जुलाहे की तरह लट्ठ लेकर टूटने के बजाय अपना काम करें...

संपादकीय
28 मार्च 2013

पिछले हफ्ते भर से मीडिया में संजय दत्त का मामला छाया हुआ है, और इस बात पर लोगों के बीच ल_ चल रहे थे कि राज्यपाल या राष्ट्रपति को संजय दत्त को माफ कर देना चाहिए, या नहीं। इस बीच संजय दत्त की तरफ से, या उनकी सांसद बहन की तरफ से एक बार भी ऐसा बयान नहीं आया था कि वे माफी मांग सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट के एक रिटायर्ड जज, और प्रेस कौंसिल के मौजूदा अध्यक्ष मार्कण्डेय काटजू ने इस बहस को छेड़ा था कि संजय को माफी दे देनी चाहिए, और दिग्विजय सिंह ने आगे बढ़ाया था। हमारे पाठकों ने इस मुद्दे पर हमारा लिखा पढ़ा होगा कि हमने संजय दत्त को एक व्यक्ति के रूप में न मानते हुए, एक मुद्दे के रूप में माना था, और यह लिखा था कि जैसे किसी भी दूसरे कैदी को जेल के भीतर या जेल के बाहर अपनी हुनर का काम करने की छूट मिलती है, वैसा ही संजय दत्त के साथ होना चाहिए, और फिल्मों की कमाई जेल के खजाने में जानी चाहिए। हमने उनके लिए किसी भी तरह की रियायत का विरोध किया था और उनकी क्षमता का, बाकी कामकाजी कैदियों की तरह भी इस्तेमाल करने की सलाह दी थी। अब आज सुबह संजय दत्त ने खुद यह कहकर इस बहस को फिलहाल तो खत्म कर दिया है कि वे सजा से रहम की अपील नहीं कर रहे, और अपने आपको आगे की कैद के लिए पेश करने जा रहे हैं।  
भारत में मुद्दों को छोड़कर, व्यक्तियों पर केन्द्रित बहस मीडिया में इन दिनों इसलिए बढ़ती चल रही है, क्योंकि मुद्दों पर बात कुछ जटिल और मुश्किल होती है, व्यक्तियों और घटनाओं पर बात आसान होती है, उसमें अधिक अकल की जरूरत नहीं पड़ती। देश की जनता का कितना वक्त ऐसी बहसों और बातों में खराब होता है, और बिल्कुल निठल्ले बैठे नेताओं और दूसरे बहसबाजों को मीडिया में आने का मौका मिलता है। और फिर ऐसी सतही बहसों में टीवी के दर्शक बढ़ते हैं, तो वहां पर बाजार को भी इश्तहार देना ठीक लगता है, फायदे का लगता है। प्रेस कौंसिल के अध्यक्ष जस्टिस काटजू जिन गैरजरूरी मुद्दों में उलझ रहे हैं, उनकी बजाय उनको मीडिया से जुड़े हुए ऐसे मुद्दों को उठाना चाहिए, और उस पर गंभीर बातचीत का एक सिलसिला शुरू करना चाहिए। लेकिन कभी वे पाकिस्तान के अदालती फैसलों पर टूट पड़ते हैं, तो कभी वे मीडिया से बिल्कुल परे के मुद्दों पर चले जाते हैं। किसी भी संवैधानिक पद पर बैठे हुए व्यक्ति के पास जब अपने दायरे का काम करने के लिए ही दिन में चौबीस घंटे कम पडऩे की नौबत हो, तब फिर वे इस तरह जुलाहों की ल_ की तरह का काम न करें। 
जनता के बीच के संगठनों को भी मीडिया पर बात करने का काम करना चाहिए, क्योंकि अब यह कारोबार बहुत बड़े खर्च का होने के नाते, एक बड़े कारोबार का चरित्र पा चुका है, और इसमें से पत्रकारिता या अखबारनवीसी खत्म सी हो गई है। आने वाले दिन और अधिक जलती-सुलगती राजनीति के होंगे, और ऐसे माहौल में बकबकिया नेताओं पर लार टपकाने वाले मीडिया को लेकर अगर जनता नहीं जागेगी, तो बाजार के इश्तहार उसे सामानों के सपनों में सुलाने का पूरा इंतजाम आज भी कर ही रहे हैं। हिन्दुस्तान की आधी से अधिक आबादी की दिक्कतों पर इस देश की मीडिया का ध्यान उसी वक्त जाता है, जब उसके साथ बलात्कार हो जाता है, या उसकी हत्या हो जाती है, या फिर किसी चटपटी सुर्खी बनाने के लायक कोई और वारदात हो जाती है। इन दिनों तो जब तक ऐसा कोई सनसनीखेज और दिल दहलाने वाला वीडियो फुटेज न हो, तब तक तो ऐसी घटनाएं भी खबर नहीं बन पातीं। 
प्रेस कौंसिल को चाहिए कि मीडिया पर अपना ध्यान रखे, और यहां पर अनसुलझे मुद्दे इतने हैं, कि उन्हीं पर इस कौंसिल को ओवरटाइम करना चाहिए।

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