संपादकीय
2 मार्च 2013
यूपीए सरकार अपने इस कार्यकाल के आखिरी बरस में चल रही है, लेकिन गृहमंत्री को लेकर इसके सितारे कुछ गर्दिश में हैं, और शुरू से रहे हैं। अपने पहले कार्यकाल में जब शिवराज पाटिल को गृहमंत्रालय देकर यूपीए ने, या बेहतर यह कहना होगा कि कांग्रेस ने, अपनी फजीहत करवाना शुरू किया था, वह आज तक गृहमंत्री के रूप में जारी है। दो कार्यकाल चलते हुए जो भी इस कुर्सी पर रहा उसने बिना किसी वजह से खुद होकर ऐसी फिजूल की बातें कहीं, और सरकार और पार्टी के लिए ऐसी मुश्किलें खड़ी कीं, कि जिन्हें लेकर एक किताब लिखी जा सकती है कि राजनीति में और सरकार में रहते हुए क्या-क्या न किया जाए, क्या-क्या न कहा जाए।
पाठकों को याद होगा कि शिवराज पाटिल ने यूपीए का गृहमंत्री बनते ही पहला बयान दिया था कि नक्सल हिंसा राज्यों की समस्या है, और केन्द्र का इससे कोई लेना-देना नहीं है। इसके बाद जल्द ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को यह कहना पड़ा था कि नक्सल हिंसा देश की सबसे बड़ी आंतरिक समस्या है। जब मुंबई में आतंकी हमला हुआ, तो शिवराज पाटिल का हाल देखने लायक था। हमले से निपटने के लिए दिल्ली से कमांडो लेकर जो विमान जाने वाला था उसे शिवराज पाटिल ने इसलिए एक घंटे लेट करवाया ताकि वे उसमें जा सकें। और इस मौके पर उन्होंने दिनभर में जिस तरह से तीन-चार बार कपड़े बदल-बदलकर मीडिया के कैमरों के सामने एक फैशन परेड की थी, वह बात किसी बेवकूफ के लिए भी शर्मनाक हो सकती थी, और यह काम किया था एक बुजुर्ग गृहमंत्री ने, देश पर हुए सबसे बड़े आतंकी हमले के दौरान। उनकी ऊटपटांग हरकतों का कोई अंत नहीं था।
इसके बाद पी.चिदम्बरम ने गृहमंत्री बनने के बाद हैदराबाद जाकर जिस तरह से तेलंगाना की मुनादी कर दी थी, उससे उनकी सरकार की ऐसी थू-थू हुई, कि आन्ध्र और तेलंगाना कांग्रेस के हाथ से न सिर्फ निकले हुए दिख रहे हैं, बल्कि कांग्रेस-यूपीए को समझ ही नहीं आ रहा है कि इसका क्या किया जाए। इसके बाद सुशील कुमार शिंदे को गृहमंत्री बनाया गया, तो उन्होंने आरएसएस और संघ परिवार के शिविरों पर आतंकी-ट्रेनिंग का एक ऐसा बयान पार्टी के मंच से अतिउत्साह में दिया, जिसे साबित करने का उनके पास कोई जरिया नहीं था।
संसद का 2011 का एक सत्र चिदम्बरम के खिलाफ बहिष्कार में बर्बाद हुआ था, और इस बार शिंदे की वजह से संसद सत्र फिर खत्म होने जा रहा था। ठीक एक दिन पहले उन्होंने अफसोस जाहिर करते हुए अपनी बात वापिस ली। और मानो गृहमंत्रालय को बिना परेशानी मोल लिए मजा नहीं आता हो, कल संसद में शिंदे ने विदर्भ में बच्चियों के बलात्कार पर बयान देते हुए उन बच्चियों के नाम पढ़े। आज जब पूरे देश में बलात्कार को लेकर खबरों के सैलाब महीनों से चल रहे हैं, जब देश के जख्म रिस ही रहे हैं, तब देश का गृहमंत्री यह भी नहीं समझ रहा कि कानून के खिलाफ जाकर वह संसद के भीतर बच्चियों के नाम पढ़ रहा है। हमारे हिसाब से गृहमंत्री को उनके मंत्रालय के अफसरों ने जब ये नाम लिखकर दिए होंगे, तो उन्होंने देश के कानून के हिसाब से एक अपराध किया। और जब गृहमंत्री ने संसद में ये नाम पढ़े तो उन्होंने उससे और बड़ा अपराध किया। कल ही जब संसद में वे अरूण जेटली सहित भाजपा के बहुत से नेताओं के टेलीफोन कॉल रिकॉर्डस् के बारे में बयान दे रहे थे, तो इस जुर्म को मानो अनदेखा करते हुए उनका बयान यह था कि जेटली का टेलीफोन टैप नहीं किया गया था, कॉल रिकॉर्ड ही निकलवाए गए थे। ऐसा गंभीर अपराध होने के बाद गृहमंत्री का यह बयान बहुत अटपटा था, और अपराध पर फोकस होने के बजाय, उनकी बात का फोकस इस पर था कि और बड़ा अपराध नहीं हुआ है, और यह काम सरकार ने नहीं किया है। जबकि यह पूरा मामला सरकार की जिम्मेदारियों की नाकामयाबी का है, और इसके लिए सरकार को कार्रवाई करनी है, लेकिन सरकार की जिम्मेदारी मंजूर करने के बजाय वे अपराध को हल्का बताने में लगे रहे, और एक तरह से यह साबित करते रहे कि किसी गैरसरकारी आदमी के अपराध करने के लिए मानो सरकार जवाबदेह ही नहीं है।
कांग्रेस और यूपीए को अपने गृहमंत्रालय के बारे में सोचना चाहिए, कि सिर्फ गैरजिम्मेदारी के बयानों से एक के बाद दूसरा, दूसरे के बाद तीसरा गृहमंत्री किस तरह फजीहत खड़ी कर रहे हैं। टोटकों को मानने वाले लोग गृहमंत्रालय में हवन करवाने की सलाह भी दे सकते हैं।

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