यही संगत के आज के नए पैमाने हैं

25 मार्च 2013
इन दिनों दुनिया के शहरी इलाकों में, और कस्बों तक टीवी की खबरों के अलावा टीवी पर होने वाली बहस भी खासी देखी जाती है। और अगर भारत की बात करें, तो तकरीबन रोज कोई न कोई ऐसा मुद्दा खड़ा हो रहा है जिसके चलते समाचार चैनलों को हर शाम से रात तक अपने स्टूडियो में खासी गरमी खड़ी करने का मौका मिलता है। ऐसी बहसों से लेकर अखबारों में लिए जाने वाले साक्षात्कार तक, और मीडिया की ब्रीफिंग या पे्रस कांफे्रंस में सवाल-जवाब तक कुछ बातें साफ दिखती हैं, और एक खामी जाहिर करती हैं।
यह हाल सिर्फ मीडिया का नहीं है, किसी भी पेशे का है, जहां कि समझ कम होने पर लोग एक अधूरी तस्वीर पेश कर पाते हैं, और साधारण समझ वाले लोग उसे पूरी तस्वीर समझ लेते हैं। कमसमझ वाला कोई डॉक्टर किसी एक जांच के नतीजे को मर्ज तय करने की पूरी बुनियाद मान सकते हैं, और उसी बुनियाद पर पूरा इलाज खड़ा कर सकते हैं। इसी तरह कम समझ वाले मीडिया के लोग, या मीडिया के कमसमझ लोग जब किसी से बात करते हुए बहुत से जरूरी और मायने रखने वाले सवाल नहीं करते हैं, तो सुनने वाले वैसे सवालों की कल्पना नहीं कर पाते, और सामने आई तस्वीर को एक पूरी तस्वीर मान बैठते हैं। इसलिए टीवी पर, खासकर हिंदुस्तान के समाचार चैनलों पर, जो बहस होती है, वह उसी स्तर तक पहुंच पाती है, जिस स्तर की समझ उस बहस को हांकने वाले टीवी प्रस्तुतकर्ता की होती है। 
इनमें से कई लोगों से ऐसे कार्यक्रमों के बाद जब मेरी बात होती है, तो मैं उनके न पूछे गए सवाल, न छुए गए पहलुओं, और न उठाए गए मुद्दों के बारे में पूछता हूं और उनके लिए कुछ दिक्कत भी खड़ी करता हूं। लेकिन यही हाल मेरे साथ काम करने वाले अखबारनवीसों का भी रहता है जब वे किसी प्रेस कांफे्रंस, या पे्रस ब्रीफिंग से उन सवालों को पूछे बिना लौट आते हैं जिनके जवाब दर्शक या पाठक जानना चाहते हैं। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि ठकुरसुहाती या मुसाहिबी के दौर के चलते ताकतवर लोगों से दिक्कत वाले सवाल नहीं किए जाते, और वैसे माहौल में सवालिया अखबारनवीस कड़क हड्डी की तरह खटकते हैं। 
अखबारों में जब इंटरव्यू छपते हैं, तो मुझ जैसे लोग उनको पढऩे के पहले यह भी देखने की कोशिश करते हैं कि इंटरव्यू लेने वाले कौन लोग हैं। इंटरव्यू देने वाले तो जाहिर है कि चर्चित और अहमियत वाले होंगे ही, इंटरव्यू लेने वाले की समझ अगर कम हो, और जैसा कि आमतौर पर होता ही है, तो फिर इंटरव्यू देने वाले इस पूरी बातचीत को अपनी मर्जी के बयान में तब्दील कर देते हैं, और लेने वाले बातचीत की लंबाई से खुश होकर सिर्फ श्रोता बन जाते हैं। जबकि श्रोता, दर्शक या पाठक बनने का हक श्रोता, दर्शक या पाठक का होता है, इंटरव्यू लेने वाले का नहीं। और जब कमसमझ लोग, कम तैयारी के साथ इंटरव्यू लेते हैं, तो समाज के लिए जरूरी जवाब सामने नहीं आ पाते, और बिना किसी घेरेबंदी के खुश लोग इंटरव्यू को एक भाषण की तरह इस्तेमाल कर लेते हैं, अपने विचारों के प्रचार के लिए एक मौका पा जाते हैं।
आज चूंकि टीवी पर होती बहस लोगों की सोच पर बहुत दूर तक असर डालती है, इसलिए इसमें आ रही गिरावट और इसके अधूरेपन से एक फिक्र खड़ी होती है। अच्छे-खासे, नामी-गिरामी टीवी सितारे भी बिना तैयारी के उन घाघ लोगों के बीच रिंग मास्टर की तरह बैठ जाते हैं, जो पेशेवर हैं। अपनी बात को कहने, दिक्कतों के सवालों से बचने में वे माहिर होते हैं, और कमसमझ पत्रकार की उनकी हसरत अक्सर ही पूरी होती रहती है। कई बार टीवी पर शेरों के बीच बैठे रिंग मास्टर को देखकर यह भी लगता है कि ऐसे प्रस्तुतकर्ता आत्ममुग्ध हो जाते हैं कि करोड़ों लोग उन्हें देख रहे होंगे। और जब यह गिनती ही एक उपलब्धि का एहसास कराती है, तो फिर अपने काम में सुधार और बेहतरी की जरूरत को कमसमझ अपने पास फटकने भी नहीं देती। 
अभी मैं टीवी की बहस की बाजारू जरूरतों पर चर्चा भी नहीं कर रहा, जिनके चलते टीवी-प्रस्तुतकर्ताओं को बहस को बेदिमाग हो जाने की हद तक पैना बनाए रखना पड़ता है। समझदारी की बात को काटकर, बखेड़े की बात को बढ़ाने की कोशिश इस मूर्ख इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की मजबूरी बना दी गई है, इसलिए मैं उस  मजबूरी से परे-परे की बात ही कर रहा हूं।
पिछले हफ्ते भी शायद इसी से मिलते-जुलते एक मुद्दे पर लिखना हुआ था कि जस्टिस काटजू ने पत्रकारों के लिए अनिवार्य शैक्षणिक योग्यता की जो बहस शुरू की है, उसमें होना क्या चाहिए। आज फिर इसी मिलते-जुलते मुद्दे पर लिखना इसलिए हो रहा है कि यह पूरा हफ्ता फिर से कई चैनलों पर ऐसी आधी-अधूरी बहस देखते हुए गुजरा जिसके पीछे या तो उस चैनल की अपनी कोई कारोबारी नीयत थी, या फिर प्रस्तुतकर्ता की कमसमझ थी। नतीजा यह हुआ कि लंबी-लंबी बहस देखने के बाद मेरे जैसे साधारण समझ वाले इंसान के मन में न पूछे गए सवालों की लंबी फेहरिस्त बची रह गई। 
यहीं पर आकर लगता है कि लोगों को अच्छे और बुरे टीवी चैनल, अच्छे और बुरे अखबार, अच्छे और बुरे पत्रकार के बीच फर्क करना सीखना होगा, ताकि देखने और पढऩे में, सुनने में उनका वक्त जाया न हो। आज जब हर किसी के पास मीडिया के भीतर दर्जनों विकल्प मौजूद हैं, तो फिर उनमें से बेहतर को अगर नहीं छांटा गया, तो रोज का वक्त खासा खराब होगा। आज तो काम की बात सुनने का, देखने का ही वक्त नहीं है, तो फिर फिजूल की बात में वक्त कैसे और क्यों खराब किया जाए?
इंटरनेट पर कुछ ऐसी वेबसाईटें हैं जो बताती हैं कि इन दिनों कौन लोग क्या पढ़ रहे हैं, क्या देख रहे हैं। इनमें से भी अगर सही लोगों को आप नहीं देखते हैं, तो लापरवाह लोगों की लापरवाह पसंद से छांटे गए लिंक ही आप देखते रह जाएंगे। इसलिए अपनी पसंद को लेकर बहुत सावधान रहने की जरूरत है। आप क्या देखते हैं, और क्या पढ़ते हैं, उससे भी यह तय होता है कि आप क्या बनते हैं। इसलिए जिस तरह एक वक्त कहा जाता था कि इंसान अपनी संगत से पहचाने जाते हैं, उसी तरह आज लोग इस बात से पहचाने जाते हैं कि वे कौन से अखबार पढ़ते हैं, उनकी बातचीत में कौन से लेखक चर्चा में आते हैं, वे टीवी के सामने बैठकर किस चैनल पर क्या देखते हैं, यही संगत के आज के नए पैमाने हैं।

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