आजकल

12 सितंबर 2011
सुनील कुमार
लाशों के इस ढेर की खुशबू!
हिंदुस्तान में आज तरह-तरह की कंपनियों के ब्रांड देखने मिलते हैं। लेकिन जो लोग इतिहास के सबसे बड़े हत्यारों के साथ भागीदारी करने वाली कंपनियों से परहेज करना चाहते हैं, उनको ऐसे कुछ ब्रांडों की जानकारी होनी चाहिए। मिसाल के तौर पर ह्यूगो बॉस नाम का ब्रांड भारत के सभी बड़े शहरों में फैशन के सामान और परफ्यूम जैसी चीजें बेचता है।
यह इतिहास में अच्छी तरह दर्ज है कि यह कंपनी जर्मनी में हिटलर की नाजी पार्टी से जुड़ी हुई थी। इसका मालिक नाजी पार्टी का सदस्य था और हिटलर के नौजवान संगठन-हिटलर यूथ, और हिटलर की सेना- एसएस, की वर्दियां बनाता था। इसके साथ-साथ 1930 के दशक में इस कंपनी ने हिटलर के उन दसियों लाख कैदियों की पोशाक भी बनाई जो कि उसके यातना शिविर में मार डाले गए। आज भी यह जर्मन कंपनी मजे से दुनिया भर में धंधा कर रही है। 110 देशों में 6 हजार से अधिक जगहों पर इसकी दूकानें हैं। इसके अलावा इस कंपनी ने कुछ दूसरी कंपनियों को अपने ब्रांड से सामान बनाने का लायसेंस भी दिया है जिसमें सैमसंग भी है जो कि सेलफोन बना रहा है। प्रॉक्टर एंड गैम्बल प्रेस्टिज नाम की कंपनी इत्र और शरीर पर लगाने के कुछ दूसरे सौंदर्य प्रसाधन इसी नाम से बनाती है। यहां पर दी गई यह तस्वीर उसके आज के सामान की है और 1934-35 में दिए गए एक इश्तहार की है कि वह नाजी फौजों के लिए वर्दियां बनाता है। अब इस कंपनी के सामान खरीदने वाले यह जान लें कि हिटलर की नाजी फौज ने एक करोड़ से अधिक लोगों की मौत का सामान किया था।
लेकिन जब हम लोगों से यह उम्मीद करते हैं कि घोषित रूप से जो लोग इतिहास के बड़े-बड़े जुर्म से जुड़े रहे हैं, उनके कारोबार को फायदा पहुंचाने के बजाय वे ऐसे दूसरे सामानों के बारे में सोचें जिनके पीछे कोई मुजरिम जुड़ा नहीं रहा है। लेकिन यह बात पूरी तरह, और बुरी तरह अनसूनी रह जाती है। लोगों की सेहत पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उनके कोका-कोला जैसे गैरजरूरी और नुकसानदेह सामान को पीने से अमरीका तक उसकी कमाई का जो हिस्सा पहुंचता है उससे वह दुनिया के बेकसूरों को मारने के लिए बम और गोलियां बना लेता है।
पिछले कुछ हफ्तों में हिन्दुस्तान के मीडिया के एक हिस्से ने ऐसी खुशफहमी खड़ी कर दी है कि इस देश की जनता एकदम से बेइंसाफी और बेईमानी के खिलाफ चौकन्नी हो गई है और आजादी की एक दूसरी लड़ाई के लिए कमर कसकर खड़ी है। आने वाले दिन इस बात को बताएंगे कि टेलीविजन चैनलों के रात-दिन डटे हुए कैमरों के सामने शोहरती-शहादत का मौका गर न रहे तो लेंस में झांकते ऐसे लोग कितनी लड़ाई लड़ेंगे? फिर भी हम कुछ वक्त की जागरूकता को आगे बढ़ाने के हिमायती हैं। क्या आज हिन्दुस्तान में जिस-जिस कंपनी के खिलाफ बेईमानी और रिश्वत देने, तरह-तरह के जुर्म करने के मामले सामने आते हैं, उनके सामानों के इस्तेमाल से बचने की कोशिश लोग कर सकते हैं?
पिछले दिनों जब अन्ना हजारे के अनशन का मामला चल रहा था तब टीवी चैनलों पर देश के एक बड़े कारोबारी और उससे भी अधिक इज्जतदार समझे जाने वाले नारायण मूर्ति ने कहा था कि कोई विधेयक तो ठीक है लेकिन डेविल इज इन डिटेल्स। मतलब यह कि असली झंझट तो किसी कानून की बारीकियों में रहती है, उसके अमल में रहती है। यही बात हम भारत की जनता में आई हुई समझी जा रही जागरूकता को लेकर कहेंगे कि टीवी कैमरों से परे जब रोज की असल जिंदगी में कसौटी पर हिंदुस्तानियों को कसा जाएगा तो समझ आएगा कि उनकी जागरूकता अमल भी हो रही है या नहीं।
यह कोई नया मुद्दा नहीं है, लेकिन मेरी पसंद का है और मुझे लगता है कि सामाजिक जागरूकता के लिए बहुत बार कोशिशें करनी पड़ती हैं जिनके तहत बहुत बार ऐसे कॉलम में या अखबार के संपादकीय में, और अब इन दिनों इंटरनेट पर ट्विटर या फेसबुक जैसी सोशल नेटवर्किंग वेबसाईटों पर बार-बार चर्चा छेडऩी पड़ती है। अपने बहुत से ऐसे नामी-गिरामी दोस्तों और पहचान वालों के लिखे हुए में जब आम आदमी में ही आम औरत को भी शामिल कर लिया जाता है तो वहां उन्हें टोककर और रोककर मैं कई लोगों की नाराजगी भी झेलता हूं, लेकिन कई लोग अपनी आगे की बातों में आदमी औरत के बराबरी के हक की इज्जत करना शुरू कर देते हैं।
इतिहास में दर्ज कुछ और बातें जो अभी-अभी फिर से पढऩे मिलीं वे बताती हैं कि हिटलर के उस भयानक दौर की जितनी तस्वीरें आज देखने मिलती हैं वे तमाम कोडक कंपनी के कैमरों से ली गई थीं, जिन्हें कि इस कंपनी ने नाजी राज को मुफ्त में दिया था। लोग अगर इंटरनेट पर देखें तो लाशों के ढेर की तस्वीरें और मौत से भी बुरी जिंदगी जी रहे लाखों यहूदियों की तस्वीरें देखी नहीं जातीं। इतिहास बताता है कि कोडक कंपनी की जर्मन ब्रांच ऐसे यातना शिविरों के कैदियों को बंधुआ मजदूरों की तरह इस्तेमाल करके सामान बनाती थी। और इस कंपनी के नाजियों से बहुत गहरे रिश्ते रहे।
इसी तरह फोर्ड, आईबीएम, जेपीमोर्गन जैसी कंपनियां दुनिया के सबसे बड़े हत्यारों, नाजियों के बहुत बड़े मददगार रहे हैं। जेपीमोर्गन नाजी पार्टी को फायनांस करने वाली एक बड़ी बैंक थी।
मैंने पहले भी कई बार यह लिखा है कि हिंदुस्तानियों में जिम्मेदारी के अहसास का हाल यह है कि भोपाल गैस त्रासदी के लिए जिम्मेदार हत्यारी अमरीकी कंपनी यूनियन कार्बाइड के बनाए एवररेडी सेल के बहिष्कार की बात भी किसी ने नहीं की, जबकि बाजार में उसके दर्जन भर विकल्प मौजूद थे।
इतिहास को खंगालकर देखें तो ऐसी बहुत सी कंपनियां निकलेंगी जिन्होंने इतिहास के सबसे बड़े हत्यारों का साथ दिया है। ऐसा सिर्फ दुनिया के इतिहास में हो यह जरूरी नहीं, भारत में भी बहुत सी कंपनियां हत्यारों के साथ हैं। अब सवाल यह है कि चौकस हो चुकी समझी जा रही भारतीय जनता बुरे का बायकॉट करेगी या फिर अन्ना हजारे की तरह विलासराव (आदर्श घोटाला फेम) देशमुख के हाथों प्रधानमंत्री की चिट्ठियां पाकर और उन्हीं के हाथों जवाब भेजकर खुश रहेगी?

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