धर्मनिरपेक्षता की मोदी की परिभाषा

11 मार्च 2013
विशेष संपादकीय
-सुनील कुमार

बरसों से गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी का अमरीका जाना नहीं हो रहा। गुजरात दंगों के मारे गए हजारों मुसलमानों का लहू उनके मोदी कुरते को छोडऩे का नाम ही नहीं ले रहा। अब जब ऐसा लगने लगा है कि वे प्रधानमंत्री के पद के लिए भाजपा-एनडीए के अगले उम्मीदवार हो सकते हैं, तो एक-एक करके दुनिया के बड़े कारोबारी देशों की सरकारों का यह रूख मोदी के लिए बदल रहा है, लेकिन फिर भी मोदी का एक साइबर-भाषण अमरीका के एक विश्वविद्यालय में तय और घोषित हो जाने के बाद भी नहीं हो पाया क्योंकि कब्र चीरकर लाशें तख्तियां लेकर उठ खड़ी हुईं।
खैर, आज टेक्नालॉजी के जमाने में किसी से एक मंच अगर छिनता है तो उसे दूसरा मंच तुरंत मिल सकता है। अमरीका में बसे हिंदुस्तानी जड़ों के लोगों ने मोदी का एक भाषण सैटेलाइट टीवी पर करवा दिया और उसका अमरीका में टीवी चैनलों पर प्रसारण भी हो गया। इसमें कुछ खास नहीं है, और ऐसा किसी भी नेता के लिए किसी भी दिन किया जा सकता है। हमारी बात इसके बाद शुरू होती है, मोदी की कही बातों से।
नरेन्द्र मोदी अपने राजनीतिक धार्मिक और चुनावी मकसद से स्वामी विवेकानंद के नाम को इस कदर इस हद तक दुह रहे हैं, कि विवेकानंद को अपने होने पर भी आज मलाल होने लगा होगा। जिन्होंने विवेकानंद को कभी जाना नहीं उनको यह लगने लगता कि वे बहुत साम्प्रदायिक और हिंसक इंसान रहे होंगे। उनके नाम की माला जपते हुए मोदी ने धर्मनिरपेक्षता की एक नई परिभाषा दी। उन्होंने कहा कि हिंदुस्तान से पे्रम करने वाले हिंदुस्तानी अपने हर फैसले या काम में सबसे ऊपर भारत को रखकर चलें तो उनकी रगों में अपने आप सेकूलरिज्म दौडऩे लगेगा और दुनिया में भारत का डंका बजने लगेगा।
दुनिया के कारोबारियों को धर्मनिरपेक्षता से कुछ लेना-देना नहीं होता। टाटा को कार-कारखाने के लिए लाल-बंगाल मुश्किल हुआ, तो उसे भगवा-गुजरात उससे भी अधिक माकूल बैठा। दुनिया का एक भी ऐसा कारखानेदार नहीं था जिसे हिटलर या उस जैसे दूसरों से परहेज रहा हो। ऐसे लोगों को मोदी की यह नई धर्मनिरपेक्षता खूब सुहाएगी, साथ-साथ उन लोगों को भी सुहाएगी जिन्हें भारत में हिन्दुत्व का डंका देश का डंका लगता है, या उसके हमले के पीछे दुखी अल्पसंख्यक चीखें जिन्हें सुनने के लायक नहीं लगती हैं।
मोदी ने एक फुटपाथी फेरीवाले के अंदाज में जुबानी तिलस्म बांधते हुए देश के आगे बढऩे को धर्मनिरपेक्षता का विकल्प बनाकर पेश कर दिया। आम लोग जो दिमाग की चर्बी पर जोर डालना नापसंद करते हैं, उन लोगों को, उनमें से गैर अल्पसंख्यकों को यह बात तर्कसंगत और न्याय संगत लगेगी। लेकिन कुदरत से लेकर समाज तक, और लोकतंत्र से लेकर दूसरे किस्म की इंसाफ-पसंद व्यवस्थाओं तक में विविधता की एक भूमिका होती है। अगर इसका कोई फायदा नहीं होता तो कुदरत सभी किस्म के फायदों वाला एक अकेला फल बना देती। दुनिया में समाज कुछ एक ही मजहब बनाता। औरत और मर्द, दो किस्मों के बजाय इंसान एक ही तरह के होते, और मरने के बजाय जीते ही रह जाते। लेकिन विविधता के अपने उपयोग होते हैं। मोदी अपनी टकसाल में एक ही रंग की लाल स्याही के नोट छापकर उसे भारत का डंका बजाना बता दें, तो वह लोकतंत्र नहीं है। लोकतंत्र की राह पर एक धर्म के लोगों की लाशों से गड्ढों को पाटते हुए चलना, डंका बजना नहीं है।
और अभी तो गुजरात के आंकड़े ही यह भी साबित करते हैं कि खुद मोदी-राज का विकास कारखानों और कारोबार का विकास तो है, लेकिन चालीस फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार हैं, कारखानों में बेरोजगारों को बहुत गिने-चुने मजदूरी वाले रोजगार मिले हैं। ऐसी अर्थव्यवस्था में टाटा-अदानी की कमाई को सूखी देह वाले बच्चे की रगों में दौड़ती धर्मनिरपेक्षता मोदी तो मान सकते हैं, देश को जिम्मेदार और समझदार लोग नहीं। मोदी की यह परिभाषा एक बड़ा फरेब है। अपने किए हुए को दबाने-छुपाने, और लोगों को बरगलाने के लिए वे ऐसी लफ्फाजी गढ़ सकते हैं, लेकिन इससे कमसमझ बहुसंख्यक ही प्रभावित हो सकते हैं।
देश में ऐसा एक दूसरा फरेब लंबे समय से कांगे्रस भी चला रही है। जब भी भ्रष्टाचार और घोटालों के लिए उसकी गर्दन फंसती है, वह तुरंत आजादी की लड़ाई की कुर्बानी से लेकर इंदिरा-राजीव की शहादत तक गिनाने लगती है। शहादत कबसे ईमानदारी का विकल्प होने लगी? जैसे देश का डंका मोदी के लिए धर्मनिरपेक्षता का विकल्प है, वैसे ही कुर्बानी और शहादत को कांगे्रस ईमानदारी का विकल्प साबित करते हैं।
ऐसे फरेब चलेंगे नहीं। मोदी जैसे साम्प्रदायिकता के बिना भी छत्तीसगढ़ जैसे भाजपा शासित राज्य तरक्की कर रहे हंै, और सीमित संभावनाओं के बावजूद खासी तरक्की कर रहे हैं। त्रिपुरा में एक गरीब और ईमानदार माक्र्सवादी मुख्यमंत्री भी तीसरी बार जीतकर आ रही है। कांगे्रस नालायकी की उपजाऊ जमीन पर मोदी हो सकता है कि और दो बार सरकार बना लें, लेकिन वे इस देश में धर्मनिरपेक्षता की परिभाषा गढऩे का हक रखने वाले आखिरी नागरिक हैं।

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