यह सिलसिला कहां थमेगा, लोकतंत्र के खत्म होने पर?

संपादकीय
4 मार्च 2013
उत्तरप्रदेश में एक पुलिस अफसर की हत्या करने वाले गुंडों के संरक्षक राजा भैया नाम के एक कुख्यात आदमी को राज्य सरकार का मंत्री पद छोडऩा पड़ा। कल तक अपराधों से जुड़े हुए इस आदमी को समाजवादी पार्टी की अखिलेश यादव सरकार ने मंत्री बनाया था, और मानो लोकतंत्र और जनता का मजाक उड़ाने के लिए इसे जेल मंत्री बनाया था। जेल के सींखचों के पीछे जिसे होना चाहिए था, वह उसके इस तरफ से सलामी ले रहा था। और अब जब एक मुस्लिम डिप्टी एसपी की हत्या हुई, और इस मंत्री के करीबी लोगों के खिलाफ मामला दर्ज हुआ, और अफसर की बीवी ने मंत्री के खिलाफ साजिश की रिपोर्ट लिखाई तो जाकर यह इस्तीफा हुआ। 
भारतीय लोकतंत्र एक ऐसी शर्मनाक हालत में पहुंचा हुआ है कि जिसमें हर अपराधी को बड़ी अदालत से बड़ी सजा मिल जाने के पहले तक कानून निर्माता सांसद और विधायक बने रहने का पूरा हक है, और उसके पास अगर ताकत है तो मंत्री बनकर सलामी लेने का और देश-प्रदेश को चलाने का भी उसको पूरा हक है। कौन सा ऐसा अपराध है जिसमें शामिल लोग मंत्रियों की कुर्सियों पर नहीं पकड़ाए हैं? हत्या से लेकर बलात्कार तक, तस्करी से लेकर माफिया कारोबार तक, हर किस्म का कुकर्म जिस देश-प्रदेश के लोकतंत्र में कानून निर्माता और मंत्री करते हों, वहां पर जनता का भरोसा किस तरह सत्ता पर हो सकता है? एक के बाद दूसरी पार्टी पेशेवर अपराधियों के अंदाज में अपने-अपने चहेते मुजरिमों को बचाते हुए उनको संसद, विधानसभा और सरकार में बनाए रखती हैं। बलात्कारियों से भरी पार्टियों से क्या उम्मीद की जा सकती है कि वे महिलाओं पर होने वाले जुर्म के खिलाफ कोई कारगर कानून बनाएं?
शायद यह भी एक वजह है कि देश भर की अदालतों में अनगिनत कुर्सियां खाली हैं, और सुप्रीम कोर्ट बार-बार सरकारों से कहता है कि इन कुर्सियों को भरा जाए। देश के उच्च न्यायालयों में ही जजों की तीन सौ से अधिक कुर्सियां खाली हैं। ऐसी नौबत में अपराधियों से भरी सत्ता पर काबिज अपराधियों को बहुत सहूलियत रहती है कि वे अपने खिलाफ चल रहे मामलों को अंतहीन खिंचवा सकते हैं, देर करवा सकते हैं। और यह सिलसिला खत्म होने का नाम ही नहीं रहा है, क्योंकि इनको खत्म करने की नीयत ही नहीं है। हमारे जैसे कुछ लोग लगातार यह बात उठाते हैं कि सरकारी या संवैधानिक सत्ता की ताकत से लैस लोग जब कोई जुर्म करें, तो उनके खिलाफ मामलों के तेजी से चलने के लिए अलग से अदालतें होनी चाहिए, और अलग से कड़ी सजा का इंतजाम भी होना चाहिए। जब तक ऐसा नहीं होगा तब तक कानून की छलनी के छेदों से ऐसे नेता मटरगश्ती करते घूमते ही रहेंगे। 
इस कदर कुख्यात एक आदमी को समाजवादी पार्टी ने टिकट देकर पहले विधायक बनवाया, फिर मंत्री बनाया। इसके पहले भी फूलनदेवी नाम की डकैत को संसद में लाया गया। उधर पंजाब में अकालियों ने एक-एक करके कई हत्यारों को प्रतिष्ठित किया, और उनके परिवार के लोगों को संसद पहुंचाया या दूसरी जगह स्थापित किया। यह सिलसिला उस गरीब और कमजोर जनता के भयानक खिलाफ है जिसकी कोई आवाज मुजरिमों से भरी महफिलों में बच नहीं गई है। पार्टियां और नेता जिस तरह बेफिक्र होकर अपने जुर्म पर आखिरी सजा के पहले तक शेर बने घूमते हैं, वह देखते ही बनता है। जनता के बीच ऐसी जागरूकता के कोई आसार दिखते नहीं हैं कि वह अपराधियों को प्रतिष्ठित करने वाली पार्टियों का बहिष्कार करे। जिस लोकतंत्र में मुखिया या अगुवा बनने के मौके गिने-चुने रहते हैं, उसमें मुजरिम हावी होते चल रहे हैं। 
यह सिलसिला कहां जाकर थमेगा, लोकतंत्र के खत्म होने पर?

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