संपादकीय
7 मार्च 2013
बाजार की मंदी के बीच तिरूपति के भगवान की कमाई बढ़ती ही चल रही है। कल ही आंकड़े थे कि पिछले एक बरस में कितने हजार करोड़ इस मंदिर में दान में आए। दो-चार दिन पहले ही छत्तीसगढ़ विधानसभा में सरकार की तरफ से यह जानकारी दी गई थी कि राज्य के अलग-अलग ट्रस्टों में जमीनों की क्या गड़बड़ी हुई है या चल रही है। विधानसभा की जानकारी से परे भी पूरे देश में धार्मिक-सामाजिक ट्रस्टों का भ्रष्टाचार जगजाहिर है, और सफेदपोश लोग मुंह पर नकाब बांधे बिना भी ईश्वर या समाज के नाम का यह पैसा खा लेते हैं। छत्तीसगढ़ में खादी की जमीन, बूढ़ी गाय के हक की जमीन, हिन्दू देवी-देवता के नाम की जमीन या ईसा मसीह के नाम की जमीन, सब पर डाका डल रहा है, और जमीनों से परे भी इन ट्रस्टों के पैसे लूटे जा रहे हैं।
एक बड़ी दिक्कत इस कारोबार में यह आती है कि ऐसे ट्रस्टों पर सत्ता और समाज के इतने ताकतवर लोग रहते हैं कि राज्य सरकारों के ढीले-ढाले और छलनी के छेद जैसे छेदों से भरे हुए ट्रस्ट-कानून का इस्तेमाल नए लोगों को पुराने ट्रस्टों में घुसने से रोकने के लिए होता है, और घपलों को छुपाने के लिए होता है। कहने के लिए सभी किस्म के ट्रस्टों पर कलेक्टर नाम के ताकतवर अफसर का काबू रहता है, लेकिन आज के भारतीय लोकतंत्र में ऐसे ताकतवर अफसर पर उन नेताओं का काबू रहता है जो भ्रष्ट ट्रस्टियों के हिमायती रहते हैं। इसलिए कुल मिलाकर गाय की जगह घूरे पर रह जाती है जहां पर वह पॉलीथीन खाकर मरने की राह पर चलती हैं, और उसके नाम पर कुछ भूले-भाले दानदाताओं द्वारा किसी वक्त दी गई जमीन को ट्रस्टी चरते रहते हैं, या बेच खाते हैं। इसी तरह कहीं अनाथ बच्चों के नाम पर, कहीं विकलांगों के नाम पर, कहीं बेसहारा महिलाओं के नाम पर बनाए गए ट्रस्ट अपने ट्रस्टियों को पालते हैं। लेकिन ऐसे ट्रस्टों को देखें तो समझ आता है कि दुनिया में सबसे कमजोर और बेसहारा ईश्वर ही होता है, जो अपने नाम पर चल रही जालसाजी और लूट-डकैती किसी को रोकने के लायक नहीं रहता। ऐसी कमजोरी के बावजूद उसे आस्थावान लोग सर्वशक्तिमान मान लेते हैं, जो कण-कण में मौजूद है, और जिसकी मर्जी के बिना दुनिया का पत्ता नहीं हिलता, और जो पिछले जन्मों का हिसाब इस जन्म में लेता है, और इस जन्म का हिसाब अगले जन्म में। अब कोई आस्थावानों से यह पूछे कि ऐसे बेईमान और चोर ट्रस्टियों की काली नीयत वाले कण में, कण-कण वाला ईश्वर बसा हुआ है या नहीं?
देश में कुछ बड़े धर्मस्थानों को सरकारों ने अपने कब्जे में लिया हुआ है, लेकिन ऐसे मामले गिने-चुने ही हैं। राज्य सरकारों को धर्म, समाज और कमजोर तबकों के नाम पर चलने वाली ऐसी माफिया-दूकानदारी को खत्म करने का हौसला दिखाना चाहिए। ऐसे कुछ बड़े सफेदपोश जब जेल जाएंगे, तो उससे गरीबों के बीच सरकार को वाहवाही मिलेगी, समाज का पैसा लुटने से बचेगा। कमजोर तबकों के नाम पर पैसा जुटता है, और अगर वह उन्हीं के लिए इस्तेमाल होगा, तो हो सकता है कि ऐसे तबकों के इंसानों और जानवरों के दिल से निकली हुई दुआ से भी कड़क सरकार का कुछ भला हो सके।

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