बलात्कारों से लदा हुआ यह कैसा अजब-गजब देश-प्रदेश

17 मार्च 2013
संपादकीय
एक तरफ हिंदुस्तान दुनिया के सामने अपने-आपको विस्मयकारी या अविश्वसनीय पर्यटन स्थल साबित करने में लगा हुआ है। दूसरी तरफ देश में देशी और विदेशी सैलानियों के साथ जो सुलूक हो रहा है, उसके बाद किसको यहां आने का हौसला होगा, यह सोचने की बात है। हर बरस दर्जन भर से अधिक विदेशी सैलानी महिलाओं के साथ बलात्कार के मामले सामने आते हैं, और जो महीनों तक खबरों में छाए रहते हैं। बहुत से देश अपने नागरिकों के लिए चेतावनी जारी करते हैं कि वे हिंदुस्तान संभलकर जाएं। और जिन खतरों को वे गिनते हैं उनमें सिर्फ आतंकी खतरे नहीं हैं जो कि नक्सल मोर्चो पर या कश्मीर जैसे कुछ अशांत इलाकों में खड़े हो सकते हैं, ये खतरे उन लोगों से भी हैं जो कि पेशेवर मुजरिम नहीं हैं, आतंकी नहीं हैं, लेकिन अपराध करने से नहीं चूकते। और यह सोचना गलत है कि जो हिंदुस्तानी आदमी अपने आसपास की चार बरस की बच्ची से लेकर सत्तर बरस की बूढ़ी महिला से, हर किसी से बलात्कार करते पकड़ाते हैं, जिनके लिए बेटी का रिश्ता भी रोक नहीं बनता, वे विदेशी सैलानियों से बलात्कार के सपने न देखते हों। मध्यप्रदेश में दो दिन पहले अपने पति के साथ साइकिल पर सफर कर रही एक स्विस महिला के साथ जिस तरह का सामूहिक बलात्कार हुआ है, उसके दाग धोने में मध्यप्रदेश पर्यटन के लाखों हाथ भी अगर टीवी के परदों पर नाच-नाचकर उसे अजब और गजब प्रदेश बताएंगे, तो भी वे दाग नहीं धुलेंगे। 
हमारा यह भी कहना नहीं है कि बलात्कार के सारे मामले सरकार रोक सकती है। लेकिन किसी देश-प्रदेश में कानून का राज किस हद तक है, वहां के लोगों को सजा की गंभीरता कितनी समझ आती है, यह तो उस प्रदेश की सरकार और वहां के समाज की जिम्मेदारी है ही। भारत के अधिकतर हिस्सों में विदेशी सैलानियों को लूट लेने की फिराक में वहां के स्थानीय व्यापारियों से लेकर गाडिय़ों और होटलों वाले लोग लगे रहते हैं। और अपनी स्थानीय जुबान में बात करते हुए वे लोग समझते हैं कि सैलानी उनकी साजिशों को नहीं समझेंगे। लेकिन जो लोग अपनी जमीन से हजारों मील दूर आए रहते हैं, वे यहां के लोगों के चेहरों को देखकर, उनके आपसी लहजे को देखकर भी सब समझ लेते हैं। और यह देश न सिर्फ विदेशियों के सामने, बल्कि देश के सैलानियों के सामने भी इतनी खराब तस्वीर पेश करता है जिसकी हद नहीं। देश के बड़े-बड़े पर्यटन केंद्रों और ऐतिहासिक जगहों पर पान की पीक से लेकर पेशाब तक इस कदर बिखरी रहती हैं, कि किसी भी सफाईपसंद इंसान का वहां खड़े रहना भी मुश्किल होता है। खाने के सामान गंदे, रेलगाडिय़ों के डिब्बे गंदे, पखानों में जाना मुश्किल, किसी भी कतार में धक्के, दलालों का बोलबाला, और ऊपर से चारों तरफ आती बलात्कार की खबरें। कोई किस हौसले से इस देश में आकर घूम सकते हैं? 
हिंदुस्तान को अगर आज की मुकाबले वाली दुनिया में खड़े रहना है तो उसे अपने तौर-तरीके सभ्य करने होंगे इसके बिना इसकी पर्यटन की संभावनाएं भी घटती चली जाएंगी। जिस देश के किसी इंसान के साथ हिंदुस्तान में ऐसा सामूहिक बलात्कार होता है, उस देश से यहां आने वाले लोग शायद घटकर चौथाई भी नहीं रह जाते होंगे। और ऐसे जुर्म एकदम से बंद नहीं हो सकते, घट भी नहीं सकते, और आज तो ये बढ़ते ही चल रहे हैं। ऐसा लगता है कि इस देश की सरकारों को खुद होकर देशी और विदेशी सैलानियों के लिए यह चेतावनी जारी करनी चाहिए कि वे कहां-कहां न जाएं, कब-कब न जाएं, कैसे-कैसे घूमें। और मध्यप्रदेश में हुआ यह ताजा जुर्म तो ऐसी महिला के साथ हुआ है जो कि अपने पति के साथ सफर कर रही थी। उसके बारे में तो हिंदुस्तानी दकियानूसों का यह तर्क भी नहीं चल सकता कि महिलाओं के कपड़े-लत्तों से बलात्कारियों को उकसावा मिलता है, या किसी महिला का चाल-चलन ठीक नहीं था। 
भारत में कानून का राज बेहतर बनाने के लिए खासी मेहनत करनी होगी, इस काम में कानून को कड़ा बनाना सबसे ही हल्का काम है। एक सबसे मुश्किल काम कानून पर अमल होगा, और उससे भी मुश्किल काम एक सुरक्षित सामाजिक वातावरण पैदा करना होगा। इस देश के जितने भी अजब और गजब राज्य हैं, उनको अलग-अलग, और मिलकर भी यह सोचना चाहिए कि बलात्कार जैसी हिंसक घटनाओं को रोकना कैसे होगा, और इसकी कोशिश के बाद सैलानियों से होने वाली बाकी बदतमीजी पर भी बात करनी होगी। देश के तौर-तरीके बेहतर बनाने होंगे और लोगों के बीच यह समझ भी पैदा करनी होगी कि उनके अच्छे या बुरे बर्ताव से उनकी आने वाली पीढिय़ों की रोजी-रोटी पर भी असर पड़ेगा। जो समाज न ऐसी दूरदृष्टि रखता, न जिसमें आगे बढऩे की महत्वाकांक्षा है, वह समाज जुर्म से लेकर बदसलूकी तक के नुकसान भी नहीं समझ सकता। मध्यप्रदेश देश की बलात्कार राजधानी बन चुका है, वहां पर दलितों के खिलाफ जुर्म सबसे अधिक हैं, ऐसी तमाम बातों के बारे में तुरंत सोचने-विचारने की जरूरत है।

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