संपादकीय
20 मार्च 2013
श्रीलंका को लेकर भारत में केन्द्र की यूपीए सरकार के खिलाफ उसका ही कल तक का भागीदार एक दल, डीएमके, जिस तरह से खड़ा हो गया है उसे लेकर हमने कल ही यहां पर चर्चा की थी, लेकिन उस मुद्दे पर आज फिर बात को आगे बढ़ाने की जरूरत है। केन्द्र सरकार का हाल बेहाल और बदहाल तो दिख रहा है, लेकिन डीएमके इस मुद्दे पर अलग-थलग पड़ जा रही है। केन्द्र में भाजपा भी उसका साथ देते नहीं दिख रही है, क्योंकि देश के राष्ट्रीय हितों के मुकाबले अगर एक प्रांत तक सीमित एक राजनीतिक दल एक क्षेत्रीय चुनौती को इस तरह से खड़ा कर रहा है, तो वह कल देश के सामने एक ऐसी खराब मिसाल रखेगा, जिसे कि भाजपा की राष्ट्रीय सरकार भी नहीं सुलझा पाएगी।
श्रीलंका में तमिलों के साथ हुई ज्यादतियों को लेकर डीएमके की राजनीति के बारे में कल देर रात तक अलग-अलग राजनीतिक विश्लेषकों का यही मानना रहा कि वह बेमौके पर बरसों पुराने ऐसे मानवसंहार को लेकर यूपीए गठबंधन को तोड़ रहा है जिससे उसका कुछ घरेलू टकराव चल रहा था। डीएमके के मंत्रियों के भ्रष्टाचार के चलते आज यह पार्टी केन्द्र में यूपीए सरकार के लिए शर्मिंदगी की सबसे बड़ी वजह बनी हुई है। और डीएमके के मुखिया, उसके मालिक, करुणानिधि की बेटी इसी भ्रष्टाचार के मामले में महीनों तक जेल में रही, इसलिए उनका दर्द जायज है, लेकिन उनकी राजनीति नाजायज है। क्षेत्रीय दलों को यह बात समझनी होगी कि किसी देश के साथ उनके प्रांत के किसी मजहब या किसी जाति के लोगों को लेकर अगर कोई शिकायत है तो वह भारत के राष्ट्रीय हितों से ऊपर नहीं जा सकती। इसीलिए केन्द्र और राज्य के संबंधों में विदेश नीति को पूरी तरह केन्द्र सरकार के एकाधिकार में रखा गया है। कल भी हमने सरसरी तौर पर इस बात को छुआ था कि अगर अलग-अलग राज्य अलग-अलग देशों के साथ टकराव खड़े करेंगे तो उससे भारत की फजीहत होगी। कल के दिन अगर कश्मीर भारत-पाक संबंधों पर सवाल उठाएगा, अरूणाचल भारत-चीन संबंधों में अपनी दिक्कत ढूंढेगा, पश्चिम बंगाल और असम बांग्लादेश के साथ अपनी सरहदी दिक्कतों को देश से अधिक महत्वपूर्ण मानेंगे, राजस्थान पाकिस्तान के साथ टकराव ढूंढने लगेगा, और कोई प्रदेश भूटान के साथ, कोई बर्मा के साथ, और कोई नेपाल के साथ भिड़ जाएगा, तो देश का क्या होगा?
डीएमके ने अपनी ताजा हरकत से भारतीय राजनीति में एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया है कि क्षेत्रीय दलों की बैसाखियों को लेकर चलने वाली केन्द्र की गठबंधन सरकारों को किस-किस तरह के समझौते करने पड़ते हैं, और ऐसे समझौते देश को कितने भारी पड़ सकते हैं? यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। एक भ्रष्ट पार्टी के भ्रष्ट मुखिया का भ्रष्ट कुनबा, अपनी खाल को बचाने के लिए, अपने खानदानी हिसाब को चुकता करने के लिए भारतीय लोकतंत्र को चला रहे गठबंधन को इस तरह से ब्लैकमेल करे, यह ठीक नहीं है। इससे आम जनता चाहे क्षेत्रीय दलों की इस हरकत को ठीक से समझ सके या न समझ सके, इससे क्षेत्रीय दलों की साख एक तबके के रूप में खराब हुई है। ममता बैनर्जी ने अपने घमंड और अपनी बदतमीजी के चलते बांग्लादेश के साथ अपने प्रदेश के टकराव को भारत से ऊपर रखा और मनमोहन सरकार के लिए एक शर्मिंदगी खड़ी की।
यह एक ऐसा मौका है जिसमें भारत के वामपंथी दलों को एक अधिक समझदारी दिखाने की जरूरत है, लेकिन उनमें से कम से कम एक नेता टीवी की बहस पर लगातार स्थानीय तमिल मुद्दों को राष्ट्रीय हित से ऊपर दिखाते हुए बहस कर रहे हैं। वामपंथियों को ऐसी बहस को संसद में समर्थन या विरोध तक नहीं ले जाना चाहिए, और इस मुद्दे पर यूपीए सरकार को गिराने की किसी सोच का साथ नहीं देना चाहिए। यूपीए सरकार को गिराने या हटाने या खारिज करने की सौ दूसरी वजहें हो सकती हैं, लेकिन श्रीलंका के मुद्दे पर इसे हटाने या इसे अकेला छोडऩे का एक बड़ा नुकसान देश की विदेश नीति में, देश के केन्द्र-राज्य संबंधों में एक गलत मिसाल के रूप में होगा, जो कि नहीं होना चाहिए।

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