तिपाई का एक लंबा पाया

संपादकीय
6 मार्च 2013
बिहार और पंजाब में पुलिस ने पिछले दो दिनों में जिस तरह सड़कों पर हैवानियत दिखाई है, उसे टीवी पर देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने खुद होकर इन सरकारों को नोटिस जारी किया है। न सिर्फ पुलिस की हिंसा, बल्कि बहुत तरह के दूसरे मामले ऐसे हैं जिन पर आज अदालतों को काम करना पड़ रहा है, और जो कि सरकारों की न्यूनतम जिम्मेदारी होनी चाहिए थी। भारतीय लोकतंत्र तीन पायों पर टिका हुआ एक ढांचा है, और इनके बीच में अधिकारों और जिम्मेदारियों का एक संतुलन है। एक-दूसरे के काम में दखल देने के लिए भी इनकी सीमाएं तय हैं। लेकिन अब पिछले बरसों में लगातार यह देखने में आ रहा है कि सरकारें लोकतंत्र से परे जा रही हैं, और अदालतों को किसी जनहित याचिका पर या खुद होकर सरकारी काम में दखल देना पड़ रहा है। इसी तरह सीएजी की बहुत सी रिपोर्ट देखें, तो सरकार के कामकाज के घोटाले उसे इतनी बारीकी में जाकर निकालने पड़ रहे हैं, कि सरकारों की बेईमान नीयत उजागर हो रही है। चुनाव सुधार की अगर बात करें, तो चुनाव आयोग को बहुत सारा ऐसा काम करना पड़ रहा है जिसे कि राजनीतिक दलों और उनके उम्मीदवारों पर काबू करने के लिए संसद को करना था। 
लोकतंत्र इस तरह की तिपाई नहीं है कि उसके पाये अपने आपको समेट लें या लंबा कर लें, और उसका संतुलन बना रहे। आज जिस तरह बात-बात पर सिर्फ अदालती दखल सरकारों को पटरी पर रख रही है, वह अदालतों को बददिमाग और तानाशाह भी बना सकती है। जब सरकार का कामकाज भी जजों को करना पड़ रहा है, या वे खुद होकर कर रहे हैं, तो सरकार के हक छिन भी रहे हैं। आज देश में आबादी के सबसे बड़े हिस्से के लिए खाद्यान्न सुरक्षा का जो मामला पीयूसीएल का दाखिल किया हुआ है उसकी हालत यह है कि सुप्रीम कोर्ट बरसों से दाने-दाने के बंटवारे की निगरानी करते बैठा है। और हम पहले भी इस बात को लिख चुके हैं कि गरीब जनता के हक की जो फिक्र वोटों की मोहताज सरकारों को करनी चाहिए, वे भ्रष्टाचार में लगी हैं और अपने नेताओं को, अफसरों को अरबपति बना रही हैं। दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट गरीबों के हक को लेकर इस तरह लाठी लेकर खड़ा है, मानो गरीब वोटरों के वोट से जज को दुबारा चुनकर आना है। यह नौबत बहुत खराब है, लेकिन शायद आज आधी आबादी के पेट में खाना, स्कूलों में दोपहर का भोजन, और गर्भवती महिलाओं-छोटे बच्चों को पोषण आहार इसीलिए मिल पा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट केन्द्र सरकार के हिस्से की नीतियां खुद तय कर रहा है। यह लोकतंत्र के लिए तो खराब बात है, लेकिन गरीब का हक उस तक इसी तरह से पहुंच रहा है। 
सरकार जो कि चुने हुए लोगों से बनती हैं, और संसद-विधानसभाएं जो कि चुने हुए लोगों की रहती हैं, और सरकार से हिसाब लेती हैं, इन सब पर काबिज लोगों को तो हर पांच बरस में जनता के सामने जाना होता है। लेकिन अब चुनावों में वोटों को खरीद लेने की जो सहूलियत आ चुकी है, उसके चलते अब लोग कामकाज को लेकर बेफिक्र हो गए हैं, और अगले चुनाव के खर्च के इंतजाम को काफी फिक्र मान लेते हैं। जिन सरकारों की पुलिस लोगों पर दर्जनभर टीवी कैमरों के सामने गुंडों की तरह लाठियां चलाती हैं, बेकसूरों को पीटती हैं, गाडिय़ों को तोड़ती हैं, उनको फिक्र नहीं है, और सुप्रीम कोर्ट को फिक्र करनी पड़ रही है! यह नौबत सरकारों के स्तर पर भी शर्मनाक है और इन राज्यों में जिन संवैधानिक संस्थाओं में बैठे हुए लोग ऐश कर रहे हैं, उन संस्थाओं के लिए भी यह डूब मरने की बात है। सत्ता पर बैठे लोग अपनी पसंद के हिमायतियों को ऐसी कुर्सियों पर बिठाते हैं, और देश के संविधान में ऐसी संस्थाओं को बनाने का पूरा मकसद ही गटर में डाल देते हैं। देश-प्रदेश की सरकारें  चाहे कितने ही बड़े जुर्म करें, उनके बिठाए हुए लोग मानवाधिकार आयोग, महिला आयोग, बाल आयोग, जातियों के आयोग पर बैठे हुए अपने राजनीतिक आकाओं को बचाने के सिवाय कुछ नहीं करते। अगर ये संस्थाएं अपना काम करती होतीं, तो भी अदालत के पहले सरकारों पर काबू की एक गुंजाइश निकल सकती थी। 
आज नौबत यह है कि देश-प्रदेशों को चलाने के लिए मानो अदालतें ही काफी हैं, या कम से कम जरूरी तो हैं ही। 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें