विश्वकप फुटबॉल से चुनाव और इम्तिहानों तक सीखा जा सकता है

संपादकीय
27 जून 2018


जब लोग अपने दायरे से परे किसी दूसरे दायरे के तजुर्बे और उसकी मिसालों से कुछ सबक लेना जानते हैं, तो वे कई तरह की चूक करने से बचते हैं। अब जैसे इन दिनों चल रहे विश्वकप फुटबॉल को ही लें, तो उसमें दुनिया के एक बड़े फुटबॉल सितारे, अर्जेंटीना के मेसी अब तक के खराब और निराशाजनक खेल को देखकर उसके प्रशंसक स्टेडियम में ही रोते हुए दिखे हैं। इसी खिलाड़ी का एक भारतीय प्रशंसक दक्षिण भारत में निराश होकर घर छोड़कर चले गया था, और पुलिस उसकी तलाश कर रही थी कि कहीं वह कोई खतरनाक कदम न उठा ले। दूसरी तरफ मेसी का देश अर्जेंटीना दुनिया की बाकी टीमों के मुकाबले नीचे खिसक गया है, और लोग इस पर हैरान हैं। हालांकि अभी मैच आधे ही हुए हैं, और बाकी नजारा सामने आना बाकी है। 
लेकिन दुनिया की सबसे अच्छी टीमों, और सबसे अच्छे खिलाडिय़ों के सामने भी यह एक चुनौती रहती है कि किस मुकाबले में उनके सामने कौन हैं। कई बार कोई खिलाड़ी या कोई टीम अपने खुद के पिछले प्रदर्शन के मुकाबले खुद को बहुत बेहतर कर लेते हैं, और अपने ही पिछले बरसों के मुकाबले अपनी तुलना करके खुश और संतुष्ट रहते हैं। लेकिन किसी भी मुकाबले में कोई चौंकाने वाले नए खिलाड़ी या नई टीमें आ सकती हैं, या कि जैसे दुनिया के बड़े-बड़े मुकाबलों के बीच में भी संभावित विजेता के जख्मी हो जाने से मुकाबला एकदम ही बदल जाता है, ऐसे में नतीजे उम्मीदों से बिल्कुल अलग भी हो जाते हैं। इसे चिकित्सा विज्ञान के साथ जोड़कर देखें, तो कहीं-कहीं मुर्दा घोषित किए जा चुके लोग चीरघर पहुंचकर उठकर जिंदा बैठ जाते हैं, या कि मरघट की लकडिय़ों पर सज जाने के बाद भी उनमें जान लौट आती है। 
अब राजनीति की अगर बात करें, तो हर चुनाव खेल के किसी फाइनल मुकाबले जैसा भी होता है, जिसमें उम्मीदवार या पार्टी अपने आपको पिछले चुनाव के मुकाबले बेहतर बनाकर अधिक कामयाबी की उम्मीद करते हैं। लेकिन हर चुनाव में लोगों या पार्टियों के सामने प्रतिद्वंद्वी बदल भी जाते हैं, और स्थितियां तो ऐसी होती हैं कि वे आखिरी पल तक बदल जाती हैं। अब जैसे अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के रहते हुए जब चुनाव हुए तो पूरे देश में ऐसा लगता था कि एनडीए का नारा, इंडिया शाइनिंग, एक हकीकत है, और अटल सरकार को दुबारा आने से भला कौन रोक सकते थे। लेकिन एनडीए की उम्मीदों पर पानी फिर गया, और यूपीए को मानो छप्पर फाड़कर नतीजे मिले। ऐसे में मनमोहन सिंह की सरकार का पहला कार्यकाल देश के अधिकतर लोगों की उम्मीद से परे का था। 
चाहे विश्वकप हो, चाहे विंबलडन, और चाहे अमरीका या हिन्दुस्तान के चुनाव। इन सबकी पिछली मिसालों से तुलना की एक सीमा रहती है, और उससे परे जाकर नतीजों की भविष्यवाणी करना न मुमकिन होता है, और न ही जायज होता है। लोगों को अपनी तैयारी से परे भी इस बात के लिए तैयार रहना चाहिए कि मुकाबले में जो लोग रहेंगे उनकी आस्तीन में तुरुप के कुछ ऐसे पत्ते हो सकते हैं जो आज दिख न रहे हों, और कुछ ऐसी नौबतें आ सकती हैं जो कि किसी की भी कल्पना से परे की हों। अब जैसे हिन्दुस्तान के 1984 के आम चुनाव देखें तो उस नौबत के पहले किसने यह सोचा था कि इंदिरा गांधी की इस तरह उन्हीं के अंगरक्षक हत्या कर देंगे, और देश पर एक ऐसा चुनाव आ जाएगा जिसमें राजीव गांधी एक ऐतिहासिक बहुमत के साथ सत्ता में आएंगे। इस चुनाव में कांग्रेस को 404 सीटें मिली थीं, और भाजपा उस वक्त दो सीटों पर थी। 
जिस तरह देश के बड़े कॉलेजों में दाखिले के लिए, या कि देश की सबसे बड़ी नौकरियों के लिए लोग अपनी तैयारी को पिछले मुकाबलों के मुकाबले अगर अच्छा मान लेते हैं, और अपनी कामयाबी की गारंटी मान लेते हैं, तो फिर हो सकता है कि वे दूसरों की तैयारी को और अप्रत्याशित पर्चों की आशंका को अनदेखा कर रहे हैं। असल जिंदगी की हकीकत यह कहती है कि लोगों को दूसरे दायरों से कुछ सीखना चाहिए, अपने खुद के पिछले रिकॉर्ड से परे भी कुछ सोचना चाहिए, अपने आपमें किए गए सुधार को सब कुछ नहीं मान लेना चाहिए, और आने वाले किसी मुकाबले के लिए किसी अप्रत्याशित बात की संभावना या आशंका को नकारना नहीं चाहिए। अब इससे जो लोग सबक लें, वे ले लें, और जो न लें, उनके लिए तो हार के पहले तक इंडिया को शाईन करता हुआ माना ही जा सकता है। (Daily Chhattisgarh)

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन पंचम दा - राहुल देव बर्मन और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार। ।

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