सत्ता के दो केंद्रों की बात

संपादकीय
29 मार्च 2013

दिग्विजय सिंह ने कांग्रेस पार्टी और उसकी अगुवाई वाली यूपीए सरकार के बारे में अभी एक ऐसी बात कही है, जो कि भारतीय राजनीति में कई बार बहस का मुद्दा बनती है। उन्होंने कहा कि सत्ता के दो केंद्र का मॉडल कारगर नहीं रहा। वे कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बारे में बात कर रहे थे। उन्होंने इसी सिलसिले में यह भी कहा कि अगले लोकसभा चुनाव में अगर कांग्रेस सत्ता में आती है, तब राहुल गांधी को किसी को प्रधानमंत्री मनोनीत नहीं करना चाहिए। दिग्विजय सिंह इन दिनों देश में राहुल-लाओ-ब्रिगेड के मुखिया के माने जा रहे हैं, और वे कांग्रेस पार्टी की घोषित नीतियों से, प्रवक्ताओं की कही बातों से परे जाकर भी राहुल गांधी को लेकर बातें कहते हैं। लेकिन अकेले उनकी कही बात पर आज यहां लिखने का हमारा इरादा नहीं है। इसी के साथ-साथ पिछले एक हफ्ते में उत्तरप्रदेश की समाजवादी पार्टी की सरकार के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव पर सबसे कड़ा और बड़ा हमला पार्टी के मुखिया, और कुनबे के मुखिया मुलायम सिंह यादव ने बोला है। उन्होंने अखिलेश सरकार के कामकाज को लेकर जितनी कड़ी बातें कही हैं, उतनी कड़ी बातें तो सपा की खाटी दुश्मन बसपा भी नहीं बोल पाई है। 
मुलायम की बात को अगर देखें, तो अपने ही बेटे, और अपनी ही पार्टी की सरकार से उनकी निराशा कैमरों के सामने फूट पड़ी है। एक तरफ वे पार्टी के मुखिया हैं, और पार्टी की नीतियां तय कर रहे हैं, दूसरी तरफ उनका बेटा सत्ता चला रहा है, जिससे वे खासे नाखुश हैं। इस तरह उत्तरप्रदेश और समाजवादी पार्टी में आज सत्ता के दो केंद्र साफ-साफ हो गए हैं। कांग्रेस और यूपीए में सत्ता के दो केंद्रों की तरफ दिग्विजय ने हमला बोला है। लेकिन इसके ठीक खिलाफ बिहार में अगर देखें तो जनता दल (यूनाइटेड) के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार और पार्टी के मुखिया शरद यादव सत्ता के दो केंद्र बने हुए हैं। केंद्र से लेकर राज्य तक, और एनडीए गठबंधन तक इन दोनों की रीति-नीति में मामूली फर्क दिखता है, लेकिन तालमेल के बीच कोई टकराव नहीं दिखता। 
पार्टी और सरकार इन दोनों के बीच दिग्विजय सिंह के कहे मुताबिक एक इंसान का एकाधिकार होना चाहिए, या फिर अधिकार और जिम्मेदारी के मिले-जुले ऐसे दो केंद्र होने चाहिए? हमारा मानना यह है कि ऐसे दो केंद्र अगर आपसी तालमेल और आपसी समझ के साथ काम कर सकते हैं, तो उससे बेहतर और कुछ नहीं हो सकता। पार्टी और सरकार, इन दोनों की प्राथमिकताएं कई बार अलग-अलग भी हो सकती है, और ऐसे में इन दोनों कुर्सियों पर एक-एक पैर रखकर बैठे हुए इंसान के लिए दोनों जिम्मेदारियों से इंसाफ कर पाना नामुमकिन रहता है। और सत्ता के दो केंद्र कोई अनहोनी बात नहीं है। पश्चिम बंगाल में तीन दशक से अधिक तक रही वाममोर्चे की सरकार में तो कई पार्टियां थीं, और ये सारी पार्टियां अपनी नीतियों को लेकर खासी कट्टर किस्म की ईमानदार पार्टियां थीं। फिर भी इतने दशक तक अपने-अपने संगठन, मोर्चा संगठन, और सरकार सब ठीक से चले। इसी दौरान सीपीएम के ज्योति बाबू के सामने प्रधानमंत्री बनने का मौका भी आया लेकिन उन्होंने पार्टी के ऐतिहासिक-गलत फैसले को मंजूर करते हुए कोलकाता में ही काम जारी रखा। इसलिए दिग्विजय सिंह का कहा हुआ कांग्रेस की उस संस्कृति के हिसाब से तो ठीक लगता है, जहां पर नेहरू-गांधी परिवार को कुल देवी-देवता की तरह पूजा जाता है, और उससे परे कुछ न देखा जाए इसलिए तांगे के घोड़े की तरह आंखों के दोनों तरफ ढक्कन लगा दिए जाते हैं। लेकिन यही कांग्रेस सबसे बड़ा सुबूत है कि मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी के बीच तालमेल की कोई कमी नहीं रही, और सत्ता, संगठन के साथ-साथ गठबंधन भी ठीक से चलता रहा। और आज कांग्रेस पार्टी जितनी मुसीबतें झेल रही है, वे प्रधानमंत्री की खड़ी की हुई नहीं हैं, बल्कि प्रधानमंत्री के चुप रहने से, कांग्रेस और यूपीए के बाकी लोगों की खड़ी की हुई हैं। इन नाकामयाबियों के पीछे सत्ता और संगठन का, अध्यक्ष और प्रधानमंत्री का कोई आपसी टकराव नहीं रहा, यह सब कुछ प्रधानमंत्री के काबू से बाहर रखे गए मामलों में ही हुआ। इसलिए दिग्विजय सिंह का एक ही हाथ में सारी लगाम वाला तर्क ठीक नहीं है। ऐसा तर्क अधिक कामयाब हो सकता है, जैसा कि गुजरात में मोदी हैं, लेकिन ऐसा तर्क लोकतंत्र के हित में नहीं है, और किसी संगठन या गठबंधन के हित में भी नहीं है।
हिन्दुस्तान जैसा बड़ा देश, और आज की गठबंधन की राजनीति के चलते सत्तारूढ़ गठबंधन की मुखिया पार्टी के अध्यक्ष, या गठबंधन के किसी और मुखिया को ही सरकार का बोझ दे देना एक बहुत ही गलत फैसला होगा। जिन लोगों को ऐसे दो सत्ता केंद्रों में दिक्कत लगती है, उनको ऐसे दो केंद्रों को परस्पर सहअस्तित्व के साथ रहना सिखाना चाहिए। 

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