संपादकीय
1 मार्च 2013
बांग्लादेश में एक इस्लामी नेता को अदालत से सुनाई गई मौत की सजा के बाद वहां पर जितने बड़े पैमाने पर हिंसा फैली है उसमें दर्जनों लोग मारे गए हैं। दूसरी तरफ पाकिस्तान में तालिबानों से लेकर दूसरे किस्म के आतंकी और उग्रवादी लगातार लोगों को मार रहे हैं, और इतने बड़े पैमाने पर अराजकता है कि वह पाक सरकार के काबू से बाहर की दिख रही है। भारत अपने-आपमें नक्सल आतंक से लेकर दूसरे किस्मों के आतंक तक बहुत सी हत्याएं झेल रहा है। और आंकड़ों के हिसाब से भारत आतंक-हत्याओं में दुनिया में तीसरे-चौथे नंबर पर है। पाकिस्तान की कुछ अलग खबरों में यह भी है कि वहां के हिंदू अल्पसंख्यकों को लगातार मारा जा रहा है। एक चौथी खबर म्यांमार की यह है कि वहां पर मुस्लिम आबादी को बुरी तरह से मारा जा रहा है और वहां से भागे हुए लोगों की एक बोट पर बड़े पैमाने पर मारे जाने की खबर हमने दो-चार दिन पहले ही पहले पन्ने पर छापी थी। भारत में तमिलनाडु से लेकर दिल्ली तक आज जो बात गूंज रही है, वह है श्रीलंका में तमिलों को मारने की। इसके पीछे भी धर्म और जाति का कम या अधिक हाथ तो था ही।
कुल मिलाकर हिंद महासागर में यह इलाका बहुत भयानक आतंक से गुजरते दिख रहा है, और इसकी वजह से इन सारे देशों में बहुत सा खर्च चौकसी और हिफाजत के लिए हो रहा है, बहुत बड़े पैमाने पर सुरक्षा की तैयारियां करनी पड़ रही हैं, हिंसा के बाद जांच और कार्रवाई, जेल और अदालत पर बहुत सा खर्च हो रहा है। और ये सारे के सारे देश बुरी तरह की गरीबी और कुपोषण के शिकार हैं, भूख के शिकार हैं। इसके साथ-साथ जब आतंक और हिंसा की वजह देखें तो नक्सल हिंसा को छोड़कर बाकी सारी हिंसा धर्म से उपजी हुई हैं। एक धर्म का दूसरे से हिसाब चुकता करना, किसी एक धर्म के भीतर की कट्टरता के चलते उसी धर्म के दूसरे संप्रदाय को थोक में मारना। पाकिस्तान में शिया लोगों पर बड़े पैमाने पर जो जानलेवा हमले हो रहे हैं, और सैकड़ों शिया मारे जा रहे हैं, वह ऐसी ही एक मिसाल है। दूसरी तरफ धर्म लोगों को न्याय और तर्क की जमीन से उखाड़कर मंदिर-मजिस्द जैसी जगहों पर ले जाकर रोप देते हैं, और फिर कट्टरता, धर्मांधता और हिंसा की फसल लहलहाने लगती है। जब कभी हमारी तरह के लोग धर्म को ऐसी हिंसा के पीछे जिम्मेदार करार देते हैं, तो तुरंत ही इन धर्मों के कुछ लोग अपने-अपने धर्मों की किताबों में दर्ज अमन की कुछ नसीहतों को निकालकर यह साबित करने में जुट जाते हैं कि धर्म तो अच्छे हैं, उनको मानने वाले लोग खराब हो सकते हैं। लेकिन जब धर्म के नाम पर इन लोकतांत्रिक देशों के भीतर लोकतंत्र को खारिज करके हिंसा की जाती है, तो फिर वह किताबों में दर्ज नसीहतों से बहुत ऊपर चली जाती हैं। गांधी की हत्या से लेकर बाबरी मजिस्द को गिराने तक, और गोधरा में ट्रेन जलाने से लेकर गुजरात के दंगों तक, और आज हिंदुस्तान में जगह-जगह हो रहे आतंकी धमाकों तक, इन सबके पीछे सिवाय मजहब और क्या है? धर्म अपने-आपमें खड़े होकर अपने अनुयायियों को तो रोक नहीं सकते, धर्म ने अपने-आपको बनाया भी नहीं है, ईश्वर की धारणा को भी किसी ईश्वर ने नहीं बनाया है, इन सबको इंसानों ने गढ़ा है, और वे ही इंसान आज अपने बनाए झंडों-डंडों को लेकर दूसरे मजहब के लोगों के सिर तोड़ रहे हैं। इसलिए धर्म पर न तो अपने-आपको बनाने की तोहमत लग सकती, न ही आज की हिंसा के पीछे उसे कुसूरवार ठहराया जा सकता है। धर्म जिनका गढ़ा हुआ है, वे आज दूसरों को मार रहे हैं, इसलिए इंसानों का बनाया हुआ धर्म उनके जुर्मों की वजह बन गया है, और इस नजरिए से वह जुर्म में इस्तेमाल होने वाले किसी हथियार जितना जिम्मेदार तो है ही।
धर्म का सारा मिजाज ही न्याय और लोकतंत्र के खिलाफ होता है। धर्म बराबरी के भी खिलाफ होता है। धर्म दूसरे धर्मों के भी खिलाफ होता है, और तरह-तरह के टकराव को सही बतलाता है। इसलिए धर्मग्रंथों की कुछ कतरा-कतरा, सतही तौर पर अच्छी लगने वाली बातों से कांटों का यह गुलदस्ता गुलाब नहीं हो जाता। अब वक्त आ गया है कि लोग यह सोचें कि धर्म से दुनिया को मिल क्या रहा है, और उससे छिन क्या रहा है। धर्म को लाइब्रेरी या संग्रहालय में रखे गए सिर्फ एक दस्तावेज की तरह नहीं देखा जा सकता, क्योंकि उसका दखल रोज की जिंदगी में बहुत खूनी हो चुका है। और लोगों को अपनी धार्मिक आस्था और सामाजिक और सार्वजनिककरण के बारे में फिर से सोचना चाहिए। किसी भी तरह की आधुनिक औपचारिक पढ़ाई-लिखाई लोगों को कट्टरता से बाहर नहीं ला पा रही है। लोगों के डिग्री के वक्त पहने गए लबादे इतने मोटे नहीं होते कि उनकी हिंसा उन लबादों के भीतर दबी रह जाए। एक वक्त अनपढ़ लोगों को आतंक और हिंसा के लिए जिम्मेदार मान लिया जाता था, लेकिन आज तो पूरी दुनिया में बहुत पढ़े-लिखे लोग ही धार्मिक आतंक के लिए जिम्मेदार हैं, नफरत और कट्टरता के लिए जिम्मेदार हैं। धर्म पर आज अगर यह सोचा नहीं जाएगा कि उनकी कितनी खूनी भूमिका समाज में होनी चाहिए, तो यह तो बड़ा अधर्म हो जाएगा...

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