वरूण गांधी भी बरी हो जाएगा तो सजा आखिरी कौन पाएगा?


संपादकीय
9 मार्च 2013
टेलीविजन पर पूरी दुनिया में भाजपा के नौजवान तालिबान वरूण गांधी को यह कहते हुए सुना था कि हिन्दुओं की तरफ हाथ बढ़ाने वाले मुस्लिमों के हाथ वे काट डालेंगे। इसके साथ-साथ मुस्लिमों के लिए दी गई बहुत सी भद्दी गालियां आज तक इंटरनेट पर वीडियो की शक्ल में देखी जा सकती है, सुनी जा सकती है। लेकिन उत्तरप्रदेश की एक अदालत से वे बाइज्जत बरी कर दिए गए, क्योंकि सभी 34 गवाह पलट गए। यहां पर दो सवाल खड़े होते हैं, एक तो यह कि सार्वजनिक जीवन और राजनीति में जो लोग संसद तक पहुंच रहे हैं, वे अपनी कही हुई बातों से किस तरह और किस हद तक मुकर सकते हैं। दूसरी बात यह कि हिन्दुस्तान की न्याय व्यवस्था का क्या हाल है। अगर जुर्म करने वाले लोग ताकतवर होते हैं, तो अदालतें उनको बाइज्जत बरी करने का सामान बनकर रह जाती हैं, क्योंकि कहीं सुबूत खत्म हो जाते हैं, कहीं गवाह मिटा दिए जाते हैं, और कहीं गवाहों की याददाश्त खत्म हो जाती हैं। और यह सिलसिला उत्तरप्रदेश की एक अदालत का है, जहां पर कि आज भाजपा की विरोधी समाजवादी पार्टी का राज है। उस राज की पुलिस भी अपनी याददाश्त खो बैठ रही है, और अदालत में उसे यह भी याद नहीं पड़ रहा कि ऐसी कोई आमसभा हुई थी या नहीं। 
कुल मिलाकर बात यह है कि ताकतवर तबके, चाहे वे राजनीति में परस्पर विरोधी विचारधारा के क्यों न हों, चाहे वे अफसरशाही और नेतागिरी जैसे अलग-अलग पेशों में क्यों न हों, और चाहे वे राजनीतिक धंधे और उद्योग-व्यापार के धंधे में क्यों न हों, ताकतवर एक-दूसरे को बचाने के धंधे में तब तक रहते हैं, जब तक कि न बचाने से उनका कोई फायदा न होता हो। मुसलमानों के हाथ काट देने के जिस वीडियो पर चुनाव आयोग ने भरोसा किया था और पाया था कि उस वीडियो के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं हुई है, उस मामले को भी उत्तरप्रदेश की वह मुलायम सरकार नरमी के साथ हार गई जो कि मुसलमानों की हिमायती होने का दावा करती है। तो बात यह है कि इस लोकतंत्र में इंसाफ किसके साथ हो सकता है? किसी ताकतवर के साथ तो हो नहीं सकता, और अगर इस वरूण गांधी की जगह कोई भूखा गरीब रोटी चुराकर फंसा होता, तो उसे जरूर सजा हो गई रहती। जिस अदालत से वरूण गांधी को बाइज्जत बरी किया गया है, उसके फैसले की कमजोरियां या खामियां, या दोनों, बहुत खुलकर दिखती हैं, और ऐसी सिर्फ एक उम्मीद की जा सकती है कि ऊपर की कोई अदालत ऐसी होगी जहां पर कि अगर मुलायम सरकार इस फैसले के खिलाफ जाएगी तो वहां से वरूण गांधी को सजा होगी। आज पीलीभीत की अदालत से वरूण गांधी छूट जाए, कल हैदराबाद की अदालत से इसी तरह का लेकिन दूसरे रंग का जहर उगलने वाला एक मुस्लिम नेता छूट जाए, तो लोग अदालतों पर भरोसा क्यों करेंगे? और ऐसे में अगर कोई एक धर्म, या कोई दूसरा धर्म सड़कों पर धमाके करके इंसाफ ढूंढने की कोशिश करेंगे, तो उसमें हैरानी की क्या बात रहेगी? हमारा यह भी मानना है कि एक मिलीजुली नूरा-कुश्ती के चलते अगर मुलायम सिंह वरूण गांधी के खिलाफ ऊपरी अदालत तक नहीं जाते हैं, तो भी इस देश का कोई भी नागरिक नफरत के जहर, और हिंसा की धमकी के खिलाफ अदालत जा सकता है, और लोगों को जाना चाहिए।
अब हम उस नैतिकता की बात पर आते हैं जिसका तकाजा आज की भारतीय राजनीति में देना तो नहीं चाहिए, लेकिन हम अपने अखबार की इस जगह पर ऐसे तकाजे को जरूरी समझते हैं। अगर वरूण गांधी ने अपने उगले उस जहर का बरसों तक कोई खंडन नहीं किया था, तो उसे अदालत में अपनी कही बात को खुद ही कुबूल करके इंसाफ का सामना करना था, तभी जाकर सार्वजनिक जीवन में हौसले की बात पूरी होती। एक मजहब के लोगों के हाथ काटने की खुली धमकी मंच और माइक से, कैमरों के सामने देने का तो हौसला है, लेकिन अदालत में उसे मानने का हौसला नहीं है। ऐसे कायर लोग कानून की खामियों के चलते अदालत से तो बच जाते हैं, लेकिन लोगों को इनकी शिनाख्त ठीक से कर लेनी चाहिए। और जहां-जहां ऐसे लोग जाएं, उनसे दिक्कतों वाले सवाल किए जाने चाहिए कि वे अपने बयान पर खड़े रहने का हौसला क्यों नहीं करते? और अब तो मीडिया के लोग अपने फोन पर उस पूरी वीडियो रिकॉर्डिंग को ले जाकर वरूण गांधी जैसे लोगों को, या ओवैसी जैसे लोगों को सुना सकते हैं, कि उनकी याददाश्त क्या बिल्कुल ही चुक गई है?

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