संपादकीय
16 मार्च 2013
महाराष्ट्र सरकार का एक इश्तहार दिल दहला रहा है। मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री, इन दो के बंगलों के लिए हाईक्वालिटी के खाने के सामान के लिए टेंडर निकला है जो सौ करोड़ रूपये से अधिक का है। यह हाल उस महाराष्ट्र का है जहां पर आज मुख्यमंत्री एक बेहतर और शायद ईमानदार नेता माना जाता है, जहां पर राज्य के एक बड़े हिस्से में सूखा पड़ा है, लोगों के पास पीने को पानी नहीं है, जानवरों के लिए लगाए गए राहत शिविरों में घोटालों की रिपोर्ट आ रही हैं, जहां पर बच्चों की आबादी में से आधी आबादी कुपोषण की शिकार हैं, जहां पर गरीब अपने बच्चों को कुछ हजार रूपयों में बेच रहे हैं, और सरकार के अफसर ही ऐसे दर्जनों बच्चों को छुड़वा भी रहे हैं, जहां पर सरकारी आंकड़े बताते हैं कि बच्चों की बड़ी आबादी को दो वक्त का खाना भी नसीब नहीं हो रहा है। और यह वही महाराष्ट्र है जहां पर अभी कुछ दिनों पहले सत्तारूढ़ गठबंधन की भागीदार, शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के एक मंत्री ने शादी की इतनी बड़ी दावत दी, कि इंकम टैक्स को उसकी जांच शुरू करनी पड़ी, और खुद शरद पवार को उस पार्टी की निंदा करनी पड़ी, पार्टी में जाने के बाद। यह हाल तब है जब सोनिया गांधी की नजरों में महाराष्ट्र की भुखमरी, वहां का कुपोषण और वहां के सूखे कुएं, बच्चों और जानवरों की भयानक तस्वीरें रात-दिन सामने आ रही हैं। लेकिन सोनिया गांधी के ही प्रधानमंत्री की अगुवाई वाले योजना आयोग का यह पैमाना है कि छब्बीस रूपए रोज जो जिंदा रहने पर खर्च करते हैं, वे भारतीय गरीब नहीं माने जा सकते।
यह वही महाराष्ट्र है जहां पर किसानों की खुदकुशी के मामले देश में सबसे अधिक दर्ज हो रहे हैं, बरसों से हो रहे हैं। यह वही महाराष्ट्र है जहां लवासा जैसे प्रोजेक्ट को लेकर शरद पवार के परिवार पर अरबों के फायदे वाले कारोबार में भागीदारी की खबरें आती हैं। यह वही महाराष्ट्र है जहां पर सिंचाई घोटाले के आंकड़े सदमा पहुंचाते हैं कि पानी की एक बूंद नहीं पहुंच पाई, और नेताओं की कंपनियों ने निर्माण ठेकों से अपनी तिजोरियां भर लीं। यह वही महाराष्ट्र है जहां आदर्श घोटाले जैसे मामले होते हैं जिनमें एक-दो-तीन पता नहीं कितने कांग्रेसी मुख्यमंत्री डूब जाते हैं। और इस महाराष्ट्र में ऐसा इसलिए भी हो पाता है क्योंकि यहां पर इसी तरह के राजनीतिक तौर-तरीकों वाले भाजपा के कल तक के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी की कंपनियां तरह-तरह की जालसाजी और धोखाधड़ी के आरोप झेलती हैं, और उन्हें पद छोडऩा पड़ता है। यह महाराष्ट्र अगर भूखा नहीं मरेगा, और यह अगर सूखा नहीं मरेगा, तो भला और किस प्रदेश का इतनी संपन्नता के बाद भी ऐसे मरने का हक बनता है?
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री इन दो के बंगलों पर एक बरस में सौ करोड़ से अधिक का खाना शायद इसीलिए खरीदा जा रहा है कि इस प्रदेश के कुपोषण के शिकार सारे बच्चों को ये अपने बंगले पर खिलाएंगे। और शायद इन्हीं बंंगलों पर राज्य में खुदकुशी करने वाले किसानों की तेरहवीं का खाना बनेगा। इसके बिना कैसे दो लोग सौ करोड़ से अधिक का खा सकते हैं? आज की तारीख में इस हिन्दुस्तान में और खासकर इस महाराष्ट्र में नेहरू और गांधी की पार्टी के ये नेता अपने खुद के लिए तो इतना खाना खरीदेंगे नहीं। पूरे राज्य के भूखों का खाना शायद इनकी रसोई में ही बनेगा। फिलहाल यह टेंडर देखने लायक है, और इसीलिए हम आज के पहले पन्ने पर इसे छाप रहे हैं।

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