मधुमक्खी के छत्तों में घुसने के शौकीन जस्टिस काटजू..

18 मार्च 2013
लगातार खबरों में बने रहने वाले जस्टिस मार्कण्डेय काटजू ने पत्रकारिता की पढ़ाई को लेकर एक नया बखेड़ा खड़ा कर दिया है। हम कुछ मुद्दों को लेकर जस्टिस काटजू के बड़बोलेपन के खिलाफ रहे हैं लेकिन यह एक मामला ऐसा है जिस पर कहना उनकी जिम्मेदारी थी, उनका कहा हुआ सही है, या नहीं यह एक अलग बात है। उन्होंने प्रेस कौंसिल के अध्यक्ष की हैसियत से एक कमेटी बनाई है, यह तय करने के लिए कि एक पत्रकार की न्यूनतम योग्यता क्या होनी चाहिए, और इस पर मीडिया से जुड़े हुए लोगों और जानकार लोगों ने उन पर चढ़ाई कर दी है। 
उन्होंने यह कहा कि चिकित्सा, कानून या पढ़ाने जैसे पेशों के साथ पढ़ाई-लिखाई की एक योग्यता जरूरी होती है, लेकिन पत्रकारिता में आने के लिए ऐसा कुछ नहीं है। इसलिए बहुत बार लोग पत्रकारिता की बहुत ही कम या नाकाफी ट्रेनिंग लेकर ही इस पेशे में आ जाते हैं, और उससे बहुत नकारात्मक असर पड़ता है क्योंकि वे जर्नलिज्म के ऊंचे पैमानों को नहीं निभा पाते। जस्टिस काटजू ने आगे कहा कि अब वक्त आ गया है जब एक कानून बनाकर कुछ योग्यता अनिवार्य करनी चाहिए। उन्होंने इस मामले के सही पहलुओं को देखने के लिए एक कमेटी बनाई है जो यह सुझाएगी कि पत्रकार बनने के पहले कौन सी योग्यता होनी चाहिए। 
इसके खिलाफ सबसे कड़ी प्रतिक्रिया हिंदुस्तान के एक ऐसे पत्रकार की आई है, जो मेरी नजर में देश का सबसे अच्छा पत्रकार है। आऊटलुक पत्रिका के संपादक विनोद मेहता ने पिछले दशकों में जितने अच्छे अखबार निकाले, उतने हिंदुस्तान के इतिहास में किसी ने नहीं निकाले। और शायद उनका बहुत अच्छा होना भी उनके बंद होने के पीछे की एक वजह रही होगी। लेकिन अभी हम अच्छे अखबार और उनके बंद होने जैसे बातों पर जाना नहीं चाहते क्योंकि उनसे एक अखबारनवीस की काबिलीयत पर छिड़ी यह मौजूदा बहस अलग रह जाएगी। विनोद मेहता ने जस्टिस काटजू के खिलाफ कहा कि यह सोच पूरी तरह बकवास है, और उन्होंने अपने खुद के बारे में कहा कि वे खुद बीए फेल हैं। उन्होंने यह भी कहा कि दुनिया के कुछ सबसे महान पत्रकार किसी डिग्री के बिना ही महान बने।
जस्टिस काटजू की कही बात एक अच्छी बहस के लायक है। हिन्दी अखबारनवीसी एक वक्त भारत में हिन्दी साहित्यकारों और स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों का एकाधिकार रही। पत्रकारिता के इतिहास के बहुत बड़े हिस्से को देखें, तो हिन्दी में जो काम अखबारों में हुआ, वह आज के समाचारों के और विचारों के माने हुए और प्रचलित, दोनों ही किस्म के पैमानों से खासा अलग था। और उसका मकसद भी अलग था। वह दौर सीमित संख्या में पढ़े-लिखे लोगों का था, जो कि जाहिर तौर पर समाज के उच्च आयवर्ग के थे, या ऊंची समझी जाने वाली जातियों के थे। और ऐसे ही लोग साहित्य को पढऩे और लिखने वाले लोगों में अधिक थे, या हावी थे। उन दिनों हिन्दी साहित्य से परे हिन्दी पत्रकारिता का कोई अस्तित्व नहीं था। और यह कल्पना भी मुश्किल है कि आज के विनोद मेहता या बरखा दत्त सौ बरस पहले हिन्दुस्तान में बिना कविता-कहानी लिखे हुए पत्रकार माने गए रहते। कम से कम उनका साहित्य में किसी न किसी तरह का दखल तो जरूरी ही माना गया रहता। आज की अखबारनवीसी या आज के मीडिया के कामकाज में ऐसी किसी जरूरत की जरूरत नहीं रह गई है। इसलिए कल तक की अच्छी भाषा, आज के मीडिया के कामकाज में एक छोटी जरूरत बन चुकी है, और आज की बड़ी जरूरत मीडिया के दायरे में आने वाले मुद्दों के बारे में एक बेहतर समझ हो चुकी है। अब इस बेहतर समझ के बारे में कुछ समझा जाए।
आजादी के बाद के हिंदुस्तान में देश का ढांचा बना, संविधान बना, सरकार, संसद और अदालतों के कामकाज की शुरूआत हुई, केंद्र और राज्यों के संबंधों का खुलासा हुआ, बाजार और कारोबार पर खबरों का सिलसिला बढ़ा। अखबारों के पन्ने बढ़े, पाठकों की जरूरतें बढ़ीं, और पाठकों की समझ भी बढ़ी। पूरी दुनिया के साथ समाचार और विचार का लेन-देन बढ़ा, और देश के भीतर विज्ञान और तकनीक के विकास से मीडिया में काम करने के लिए समझ की जरूरत भी बढ़ी। 
जस्टिस काटजू का यह सोचना है कि बाकी कुछ पेशों की तरह मीडिया में काम करने के लिए भी एक न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता होनी चाहिए, और वह क्या होनी चाहिए इसके बारे में वे एक कमेटी बनाकर उससे राय मांग रहे हैं। 
विनोद मेहता की मिसाल बहुत अच्छी है। मैं उससे सहमत हूं, क्योंकि मैं खुद कॉलेज में पहले बरस में साइंस में फेल हो चुका हूं, और उसके तुरंत बाद अखबार में काम करते हुए, खींचतानकर किसी तरह इम्तिहान देकर बीए पास किया। और जो कुछ सीखा, वह अखबारनवीसी करते हुए ही सीखा। आज भी जो लोग पत्रकारिता की डिग्री लेकर आते हैं उनकी डिग्री एक सीमा से अधिक काम की मुझको नहीं लगती है, लेकिन उसकी एक दूसरी वजह है। पत्रकारिता का कोर्स, और उसकी पढ़ाई-लिखाई का हाल इस कदर बदहाल है, कि मुझ तक आने वाले ऐसी डिग्रीधारी जाहिर तौर पर भारी कमजोर रहते हैं। लेकिन यह जरूर होगा कि भारत और दुनिया के जो सबसे अच्छे पत्रकारिता संस्थान हैं, वहां के पढ़े हुए लोग पत्रकारिता की एक बुनियादी समझ लेकर निकलते होंगे, और वे जहां काम करते होंगे, अपने खुद के उस स्तर से बेहतर रहते होंगे, जो कि इस पढ़ाई के बिना उनका रहा होता। 
यहां इस बारीक फर्क को समझने की जरूरत है। विनोद मेहता बीए फेल होकर भी आज देश के सबसे अच्छे पत्रकार हैं, लेकिन वे अगर बीए पास होते, या उन्होंने पत्रकारिता का कोई अच्छा कोर्स किया होता, तो हो सकता वे आज अपने-आपसे बेहतर होते। इसलिए बहस के लिए हम पल भर को यह मान लें कि पत्रकारिता की पढ़ाई या किसी और तरह की पढ़ाई को पत्रकार बनने के लिए अनिवार्य न भी किया जाए, तो भी उसमें बुराई क्या है? आज पत्रकारिता, और अब यह सिर्फ पत्र से जुड़ी कारिता नहीं रह गई है, अब यह कागज और कलम से बिल्कुल परे का मीडिया बन चुकी है, यह पत्रकारिता तरह-तरह के अज्ञान से भरी दिखती है, और तरह-तरह की नासमझी का शिकार भी दिखती है। आज जब समाचारों और विचारों से मीडिया देश की एक बड़ी आबादी तक असर डालता है, तो इसके अपने लोगों में ज्ञान और समझ, मीडिया की तकनीक और अभिव्यक्ति जैसी कुछ बुनियादी बातों की जरूरत को जरूरी क्यों नहीं समझा जाता?
मैं अपने तजुर्बे से यह कह सकता हूं कि हिंदुस्तान में गैरअंगे्रजी मीडिया के लोगों को अगर अंगे्रजी की समझ है, तो यह समझ उनके ज्ञान और उनकी समझ को बेहतर बनाती ही है। ऐसा नहीं कि अंगे्रजी न जानने वाले लोग अच्छे नहीं हुए हैं, लेकिन दूसरी भाषाओं की समझ बहुत काम की होती है। इसी तरह जिस देश और समाज में मीडिया के लोगों को काम करना है, वहां की शासन प्रणाली, सरकारी व्यवस्था, समाज के ढांचे, राजनीतिक और दीगर विचारधाराएं, देश और समाज का इतिहास, कारोबार के नियम-कायदे, संवैधानिक संस्थाएं, इनकी समझ किसी पत्रकार को क्यों नहीं होनी चाहिए? और ये बातें पत्रकारिता की बुनियादी तकनीकी जरूरतों से अलग है। 
मैं अपने अनुभव के आधार पर यह कह सकता हूं कि हिन्दी और अंगे्रजी के जिन अखबारों को मैं देख पाता हूं, उनमें से बहुत से ऐसे हैं जिनमें काम करने वाले पत्रकार अपनी आधी-कामकाजी जिंदगी इस पेशे में गुजारने के बाद भी ठीक से यह नहीं समझ पाते कि लोकतंत्र में, या इंसानियत में सामाजिक न्याय, प्राकृतिक न्याय की जरूरतें क्या हैं। अपने-आपके जातिगत, अपने पारिवारिक आयवर्ग, अपने सामाजिक तबके से मिले पूर्वाग्रहों को ही वे सामाजिक हकीकत मानते हैं, और पूरी की पूरी हकीकत उसे ही मान लेते हैं। इसलिए भारत के पत्रकारों को पत्रकारिता की बुनियादी सीख और जानकारी के साथ-साथ, लोकतंत्र की बुनियादी सीख की भी जरूरत है, इंसाफ की बुनियादी सीख की भी जरूरत है। इसलिए एक अनिवार्य शर्त के रूप में न सही, खुद होकर लागू किए गए कुछ पैमानों के रूप में पत्रकारों को एक पढ़ाई-लिखाई से गुजारना, उससे गुजरने के बाद उन्हें पत्रकार बनाना या मानना, इसमें कोई बुराई नहीं है। इसे एक शर्त के रूप में थोंपने की बात बहुत से लोगों को नागवार गुजर रही है, लेकिन ऐसे लोग अपने पेशे के आज के हाल को देखें, तो उनको लगेगा कि ऐसी कोई शर्त इसी पेशे का भला अधिक करेगी।
विनोद मेहता जैसी मिसाल अनगिनत हैं। डॉ. अब्दुल कलाम को लेकर कहा जा सकता है कि वे कोई बहुत अधिक पढ़े-लिखे मिसाइल वैज्ञानिक नहीं थे, फिर भी उनका योगदान बड़े-बड़े पढ़े-लिखे लोगों से अधिक था। जिस राधाकृष्णन के नाम पर शिक्षक दिवस मनाया जाता है, उन्होंने न बीएड किया था, न एमएड। लेकिन वे बहुत उम्दा शिक्षक थे। दुनिया में जब भी तर्कों को काटने के लिए मिसालों का इस्तेमाल होता है, तो वे मिसालें कुतर्क अधिक होती हैं, तर्क कम होती हैं। किस्से-कहानियों से पैमाने तय नहीं होते। गांधी के सत्य के प्रयोगों को अगर देखें, तो उस पैमाने पर आज हर अधेड़ या बूढ़े इंसान को अपने काबू को तौलने के लिए बच्चों के साथ बिना कपड़े सोने की इजाजत मिलनी चाहिए, लेकिन कहानियों से पैमाने नहीं बनते। 
इसलिए जब मीडिया अपने-आपको इतना महत्वपूर्ण मानता है कि वह किसी भी तरह के बाहरी काबू के खिलाफ बागी हो जाता है, तो फिर उसे अपनी इस अहमियत को देखते हुए अपने काम करने वाले लोगों की समझ और काबिलीयत की अहमियत भी समझनी चाहिए। यह जरूर है कि एक नासमझ या कमसमझ पत्रकार अपने अखबार के लिए अधिक काम का होता है, अधिक उत्पादक होता है, क्योंकि ज्ञान और पत्रकारिता की तकनीक मिलकर बहुत से खबरों को गलत साबित कर देते हैं। और जब यह समझ नहीं होती, तो पत्रकार खूब लिखते हैं, किसी जांच-परख के बिना उनका लिखा पत्थर पर लिखी लकीर जैसा होता है। लेकिन यह लोकतंत्र और समाज के हित में नहीं है। इसलिए पत्रकार बनने के लिए पढ़ाई-लिखाई की कुछ शर्त, इस पेशे में खुद होकर भी अपनाई जानी चाहिए। और इसके साथ-साथ चूंकि मौजूदा कामकाजी पीढ़ी अभी चौथाई या आधी सदी और काम करती रहेगी, इसलिए इसकी भी काम के साथ-साथ ऐसी ट्रेनिंग होनी चाहिए जिससे कि इसका ज्ञान बढ़ सके और समझ भी बढ़ सके।
जस्टिस काटजू ने मधुमक्खी के इस छत्ते को छेड़कर एक ऐसी बात को चर्चा में लाने का काम किया है जिसे मीडिया में शायद ही कोई छेड़ता हो। कुछ लोगों ने इसे सीधे-सीधे एक शर्त, कानून बनाकर लादी जा रही शर्त मान लिया है, लेकिन अगर इसे मीडिया के अपने खुद के पैमानों की तरह देखा जाए, तो उसमें क्या बुरा है? और बिना कानूनी शर्त अगर ऐसा हो सकता है, तो इससे मीडिया का और लोकतंत्र का बहुत भला होगा। आज बिना काबिलीयत हिन्दुस्तान में जिन दो पेशों में सबसे अधिक संभावनाएं हैं, उनमें एक राजनीति है, और दूसरी पत्रकारिता। इन दोनों में ही बिना कानूनी बंदिश, यह तस्वीर बदलनी चाहिए। मैं पहले भी राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं के लिए लीडरशिप के ऐसे पाठ्यक्रम की वकालत करते रहा हूं जो उन्हें देश और लोकतंत्र की समझ दे सके। ऐसी ही जरूरत मीडिया को भी है। 

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