घर, बाहर, कहां मनमोहन?

संपादकीय
30 मार्च 2013
फौजी हुकूमत से धीरे-धीरे लोकतंत्र की तरफ बढऩे जा रहे भारत के पड़ोसी बर्मा, या म्यांमार, में साम्प्रदायिक हिंसा का हाल भयानक है। वहां की बौद्ध आबादी वहां के मुस्लिम अल्पसंख्यकों को थोक में मार रही हैं, और अब तक सैकड़ों लोग मारे जा चुके हैं। देश के कई शहरों में बड़े पैमाने पर दंगे हो रहे हैं, मुस्लिमों की आबादी अपने घरबार जलते देख रहे हैं, और लाखों लोग बेदखल हो चुके हैं। वहां की बौद्ध-हिमायती समझी जाने वाली सरकार पर यह अंतरराष्ट्रीय आरोप भी लग रहे हैं कि वह मुसलमानों के खिलाफ काम कर रही है। भारत के एक दूसरी तरफ इसी तरह लगे हुए बांग्लादेश में हिन्दुओं के खिलाफ इसी तरह की हिंसा हो रही है, और तीसरी तरफ श्रीलंका में तमिल अल्पसंख्यकों के साथ लंबे समय से भेदभाव के आरोप लगते रहे, लेकिन तमिल आतंकी संगठन लिट्टे चूंकि बराबरी से लंबे समय तक हथियारबंद टक्कर लेते रहा, इसलिए उसका मामला कुछ अलग है। चौथी तरफ पाकिस्तान में हिन्दू आबादी के खिलाफ हिंसा लगातार चलती रहती है, और बीच-बीच में ईसाइयों के खिलाफ भी।
ऐसे पड़ोसी देशों के बीच बसे हुए भारत का वजन आज अंतरराष्ट्रीय मामलों में अधिक होना चाहिए था, लेकिन उसकी बात आज बेअसर रह गई है। इस देश की लीडरशिप कारोबार, और कमाई-खर्च के आंकड़़ों, उदार बाजार व्यवस्था की ही समझ रखने वाली रह गई है। एक वक्त था जब नेहरू का दखल दुनिया के तमाम बड़े-बड़े मामलों में होता था। आज भारत के मामलों में दुनिया के कारोबारी देशों, और अमरीका जैसी गुंडा फौजों का दखल रह गया है। पिछले बरसों में दुनिया में चल रही अमरीकी फौजी हमलावर हिंसा के खिलाफ अगर किसी ने भारत के प्रधानमंत्री का मुंह भी खुलते हुए देखा हो, तो वह सिर्फ सपने में हुआ होगा। लेकिन अफगानिस्तान से लेकर इराक तक, और पाकिस्तान तक जो अमरीकी हमले हो रहे हैं, उनसे परे भारत के पड़ोसी देशों में जो घरेलू हिंसा है, उस पर फिक्र जाहिर करने का हौसला तो हिन्दुस्तान में होना चाहिए। भारत के ये पड़ोसी देश ऐसी आबादी वाले हैं, जो धर्म और जातियां भारत में भी बसी हुई हैं। और अंग्रेजों की गुलामी के चलते, भारत और ये सारे पड़ोसी देश खुली आवाजाही वाले थे, इन सबके साथ जनता की रिश्तेदारियां थीं, और  हैं। इसलिए आज भारत ऐसी बड़ी-बड़ी और लगातार चल रही हिंसा के मामले में भी बेजुबान और बेअसर बैठा रहे, तो यह उसकी विदेश नीति और दूरदर्शिता दोनों का दीवालियापन है। आज भारत के इर्द-गिर्द उसकी ऐसी चुप्पी और बेबसी के चलते ही पड़ोस की बड़ी ताकत चीन का दखल बढ़ते चल रहा है और अंतरराष्ट्रीय जुबान में कहा जा रहा है कि यह भारत के गले में चीनी मोतियों की माला जैसा एक घेरा पड़ रहा है। 
श्रीलंका के तमिलों को लेकर भारत के तमिलनाडु में राजनीतिक दल जिस तरह का दबाव केन्द्र सरकार पर बना रहे हैं, उससे परे भी कुछ और सरहदी राज्यों में आगे-पीछे ऐसी नौबत आ सकती है, आ चुकी है। इसलिए भारत को अपने देश के भीतर घरेलू मोर्चे पर भी राज्यों के साथ समझदारी का एक रिश्ता कायम करना पड़ेगा और यह समझ देश के भीतर विकसित करनी होगी कि विदेश नीति किसी राज्य की नीति नहीं हो सकती, उसके लिए देश और दुनिया के व्यापक नजरिये और व्यापक हितों की जरूरत रहती है। लेकिन पड़ोसी देशों के पहले, अपने भीतर के प्रदेशों को समझाने के लिए भी केन्द्र सरकार का ऐसा असरदार और भरोसेमंद मुखिया चाहिए जिसकी बात पर अलग-अलग पार्टियों के नेताओं को भरोसा हो सके, और जिस पर जनता का भी इतना भरोसा हो, कि उसकी बात को सुनना विपक्षी पार्टियों की भी मजबूरी हो। आज नौबत इसके ठीक उल्टे हैं। अपने कुकर्मों से लदी हुई यूपीए सरकार का मुंह घरेलू मोर्चे पर पूरी तरह बंद है, और संसद में अपनी जिंदगी जारी रखने के लिए वह हर प्रदेश और प्रादेशिक पार्टी से समझौतों को बेबस है।
कल जब यह खबर सामने आई कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह यूपीए-3 की सरकार बनने की हालत में, अपने आपको उम्मीदवारी से बाहर घोषित नहीं कर रहे हैं, तो भाजपा ने यूपीए और कांग्रेस के इस भीतरी मामले पर भी खुला बयान दिया कि देश की जनता मनमोहन सिंह को एक बार फिर प्रधानमंत्री देखने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं है। देश की जनता की तरफ से बोलने का कोई ठेका भाजपा को नहीं मिला है, लेकिन रविशंकर प्रसाद की कही हुई यह बात तर्कसंगत लग रही थी, और खुद कांग्रेस के भीतर मनमोहन सिंह अल्पमत में भी नहीं रह गए हैं। इस तरह अंतरराष्ट्रीय मोर्चों से लेकर देश की सरहद तक, और देश की राजधानी में अपनी पार्टी के भीतर तक इस कदर कमजोर हो चुका मुखिया, कम से कम हिन्द महासागर के क्षेत्र में चीन के लिए एक खुला मैदान छोड़ रहा है। विदेश नीति के ऐसे नुकसान पांच-दस बरसों में सामने नहीं आते, लेकिन लंबे समय में इसके लंबे नुकसान पता लगते हैं।

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