04 मार्च 2013
ब्रिटेन में अमेजान नाम की कंपनी का एक नया गोदाम शुरू हुआ है जिसमें काम करने वाले कर्मचारियों के बारे में एक रिपोर्ट छपी है। इसके मुताबिक इस बहुत ही लंबे-चौड़े गोदाम में ट्रालियों पर सामान लेकर उनको उनके लिए तय जगह पर पहुंचाने और जमाने में ये कर्मचारी आठ घंटों में पन्द्रह-पन्द्रह मील जितनी दूरी भी तय करते हैं। और उनका हर कदम, हाथ-पैर की हर हरकत, गोदाम के एक हिस्से से दूसरे हिस्से पहुंचने का रास्ता, यह सब कुछ कम्प्यूटर के कैमरों की निगरानी में रहता है और ये कम्प्यूटर हर किसी को बताते चलता है कि वह कैसे-कैसे कदमों की किफायत बरत सकते हैं।
एक वक्त किसी ने जो कल्पना की होगी, कि इंसान किस तरह मशीनों के गुलाम हो सकते हैं, वह आज इस गोदाम में खरी होते दिखती है। इंसान के कामकाज की उत्पादकता को बढ़ाने के लिए उसके काम में कम्प्यूटर की नजर और दखल से उसका अगला कदम किफायत का हो, यह सोच तो अच्छी लगती है, लेकिन जिस तरह किसी मुर्गीखाने में मुर्गियों को एक कतार में खड़े-खड़े चूजे से लेकर कटने तक की जिंदगी मशीन के पुर्जे की तरह तय करनी होती है, मशीनों की निगरानी में अमेजान के कर्मचारी कुछ इसी तरह रह गए हैं।
अब यहां दो सवाल उठते हैं, इंसान की उत्पादकता को अधिकतम करने में आखिर क्या खामी है? और दूसरी यह कि ऐसे में इंसान की अपनी कल्पनाशीलता कहां रह जाएगी? क्या कम्प्यूटरों को निगरानी और कदमों का हिसाब-किताब रखने के लायक बनाना ही इंसान का काम रह जाएगा?
दुनिया के बहुत से ऐसे काम हैं जिनमें मशीनें आज चाहे इंसान जैसा काम नहीं कर पा रही हों, इंसान मशीनों की तरह काम करने लगे हैं। चीन में सामान के सस्ता होने के पीछे यह एक बड़ी वजह है कि वहां उत्पादन-कर्मचारियों को कारखाने की मशीनों की तरह एक ही जगह बैठकर कामकाज के घंटों से बहुत अधिक समय तक भी काम करना पड़ता है, जिसे भारतीय मजदूर कानून में बंधुवा मजदूरों से ओवरटाईम करवाना कहा जाएगा। लेकिन चीन के अपने तर्क हैं कि इससे उसकी अर्थव्यवस्था पटरी पर आई है, और आगे बढ़ती चल रही है। वहां पर मानवाधिकार और मजदूर कानून पीछे की सीट पर भी नहीं, गाड़ी में सामान रखने की पीछे की जगह पर पड़े हुए हैं।
लेकिन ब्रिटेन का यह नया अनुभव है, लेकिन धीरे-धीरे इंसानों को मशीनों के गुलाम की तरह न सही लेकिन उनके साथी की तरह काम करना तो सीखना ही होगा। यह बात जाहिर है कि कम्प्यूटर और कुछ दूसरी मशीनें, कुछ मामलों में इंसानों के मुकाबले बेहतर काम करती हैं, या अधिक काम करती हैं। इसलिए इंसान जिन मशीनों को बनाते हैं, वे मशीनें एक वक्त आने पर इंसान के काम को भी बेहतर बना सकती हैं। आज जो लोग इस बात के लिए अपने पर भरोसा रखते हैं कि वे सबसे छोटा रास्ता जानते हैं, वे काम करने के सबसे अच्छे तरीके जानते हैं, उनके कदमों को शहरों के भीतर भी एक जगह से दूसरी जगह तक कम्प्यूटर तय करने लगे हैं। मोबाइल फोन और इंटरनेट से, जीपीएस उपकरणों से अब कारों में नक्शे के साथ-साथ आवाज भी स्क्रीन से मिलती रहती है कि कहां से मुड़ा जाए। अमेजान ने ब्रिटेन के अपने वेयरहाउस में इंसानी कदमों को भी इसी तरह दाएं-बाएं करने पर कम्प्यूटरों का काबू लागू कर दिया है।
मुझको दस-बीस बरस पहले की याद है जब अपने दफ्तर में इंतजाम तय करते हुए जब दीवारों की तरफ मुंह करके बैठने की तैयारी की गई, तो एक महिला सहयोगी ने खुली बगावत ही कर दी और कहा कि वे काम छोड़ देंगी, लेकिन दूसरों की तरफ पीठ करके नहीं बैठेंगी। उन्होंने कहा कि वे इस अहसास के साथ काम नहीं कर सकतीं, कि दूसरे लोग उनकी पीठ देख रहे हैं। उनका अपना सोचना जायज हो सकता था, अगर बात उनके घर की होती। लेकिन कामकाज की जगह पर अब ऐसी निजी पसंद की गुंजाइश खत्म होते चल रही है।
अभी-अभी इंटरनेट से ही जुड़ी हुई एक दूसरी बड़ी कंपनी याहू की खबर आई है। अब तक इस कंपनी के बहुत से कर्मचारी अपने घरों से काम करते थे। लेकिन इसकी नई महिला मुखिया मारिसा मेयर ने सबको नोटिस दे दिया है कि काम के लिए उनको दफ्तर ही आना पड़ेगा। उनका मानना है कि एक दफ्तर में काम करने वाले लोग जब तक एक-दूसरे से मिलते नहीं हैं, उनके बीच आपस में बातचीत नहीं होती है, तब तक वे कंपनी के उतने अधिक काम के नहीं हो पाते जितने कि एक छत के नीचे काम करने वाले लोग होते हैं। घर बैठे या दूर बैठे काम करने वालों की उत्पादकता एक साथ काम करने वाले लोगों जितनी नहीं हो पाती। मारिसा ने खुद उस वक्त लोगों को चमकाया था जब उन्होंने छह महीने की गर्भवती रहते हुए याहू के मुखिया की कुर्सी संभाली थी। और बच्चे के जन्म देने के बाद दो हफ्ते में ही वे काम पर लौट आई थीं। उन्होंने अपने दफ्तर में अपने खर्च से बच्चे के लिए एक झूलाघर बनवाया और काम करना शुरू कर दिया।
दुनिया के मंदी के इस दौर में बाजार और मालिक अलग-अलग, और मिलकर भी, इंसानों से कुछ इसी तरह की उम्मीदें बढ़ाते चलेंगे। इसमें कुछ तो मारिसा मेयर की तरह के इंसान अपने ही बीते कल को पछाडऩे के लिए अधिक से अधिक काम करते रहेंगे, और दूसरों के लिए एक मुश्किल मिसाल भी खड़ी करते रहेंगे, और कुछ दूसरे लोग मशीनों के साथ मिलकर अपने काम को बेहतर बनाने, अधिक उत्पादक बनाने में लगे रहेंगे।
एक वक्त जिस ब्रिटेन ने आधी दुनिया पर राज किया था और जिसके बारे में कहा जाता था कि अंगे्रजी राज में कभी सूरज नहीं डूबता, आज वहां का प्रधानमंत्री भी इस बात पर खुश है कि उसके लोगों को अमरीकी कंपनी अमेजान के गोदाम में काम तो मिल रहा है, फिर चाहे यह काम इंसानों के लिए अपमानजनक ही क्यों न लगे, या गोदाम के भीतर रोज पंद्रह मील चलने जैसा ही काम क्यों न हो।
इस मुद्दे पर आज लिखने का एक मकसद यह भी है कि लोगों को आने वाले दिनों के मुकाबले के लिए तैयार रहना चाहिए। न सिर्फ मालिक और मैनेजमेंट का शिकंजा अधिक कड़ा हो सकता है, बल्कि कम्प्यूटरों से होती निगरानी, और उनके काबू के चलते लोगों को अपने काम के लिए अधिक जवाबदेह भी रहना होगा। भारत के बहुत से ऐसे राज्य हैं जहां पर बेहतर काम करने का कोई माहौल नहीं है। न लोग किसी हुनर को सीखने में दिलचस्पी रखते, न अपने काम को बेहतर बनाने की कोशिश करते, ऐसे लोगों को यह मान लेना चाहिए कि आने वाले दिन उनके नहीं रहने वाले हैं। बाजार का मुकाबला कड़ा होते जाने वाला है, और लोग अपनी काबिलीयत, खूबी और मेहनत के बिना रोजगार के बाजार से तेजी से बाहर हो जाएंगे, या घुस ही नहीं पाएंगे। मशीनों के सामने कामचोरी अब अधिक मुमकिन नहीं होगी। एक वक्त गुलामों से काम करवाने के लिए जिस तरह हंटर लिए हुए खड़े मालिकों की तस्वीरें बनाई जाती थीं, अब बिना हंटर कैमरे और कम्प्यूटर उस काम को बेहतर तरीके से करना शुरू कर चुके हैं।


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