चल ही रहा है कि किस तरह केरल के एक मंदिर के ट्रस्टी उस मंदिर के खजाने के कमरों को खोलने तक देने के लिए तैयार नहीं हैं। हमारे हिसाब से किसी ईश्वर को दौलत पर बिठाकर रखना आमतौर पर ईश्वर के नाम से जुड़ी हुई नसीहतों का बहुत बुरा अपमान है। जब तक इस दुनिया के दुख-तकलीफ को दूर करने के लिए ऐसी दौलत का इस्तेमाल न हो, तब तक, अगर कहीं कोई ईश्वर है तो, और अगर वह सुख-दुख को समझता है, तो वह ऐसी किसी दौलत पर चैन से सो नहीं सकता जो कि लाखों जिंदगियों को बचाने के काम आ सकती है।
हिंदुस्तान जैसे बड़े देश में हर बरस बहुत सी प्राकृतिक विपदाएं आती ही रहती हैं और कई दूसरे किस्म के हादसे भी होते हैं जिनमें सरकार की मदद मुसीबत के मारे लोगों के लिए काफी नहीं होती। ऐसे में यहां के लोगों की यह सभी किस्म की जिम्मेदारी है कि वे भरोसेमंद समाजसेवी ट्रस्ट पहचानकर उनके मार्फत लोगों की मदद का काम करें। हम कुछ बरस पहले तक प्रधानमंत्री राहत कोष की सिफारिश करते थे लेकिन पिछले दो-तीन बरसों में प्रधानमंत्री की नजरों के नीचे इस देश को जिस तरह से लूटा गया है उसके बाद अब हम यह नहीं चाहते कि लोगों का दिया गया दान भी कलमाडिय़ों के पेट में जाए। इसलिए लोग सीधे-सीधे मदद करें, अपने खुद के भरोसेमंद संगठन खड़े करें या मदद का कोई और रास्ता देखें। लेकिन अपनी न्यूनतम जरूरत से अधिक कमाने वाले लोग अगर अपनी जरूरतों को पूरा कर लेने के बाद बची कमाई का एक हिस्सा तय करके सबसे गरीबों को नहीं देते तो वे इंसान के रूप में इस धरती पर भी रहने के हकदार नहीं हैं, और यह उनका ईश्वर तय करे कि वे उसके मंदिर-मस्जिद में जाने लायक हैं या नहीं।
दूसरी बात यह कि समाज के लोगों की मदद करने की क्षमता का इस्तेमाल सरकार अगर ऐसे मौकों पर नहीं कर पाती तो हम इसे एक बहुत बड़ी नाकामयाबी मानेंगे। राहत के लिए, बचाव और मदद के लिए अगर स्वयंसेवकों को पहले से लिस्ट बनाकर तैयार करके रखा जाए, उनके हुनर, उनकी क्षमता, उनके साधन की लिस्ट बनाकर उसे तुरंत इस्तेमाल में लगाने की योजना बनाई जाए तो बहुत सी जिंदगियां बच सकती हैं। आज भारत में जहां आबादी है वहां पर औसतन हर चार-छह लोगों के बीच एक टेलीफोन है। ऐसे में पल भर में लोगों तक पहुंचा जा सकता है और ऐसे लोगों की कमी नहीं होगी जो उत्साह के साथ थोड़ी बहुत मेहनत करें, खून देने को तैयार हो जाएं, अपनी गाड़ी में कुछ लोगों को अस्पताल तक ढो लें, कुछ लोगों को खाना खिला दें, कुछ के लिए दवाईयां खरीद दें।
आपदा प्रबंधन के लिए हम पहले भी कुछ बार यह सुझा चुके हैं कि हर प्रदेश, जिले और शहर के स्तर पर एम्बुलेंस, अस्पताल, बुलडोजर, क्रेन से लेकर बाकी तमाम साधन और सुविधाओं को नक्शे पर दर्ज करके रखना चाहिए और उनसे जुड़े तमाम लोगों के नंबर-पते रखना चाहिए ताकि तुरंत उन्हें बुलाया जा सके बजाय इसके कि जब आग लगी हो तब कुआं खोदने के लिए कुदाली की दूकान का पता ढूंढा जाए। अब तक ऐसी किसी योजना के बारे में हमें पता नहीं लगा है और अगर जनता की भागीदारी, सार्वजनिक और निजी ढांचे की भागीदारी ऐसी किसी योजना में हुई होती तो वह हमें सुनाई तो पड़ी ही होती। विचार का यह कॉलम बहुत अधिक तकनीकी बातों को लिखने का नहीं होता, लेकिन ऐसी तैयारी के बारे में चर्चा होनी चाहिए।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें