संजय दत्त को माफी देने की जस्टिस काटजू की बात पर

विशेष संपादकीय
22 मार्च 2013
-सुनील कुमार
सुप्रीम कोर्ट के भूतपूर्व जज मार्कण्डेय काटजू बिना खबरों में आए कोई हफ्ता नहीं गुजार पाते। और ऐसा भी नहीं कि वे खबरों में आने के लिए ऐसा करते हैं। वे जो करते हैं, उसके पीछे की वजह अहमियत की होती है। उनकी ताजा बात है फिल्म अभिनेता संजय दत्त को माफी देने की अपील। सुप्रीम कोर्ट ने संजय दत्त को जो सजा दी है, उसमें उसे अभी साढ़े तीन बरस जेल में और गुजारने होंगे। ऐसे मामलों में राज्यपाल द्वारा माफी की एक पुरानी मिसाल गिनाते हुए जस्टिस काटजू ने कहा है कि संजय दत्त किसी अपराध को करने में शामिल नहीं था, उसने खासी सजा भुगत ली है, और अब उसे माफ कर देना चाहिए। ऐसा ही खयाल आज सुबह राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने जाहिर किया है, और हमें अधिक हैरानी नहीं होगी कि आज का सूरज ढलने तक कुछ दूसरे राजनीतिक दल, या कुछ दूसरे संगठन, कुछ महत्वपूर्ण लोग संजय दत्त की हिमायत में ऐसी बात कहें। यहां यह याद रखने की जरूरत है कि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी उस महाराष्ट्र में सत्ता का हिस्सा है जहां के राज्यपाल को इस तरह की किसी माफी का हक है। 
हम संजय दत्त के लिए अलग से किसी रियायत के हिमायती नहीं हैं, लेकिन सजा के पीछे की सोच, और सजा के असर पर इस मामले से परे भी कुछ विचार करने की जरूरत है। संजय दत्त ने मुंबई धमाकों के जिम्मेदार माफिया लोगों से एके-47 जैसा हमलावर हथियार लिया, और अपने पास रखा। उनका इससे अधिक और कोई जुर्म नहीं था। बीस बरस पहले के इस जुर्म के लिए वे कई बरस अदालत के चक्कर लगा चुके हैं, और कई बरस जेल में काट चुके हैं। इसके बाद के बरस उन्होंने बिना किसी जुर्म के गुजारे हैं, और फिल्म अभिनय के अपने पेशे का काम किया है। ऐसे में साढ़े तीन बरस के लिए उनको जेल भेजना, और बाकी की कैद देना एक जायज सजा है, जो कि उनकी जगह के किसी भी दूसरे इंसान को मिली होती। लेकिन यहां पर सजा के प्रावधानों में एक नए किस्म के लचीलेपन की बात हम सोच रहे हैं। 
क्या ऐसा कुछ हो सकता है कि कानून में फेरबदल करके ऐसा इंतजाम किया जाए कि गैरपेशेवर मुजरिमों की ऐसी कैद कुछ कट जाने के बाद, उनकी क्षमता का इस्तेमाल समाज के लिए किया जा सके? मिसाल के तौर पर अगले जितने बरस संजय दत्त को कैद में काटने हैं, क्या उसकी जगह उनको अपने पेशे का काम करते रहने देने की रियायत दी जाए, और उसकी पूरी कमाई को समाज में इस्तेमाल किया जाए? और क्या ऐसी रियायत कम कमाई वाले, कम चर्चित, कम महत्वपूर्ण समझे जाने वाले दूसरे लोगों को भी दी जा सकती है? क्या इससे मुजरिम और सजा को एक अधिक सकारात्मक मोड़ दिया जा सकता है? ऐसी कई बातें इस मामले को लेकर शुरू हुई चर्चा के बाद बातचीत के लायक हैं। जब कभी किसी कानून या व्यवस्था में किसी फेरबदल की बात होती है, तो वह ऐसी किसी एक घटना, या कुछ घटनाओं के बाद ही शुरू होती है। कुछ महीने पहले दिल्ली में निर्भया से हुए बलात्कार के बाद आज देश में एक नया कानून लागू हुआ है। उसी हादसे के बाद के माहौल से वह कानून बना, और अब लागू हुआ। इसलिए अगर संजय दत्त को लेकर एक नई चर्चा शुरू होती है, और कानून में एक ऐसा लचीलापन लाया जाता है, जिसका बेजा इस्तेमाल रोका जा सके, और जिससे समाज का कुछ फायदा हो सके, सजायाफ्ता की जिंदगी को खराब करने के बजाय उसका समाज के लिए कोई उत्पादक उपयोग हो सके, तो उसके बारे में सोचना चाहिए। 
हम इसी मामले को लेकर सोचते हैं, तो लगता है कि जिस तरह जेल के भीतर कैदियों से तरह-तरह के काम करवाए जाते हैं, या जैसे छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में ही जेल के कैदी बाहर खाने-पीने की दुकान चलाते हैं, पेट्रोल पंप चलाते हैं, कई शहरों में कैदी बैंड पार्टी बनाकर बाहर जाकर काम करते हैं, और उनकी कमाई जेल में जमा होती है, तो यह भी एक रास्ता निकल सकता है कि संजय दत्त को रोज जेल से बाहर जाकर उनके हुनर का काम करने दिया जाए, और उसकी कमाई को जेल में जमा किया जाए, और उन्हें उसमें से उतना ही हिस्सा मिले, जितना कि किसी कैदी को मिलता है। ऐसा आज देश में जगह-जगह आम कैदियों को जेल के बाहर जाकर काम करने मिल रहा है, ताकि जब वे सजा काटकर बाहर निकलें, तो भूखे न मरें, या बेरोजगार न हों। 
दुनिया के कई दूसरे देशों में भी सजा के कई किस्म के तरीके रहते हैं। भारत में भी अभी-अभी किसी जज ने किसी को गौशाला में जाकर काम करने की सजा दी है। हम राज्यपाल या राष्ट्रपति द्वारा किसी भी तरह की माफी देने के खिलाफ हैं। देश की सबसे बड़ी अदालत द्वारा दी गई सजा के बाद किसी एक व्यक्ति द्वारा उसमें माफी या छूट नाजायज है। लेकिन हम अदालतों द्वारा ही सजा में ऐसे लचीलेपन को सुझा रहे हैं, जिससे किसी मुजरिम को सजा तो मिले, लेकिन साथ-साथ समाज को उसका फायदा भी मिले, वह मुजरिम भी सजा के बाद सामान्य जिंदगी के लायक बचे। अगर सुप्रीम कोर्ट इस सजा में एक शर्त के साथ ऐसी फेरबदल करता है कि सजा के आने वाले बरसों की संजय दत्त की पूरी कमाई मुंबई धमाकों के शिकार परिवारों के लिए मिल जाएगी, या मुंबई की हिफाजत पर खर्च की जाएगी, या नशे से छुटकारे के लिए इस्तेमाल की जाएगी, तो वह ऐसे मामलों में एक बेहतर और सार्थक सजा होगी। 
लोकतंत्र में ऐसे लचीलेपन की गुंजाइश अगर अदालत को मौजूदा कानूनों में नहीं मिलती है, तो कानून में संशोधन करके ऐसा इंतजाम करना चाहिए। बहुत ही दुर्लभ किस्म के मामलों में अदालतें कई तरह की रियायतें कभी न कभी पहली बार करती हैं। हम ऐसी रियायत के बजाय लचीलेपन के ऐसे संशोधन की सिफारिश करेंगे, जो जजों के भी विवेक की मनमानी पर न टिके, और एक नीति-सिद्धांत, पैमाने के आधार पर चले। संजय दत्त को कैद के अगले बरसों में, आम कैदियों की बैंड पार्टी की तरह जेल से रोज बाहर आकर शूटिंग में हिस्सा लेने मिले, तो अपने किस्म का यह एक नया मामला होगा, लेकिन इससे सजा की सोच को एक सकारात्मक मोड़ भी मिलेगा, और आगे के लिए मिसाल भी बनेगी।
हमने आज की बात जस्टिस काटजू की बात से शुरू जरूर की है, लेकिन हम उनकी माफी की बात से सहमत नहीं हैं, हम कैद के तौर-तरीके में समाज के भले के लिए एक फेरबदल सुझा रहे हैं। 


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