संपादकीय
31 मार्च 2013
बिहार ने अभी पिछले हफ्ते ही यह घोषणा की है कि वहां पुलिस भर्ती में महिलाओं को 35 फीसदी आरक्षण दिया जाएगा। और आज एक दूसरी खबर यह है कि देश की पुलिस में महिलाएं कुल 5 (5.33) फीसदी हैं। देश के 15000 पुलिसथानों में से महिला पुलिस थानों की संख्या 499 है। बलात्कार और महिलाओं पर हिंसा के मामलों से लदे हुए उत्तरप्रदेश में पुलिस में महिलाएं डेढ़ फीसदी से कम हैं। सबसे अधिक महिलाएं महाराष्ट्र पुलिस में हैं, करीब 15 फीसदी।
आज की एक तीसरी खबर यह है कि गैंगरेप की चर्चित घटनाओं के बाद भारत आने वाले विदेशी पर्यटकों की संख्या 25 फीसदी घट गई है। विदेशी महिलाओं की बात करें, तो यह आंकड़ा 35 फीसदी है।
इस नौबत को अगर देखें तो ऐसा लगता है कि आज से अगर पुलिस में महिलाओं की भर्ती और तैनाती बढ़ाने का काम तेजी से होगा, तो भी पुलिस विभाग में महिलाओं का अनुपात और संतुलन ठीक होने में शायद आधी सदी लग जाएगी। और महिलाओं पर हिंसा के मामले नए नहीं हैं, इनको लेकर फिक्र भी नई नहीं है, महिला आरक्षण की मांग भी नई नहीं है, और इस देश में अब पढ़ी-लिखी महिलाओं की गिनती भी कम नहीं है। सरकारी नौकरियां इतनी गिनी-चुनी रहती हैं कि वहां पर एक-एक पद के लिए सैकड़ों-हजारों उम्मीदवार रहते हैं, और आज तक यह सुनने में नहीं आया कि किसी पद के लिए महिला उम्मीदवार कम पड़ी हों। ऐसे में हर प्रदेश में खासकर महिलाओं के मामलों को देखने वाले विभागों में महिलाओं के अनुपात को तेजी से बढ़ाना चाहिए। छत्तीसगढ़ के बारे में यह बात कही जा सकती है कि यहां पर सरकारी नौकरी के लिए आवेदन करने वाली महिलाओं की उम्र सीमा को बढ़ाकर पैंतालीस बरस तक किया गया है और तैंतीस फीसदी आरक्षण सरकारी पदों पर महिलाओं के लिए है। इसका मतलब यह है कि बच्चों को बड़ा करने के बाद भी कोई महिला सरकारी नौकरी के लिए अर्जी दे सकती है। लेकिन देश भर में ऐसी पहल की जरूरत भी है, और महिलाओं को अर्जी के लायक बनाने के लिए भी ऐसे विशेष प्रशिक्षण और तैयारी की जरूरत है जैसा कि आज देश-प्रदेश में आदिवासी बच्चों के लिए किया जाता है।
भारत में महिलाओं पर इन दिनों जितने किस्म की हिंसा हो रही है, उससे होने वाला नुकसान देश की सीमाओं के बाहर भी इसकी साख बर्बाद होने की शक्ल में सामने आ रहा है, और आने वाले बरसों में आते भी रहेगा। इससे बचने के लिए बाकी सारे तरीकों के अलावा, एक जरूरत इस बात की भी है कि पुलिस से लेकर वकील तक और जज तक, महिलाओं की तैनाती ऐसे मामलों के लिए हो, और ऐसी महिलाओं की भी एक खास टे्रनिंग हो। भारत में यह बात बहुत आम है कि ताकतवर कुर्सियों पर बैठी हुई महिलाएं भी महिलाओं के हक को नहीं समझ पातीं, क्योंकि हजारों बरस से उनकी दिमागी ट्रेनिंग मर्दों ने ही की हुई है। इसलिए महिला मुद्दों पर, महिला अधिकारों पर सरकारी कुर्सियों पर तैनात महिलाओं में संवेदनशीलता लाने की जरूरत है। फिलहाल छत्तीसगढ़ और बिहार जैसे राज्यों में सरकारी नौकरियों में आरक्षण जो तय किया है, उसे भरने का इंतजाम भी करना होगा। सिर्फ आंकड़ों के इंतजाम से हकीकत नहीं बदल पाएगी। और इन आरक्षित आंकड़ों को संवेदनशील भी बनाना पड़ेगा।

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