मुशर्रफ की वापिसी और, भारत में सोचने की जरूरत

24 मार्च 2013
संपादकीय
पांच बरस बाद पाकिस्तान के फौजी तानाशाह रहे जनरल मुशर्रफ देश लौटे। उनके ये दावे अभी कसौटी पर चढऩे बाकी हैं कि वे ही पाकिस्तान का भला कर सकते हैं, लेकिन यह बात अपनी जगह ठीक है कि आज पाकिस्तान न सिर्फ कट्टरपंथ, आतंकी हिंसा, बदअमनी और भ्रष्टाचार के जिस दौर से गुजर रहा है, उसमें वहां के लोग मौजूदा मुखिया आसिफ अली जरदारी के बजाय दूसरे कई विकल्पों की तरफ देख रहे हैं। भारत के लिए जनरल मुशर्रफ की घरवापिसी के तुरंत कोई मायने चाहे न निकल रहे हों, लेकिन भारत की विदेश नीति में, भारत की फौजी तैयारियों में यह हाल के बरसों की शायद एक सबसे बड़ी घटना है, और इस पर दिल्ली में आज बारीकी से नजर रखी जा रही होगी।
लेकिन हम यहां आज मुशर्रफ के आने से पाकिस्तान में पडऩे वाले फर्क पर अधिक सोचना या बात करना नहीं चाहते, यह जरूर चर्चा करना चाहते हैं कि सत्ता पर काबिज किसी ताकत के पूरी तरह नाकामयाब और गैर भरोसेमंद साबित हो जाने पर लोग किस तरह दूसरे रास्तों की तरफ देखने लगते हैं। पाकिस्तान में वैसे तो लोकतंत्र उस देश के बनने के बाद से अब तक जड़ें जमा नहीं पाया, लेकिन इसका मौका कई पार्टियों को, और कई नेताओं को कुछ बार तो मिला ही। उनकी नाकामयाबी के बाद ही फौजी तानाशाही वहां सत्ता पर आ सकी, और मानो इस फौजी तानाशाही को भी शिकस्त देते हुए वहां की कुछ खुफिया ताकतें इस तानाशाही को भी शिकस्त देने में कामयाब बताई जाती हैं। भारत को इस पूरे मामले में यह सोचना चाहिए कि लोकतंत्र की असफलता किस तरह भारी पड़ती है। दिल्ली आज अगर यह सोचकर एक खराब सरकार चला रही है कि वह अपनी मनमानी कर सकती है, और हिंदुस्तान में फौजी बगावत का कोई खतरा नहीं है, तो दिल्ली की हुकूमत को यह देखना चाहिए कि पाकिस्तान में किस तरह धर्मांधता, कट्टरपंथ, खुफिया ताकतों, और अदालतों की अलग-अलग ताकतों ने चुनी हुई सरकारों को हटाने का, गिराने का काम किया है। भारत में आज सरकार ने, यूपीए सरकार ने अपने गलत कामों से देश में एक ऐसा माहौल बनाया है कि लोगों को मोदी एक विकल्प लगने लगा है, लोगों को सत्ता में अदालती दखल न सिर्फ जायज लगने लगी है, बल्कि जरूरी भी लगने लगी है। अन्ना-बाबा और केजरीवाल जैसे अलोकतांत्रिक और अराजक लोग भी जनता को भले लगने लगे हैं। और न सिर्फ दिल्ली की सत्ता, बल्कि राज्यों में बिखरी देश भर की निर्वाचित सरकारों, उन्हें हांक रहे नेताओं और अफसरों की विश्वसनीयता भी जनता में खत्म सी हो चुकी है।
पाकिस्तान से भारत की कोई तुलना नहीं की जा सकती, ऐसा मानने वाले बहुत से लोग हैं, अधिकतर लोगों को पाकिस्तान के साथ भारत की इस तरह की चर्चा भी तर्कहीन लगेगी। लेकिन यह समझने की जरूरत है कि इन दोनों हालातों के बीच, सरहद के दोनों तरफ जो एक बात एक सी है, वह है लोकतंत्र की नाकामयाबी की, जनता का भरोसा उठ जाने की। इन्हीं दो बातों के चलते सरहद के दोनों तरफ अदालतों को सरकार के काम के बीच पहले के किसी भी वक्त के मुकाबले अधिक दखल देने की नौबत आ चुकी है। भारत में आज केंद्र और राज्य सरकारों के खिलाफ, यूपीए से लेकर मोदी तक की सरकारों के खिलाफ कितने ही किस्म की जांच आज सुप्रीम कोर्ट अपनी निगरानी में करवा रहा है। और यह नौबत निर्वाचित सरकारों के लिए, लोकतंत्र के लिए शर्मनाक है। यह कुछ उसी तरह की बात है कि किसी घर में बहू के रसोईघर जाने पर सास को खड़े रहकर निगरानी रखनी पड़े कि वह कुछ निकालकर खा न ले।
पाकिस्तान से भारत किन-किन मायनों में अलग है, यह एक अलग बात है। लोकतंत्र को परास्त करने में इन दोनों ही देशों में सत्ता पर काबिज लोग, उनके कुनबे किस तरह की गुंडागर्दी कर रहे हैं, यह देखें, तो फिर सरहद के दोनों तरफ मिलती-जुलती कितनी ही बातें दिखती हैं। इन बातों को देखकर सबक लेने की जरूरत है। 

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