बाजार की अश्लील हिंसा झेलता हुआ हिंदुस्तान

25 मार्च 2013
संपादकीय
भारत में कारोबार कर रही एक कार कंपनी फोर्ड के कुछ ताजा पोस्टर सेक्स और हिंसा के भयानक बाजारू इस्तेमाल की एक मिसाल हैं। इनमें कार के पीछे सामान रखने के हिस्से का बड़ा आकार जताने के लिए ऐसी तस्वीरें बनाई गई हैं जिनमें कार की ड्रायविंग सीट पर अपनी बदचलनी के लिए बदनाम इटली के एक पिछले प्रधानमंत्री की तस्वीर बनी हुई है, और पीछे सामान की जगह हाथ-पैर और मुंह बांधकर डाल दी गई तीन सुंदरियों की तस्वीर बनाई गई है, मानो उन्हें अपहरण करके ले जाया जा रहा हो। और मजा यह है कि इटली की इस फोर्ड कंपनी ने भारत में बनाए गए इस विज्ञापन अभियान से अपने-आपको अलग कर लिया है। 
योरप के जिस देश इटली में कमउम्र की वेश्याओं के साथ खुले रंगरेली मनाने वाले प्रधानमंत्री को भी उस देश ने बर्दाश्त किया था, उस देश की कंपनी भी भारत में बने इन पोस्टरों को बर्दाश्त नहीं कर पाई। इस मुद्दे पर शायद आज हम नहीं लिखते, लेकिन आज ही एक दूसरी खबर ऐसी ही ओछी और ऐसी ही खराब यह है कि लंदन में एक नाईट क्लब ने यह सार्वजनिक घोषणा की है कि वह एक राष्ट्रीय सीना प्रदर्शन सप्ताहांत आयोजित कर रहा है जिसमें खुले गले के कपड़ों वाली महिलाओं को मुफ्त में दाखिला मिलेगा। जिस पश्चिम को भारत के लोग बहुत अश्लील समझते हैं वहां भी कुछ सांसदों ने इसका विरोध किया है, और इसे  बेहूदा करार देते हुए कहा है कि यह सब महिलाओं को नीचा दिखाने वाला कृत्य है। एक तरफ जहां महिलाओं के सम्मान की बात हो रही है वहीं दूसरी तरफ ऐसे ऑफर के जरिए कुछ लोग प्रचार पाने के लिए निहायत नीचता और फूहड़पन पर उतर आए हैं।
इन दो बातों का भारत में आज महत्व यह है कि यहां पर अदालत से लेकर सेंसरबोर्ड तक यह चर्चा छिड़ रही है कि फिल्मों में अश्लील से अश्लीलतर, और अश्लीलतम होते चले जा रहे आईटम साँग का क्या किया जाए? ऐसे नाच-गाने लोगों को उत्तेजना देते हैं, लेकिन इस उत्तेजना को वयस्कों तक सीमित रखने का कोई चारा भारत के कानून में नहीं दिख रहा है। और ऐसी उत्तेजना कला की किसी जरूरत के चलते हो, किसी विषय को या मुद्दे को दिखाने के लिए हो, तो भी कोई बात है। यह पूरा का पूरा बाजार का एक अंदाज है जो शो-केस में लड़कियों के पुतले खड़े करके सामान बेचते हुए, उन पुतलों पर से कपड़े घटाते चल रहा है। 
बाजार की ऐसी हिंसक साजिश के खिलाफ आवाज उठाने की जरूरत है। लेकिन इस देश में आवाज अगर आज उठती है तो वह किसी गंभीर कलाकार की बनाई हुई तस्वीर में बिना कपड़ों के बदन के खिलाफ उठती है, यह अनदेखा करते हुए कि हिंदुस्तान का इतिहास किसी भी विदेशी धर्म के यहां आने के पहले से मंदिरों तक में नग्न प्रतिमाओं का रहा है। देवी-देवताओं, हिंदू देवी-देवताओं की नग्न प्रतिमाएं देश भर के मंदिरों में भीतर और बाहर सजी हुई हैं। खजुराहो जैसे मंदिर सेक्स के तरीकों के कैटलॉग की तरह के हैं। लेकिन मकबूल फिदा हुसैन को इस देश के बाहर खदेडऩे में जुटे हुए लोगों को बाजार की हिंसक साजिशें नहीं दिखतीं, क्योंकि वे लोग धर्मांधता और साम्प्रदायिकता की गुंजाइश के बिना जहां हिंसक सेक्स भी हो, उससे बेपरवाह हैं। हिंदू संस्कृति के ऐसे ठेकेदारों को हिंसक सेक्स बुरा नहीं लगता, लेकिन किसी मुस्लिम या ईसाई का नाम अगर जुड़ा हुआ हो, तो फिर उनकी लाठियां निकल पड़ती हैं।
ऐसा देश सेक्स और वयस्क मनोरंजन के लिए किसी सेहतमंद और अच्छे अंदाज वाले कलाकारों के लिए नहीं है। यह देश हिंसक और बाजारू, कारोबारी कल्पनाशीलता के लिए खुला हुआ है। जो लोग ऐसी फोर्ड कार को लेने का सोचें, या इस किस्म के सेक्स-सहारे बिकते दूसरे सामान लेने का सोचें, वे यह भी सोचें कि इनमें बैठा हुआ उनका परिवार कैसा लगेगा? यह देश साम्प्रदायिक हिंसा से लेकर बाजार की हिंसा तक झेल रहा है, और इस पर लोगों को जागरूक करने की जरूरत है। 

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