मनमोहन-सोनिया माफीनामों के खाली पर्चे छपवाकर रखें

संपादकीय
21 मार्च 2013
केन्द्र की यूपीए सरकार के बारे में लिखने को अब कुछ नया अधिक बचा नहीं है। कल उसका साथ छोड़कर जाने वाली डीएमके के नेता के परिवार पर आज सुबह सीबीआई के छापे पड़े और डीएमके के लोग जितना कुछ कहें, उससे अधिक यूपीए सरकार को कहना पड़ा। तमिलनाडू की राजनीति से आए केन्द्रीय वित्त मंत्री पी.चिदम्बरम ने सीबीआई की इस कार्रवाई को गलत समय पर किया गया कहा, और खुद होकर यह माना कि इससे एक गलत तस्वीर बनी है। दूसरी तरफ प्रधानमंत्री ने सीबीआई की इस कार्रवाई को गलत वक्त पर किया हुआ कहा है। उन्होंने कहा है कि यह छापा नहीं पडऩा था और सरकार पता लगाएगी कि इसके पीछे कौन है। 
हमने कुछ समय पहले यह लिखा था कि यूपीए सरकार को मानो किसी डॉक्टर ने एक पर्चा लिखकर दिया है कि दिन में तीन बार वह कोई न कोई भयानक बड़ी गलती करे। इसलिए आज वह इसी अंदाज में काम करते हुए अपने पिछले दो साल गुजार चुकी है, और अगला एक साल इसी तरह गुजारने जा रही है। इस सरकार को हर वक्त मदद करने वाला मुलायम सिंह यादव को बेमौके, बिना वजह खुलकर गालियां बकने वाले केन्द्रीय मंत्री बेनीप्रसाद वर्मा की माईक की आवाज गूंजना अभी बंद हुआ भी नहीं था, कि इस सरकार को डीएमके के जाने के बाद समाजवादी पार्टी की जरूरत आन पड़ी है। और इस नौबत के आने के बाद भी यह केन्द्रीय मंत्री डंके की चोट पर खुलकर बोलता रहा कि वह माफी नहीं मांगेगा। पूरी की पूरी कांग्रेस पार्टी और यूपीए सरकार बेकाबू दिखती है, बेदिमाग दिखती है, और बदमिजाज भी दिखती है। और इन्हीं विशेषणों को, हर दिन सामने आने वाले नए-नए मामलों के साथ जोड़कर कब तक तो हम लिखते रहें और कब तक हमें पढऩे वाले लोग इसे पढ़ते रहें? आज हालत यह है कि जिस तरह किसी सरकारी कागजात में जानकारी भरने के लिए खाली जगह छूटी रहती है, उसी तरह यूपीए सरकार को अपने माफीनामे छपवाकर रखने चाहिए और रोज सबेरे प्रधानमंत्री उसमें गलत करने वाले अपने मंत्री या नेता का नाम भरें, काम भरें, जिससे माफी मांगनी है उसका नाम भरें, और उसे मीडिया को जारी करें। इससे कम से कम हर दिन मनमोहन सिंह-सोनिया गांधी का खासा वक्त बचेगा और गलत कामों के बाद माफी तेजी से जारी हो सकेगी। 
डीएमके कोई दूध के धुले लोगों की पार्टी नहीं है। उसके भ्रष्टाचार के अनगिनत मामले कटघरों में खड़े हैं। लेकिन कल समर्थन वापिसी और आज सुबह छापे, इससे ऐसे घोषित भ्रष्ट लोगों को भी एक नए किस्म की विश्वसनीयता मिल रही है। और हो सकता है कि यह कार्रवाई जरूरी हो, लेकिन इस कार्रवाई की कोई विश्वसनीयता आज नहीं रह गई है। कुल मिलाकर बात यह है कि इस सरकार के दाएं हाथ को यह नहीं मालूम है कि उसकी बाएं हाथ किसकी जेब काट रहा है, और बाएं हाथ को यह नहीं मालूम है कि इसका दायां हाथ बस में किस महिला को पकड़ रहा है। इस गठबंधन के सिर को नहीं मालूम है कि इसका पैर उसे कहां ले जा रहा है, और इसके पैर को नहीं मालूम है कि इसका सिर इसे कहां ले जाना चाहता है। ऐसे में इस गठबंधन, और खासकर उसकी मुखिया कांग्रेस पार्टी का आज सबसे बड़ा यही हक बनता है कि वह अगले चुनाव में उम्मीदवार बनकर जनता के सामने जा सके। 
इस सरकार को चलाने वाली कांग्रेस पार्टी नरसिंह राव के जमाने से सांसदों की खरीद-फरोख्त में फंसी हुई है, और बाद में लगातार ऐसी चर्चाएं रही हैं कि यह पार्टी सीबीआई का इस्तेमाल करके संसद के भीतर समर्थन जुटाती है। इसके बारे में देश की जनता को ऐसी तमाम चर्चाओं पर भरोसा है, ऐसा हमको लगता है। और इस भरोसे को मजबूत करने के लिए कांग्रेस और यूपीए के नेता खासी मेहनत भी कर रहे हैं, और ओवरटाईम कर रहे हैं। 
सुना है कि नेहरू इस पार्टी के इतिहास से इस्तीफा भेजने वाले हैं।

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