14 मार्च 2013
संपादकीय
नए पोप का आना दुनिया में एक बड़ी धार्मिक घटना है। किसी भी धर्म के सबसे अधिक मानने वालों का पोप सबसे बड़ा मुखिया होता है, और कुछ अजीब से ऐतिहासिक कारणों से कैथोलिक ईसाईयों के इस मुखिया को एक राष्ट्राध्यक्ष का दर्जा मिला हुआ है, और इस धर्म के मुख्यालय को एक राष्ट्र का। इटली के रोम के भीतर की यह छोटी सी बस्ती एक देश मानी जाती है, और इसके अलग से पासपोर्ट जारी होते हैं, इसकी अलग से फौज है। यह भी माना जाता है कि दुनिया के जिन देशों में कैथोलिक ईसाई अधिक हैं, वहां पर सरकार से लेकर बाजार तक पोप का प्रत्यक्ष या परोक्ष असर होता है। पिछले पोप ने अपनी खराब सेहत के हवाले से इस धर्म के इतिहास में पहली बार जिंदा रहते-रहते कुर्सी छोड़ दी थी और नए पोप के आने का एक मौका खड़ा कर दिया था। और मानो दुनिया की बदली हुई हवा को देखते हुए एक अश्वेत के पहली बार अमरीकी राष्ट्रपति बनने के बाद एक लैटिन अमरीकी के पहली बार पोप बनने का यह फैसला दुनिया देख रही है।
लेकिन नए पोप फ्रांसिस जिस देश से आए हैं, उस अर्जेंटीना में चर्च का इतिहास फौजी तानाशाही के खून-खराबे पर कम से कम चुप्पी का तो था ही, लोगों का यह भी मानना है कि चर्च ने तानाशाह से अच्छे रिश्ते रखे, और अपने असर का कोई इस्तेमाल खून-खराबे को खत्म करने में नहीं किया। लेकिन यह कोई पहला मौका नहीं है। चर्च का इतिहास हमेशा से ऐसा ही रहा है, और जब हिटलर ने दस लाख से अधिक यहूदियों को नस्ल के आधार पर मार डाला था, तब उस वक्त के पोप चुप थे, और उस वक्त का चर्च चुप था। अभी जब हाल के बरसों में अमरीका ने अपनी बमबारी से मुस्लिम देशों में लाखों बेकसूरों को मारा, तो चर्च फिर चुप रहा। और यह बात अकेले चर्च की नहीं है, पूरी दुनिया का धर्मों का इतिहास इसी तरह का रहा है। खून-खराबे से लेकर काले कारोबार तक, तानाशाही से लेकर दूसरे किस्म-किस्म के जुल्मों तक चर्च हमेशा चुप रहा है और दूसरे मजहब भी हमेशा चुप रहे हैं। और ऐसा करके धर्म अपने-आपको बनाने वालों के साथ वफादारी निभाते हैं। धर्म को और ईश्वर की धारणा को बनाया ही इसलिए गया था कि राजा या कबीले का सरदार लोगों को इस या अगले जन्म का डर दिखाकर, पाप या पुण्य दिखाकर, स्वर्ग और नर्क दिखाकर, राजा के लिए वफादार बनाए रखें। और इस काम को धर्म और ईश्वर की धारणा मिलकर बखूबी करते हैं। इसी काम में धार्मिक नेताओं को लगाए रखने के लिए सत्ता पर बैठे लोग उनके पास जाते हैं, और सत्ता में उनका तरह-तरह का हिस्सा तय करके आते हैं।
ऐसे में जब नए पोप काम संभाल रहे हैं, तो समलैंगिकता से लेकर गर्भनिरोधकों तक उनके दकियानूसी ख्यालों पर भी एक नजर डालना जरूरी है। ईसाईयत के असर वाली दुनिया में गर्भनिरोधकों का इस्तेमाल जब धर्म के नाम पर खारिज किया गया तो अफ्रीका के देशों में एड्स जैसे संक्रामक रोग जंगल की आग की तरह फैले, और चर्च खुद एक दशहत में आ गया। हम इस अखबार की विचारधारा के धर्म-विरोधी होने के बावजूद धर्म के असर, बुरे असर को अनदेखा नहीं कर सकते। और दुनिया का ताजा इतिहास गवाह है कि जब पोप जैसे धर्मगुरू कंडोम के नाम से भी परहेज करते रहे, तो चर्च को मानने वाले लाखों लोग एड्स के अधिक शिकार हुए। इसलिए पोप और चर्च पर असर रखने वाले लोगों को आज यह चाहिए कि वे इस असरदार संस्था को, और साथ-साथ दूसरे धर्मों को भी गुफा से निकालने का काम करें। अब पत्थरों के औजारों के दिन चले गए हैं। अब धर्मगुरू पैदल सफर नहीं करते और उनके अपने निजी विमान होते हैं। इसलिए समय के साथ-साथ धर्म को इंसानियत की तरफ लौटना चाहिए और यह बाद धर्मगुरूओं को सिखाने की जरूरत है, जहां पर आज कमजोर, गरीब या महिलाएं बराबरी के इंसान ही नहीं माने जाते।
सिर्फ कैथोलिक ईसाई ही नहीं बहुत से धर्मों में दुनिया की पिछली सदियों को जिया ही नहीं है, वे अब तक चक्के के आविष्कार के पहले के वक्त में जी रहे, और पत्थरों को मारकर इंसाफ कर रहे हैं। वे महिलाओं को कहीं सती कर रहे हैं, कहीं बेच रहे हैं, कहीं उनकी देह और उनके गर्भ का फैसला कर रहे हैं। धर्म से जुड़ी एक बड़ी खबर के इस मौके पर धर्मों से जुड़े ऐसे बड़े-बड़े कई मुद्दों पर फिर से एक नजर डालने की जरूरत है, क्योंकि आज दुनिया में धर्म ही बेइंसाफी, सामाजिक गैरबराबरी, हिंसा में मौतों का सबसे बड़ा कारण है। दुनिया में सारे युद्ध मिलकर जितनी मौतों के लिए जिम्मेदार नहीं हैं, उससे अधिक मौतें धर्म ने अकेले दी हैं। दुनिया के सारे कारोबारी मिलकर दुनिया के गरीबों को इतना नहीं लूट पाते हैं, उससे अधिक धर्म अकेले लूटता है। इस नौबत को बदलने की जरूरत है, और इसके लिए दुनिया के सबसे बड़े मठ के नए मठाधीश के आने के मौके से बेहतर और कौन सा मौका चर्चा के लिए हो सकता है?

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