संपादकीय
1 अपै्रल 2013
भारतीय जनता पार्टी ने कल अपने संगठन में जो फेरबदल किए हैं, वे पिछले हफ्ते-दस दिन से खबरों में थे, और उनमें हैरानी की कोई बात नहीं है। लेकिन अब उनकी मुनादी हो जाने के बाद वे नाम चर्चा के लायक हैं। खासकर गुजरात से आए हुए दो नाम, मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी, और उनके गृहमंत्री रहे हुए अमित शाह। गुजरात दंगों के अलावा अमित शाह का नाम कुछ फर्जी मुठभेड़ों में हत्याओं में भी रहा और वे ऐसे मामलों में अदालत से मुख्य अभियुक्त के रूप में जमानत पर बाहर आए हैं। उनके मामले बहुत गंभीर इसलिए रहे कि अदालत ने एक समय यह भी पाया कि उनके खिलाफ गुजरात के भीतर मुकदमा चल पाना आसान नहीं है। लेकिन गुजरात के लिए यह नई बात नहीं है। मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी खुद अभी अदालती कटघरे तक नहीं पहुंचे हैं, लेकिन उनकी एक महिला मंत्री दंगों में सजा पाकर जेल में है। दूसरी तरफ पूरी की पूरी सरकार पर दंगों के आरोप लगते रहे, लगे हुए हैं, और कई तरह की साम्प्रदायिक हत्याओं के मामले सत्ता, संगठन और समर्थकों के खिलाफ चल रहे हैं।
ऐसे में तीसरी बार के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को भाजपा में एक बड़ी अहमियत देना तो समझ आता है लेकिन उनके वजन को बढ़ाने वाली एक और कुर्सी उनके खास अमित शाह को देकर भाजपा ने आक्रामक हिंदुत्व वाला रूख भी दिखाया है और पार्टी के भीतर नरेन्द्र मोदी के अब बेकाबू बढ़ चुके वजन को भी मान लिया है। इन दोनों के बीच हो सकता है कि कोई बहुत बड़ा फासला भी न हो, और मोदी के साथ भाजपा हाईकमान के बीच कोई तनातनी भी न हो। वैसे भी संगठन के भीतर के मामले हमारे अधिक काम के नहीं हैं। लेकिन अगले चुनाव में भाजपा किस विचारधारा और किस रणनीति को लेकर सामने आएगी उसका जो सुबूत अब संगठन की लिस्ट में दिख रहा है, वह चर्चा के लायक है।
यह भारतीय लोकतंत्र के लिए, और खुद भाजपा के लिए एक बेहतर बात है कि वह एनडीए के बाकी साथियों की सोच की परवाह से अधिक अपनी खुद की पार्टी के चरित्र की परवाह करे। पिछले बरसों में भाजपा का हिंदुत्व, एनडीए की पीठ पर सवारी की वजह से कुछ दबा-छुपा चल रहा था। और साफ छुपते भी नहीं सामने आते भी नहीं, जैसी नौबत चल रही थी। यह बात देश के माहौल के लिए भी ठीक नहीं थी। अब चुनावी नतीजे चाहे जो हों, भाजपा ने अपनी विचारधारा को कल की लिस्ट के साथ खुलकर सामने रख दिया है, और वरूण गांधी से लेकर अमित शाह तक के नाम झंडों की तरह सामने हैं। एक राजनीतिक विश्लेषण की बात करें, तो भाजपा को इससे अधिक नुकसान होते भी नहीं दिखता। नीतीश कुमार जैसे एक साथी के बाहर जाने पर, हो सकता है कि हिंदू वोटों का धु्रवीकरण भाजपा के अधिक काम आए।
राजनीति में लोगों को अपनी नीयत साफ रखनी चाहिए। साफ से मतलब, जरूरी नहीं कि साफ-सुथरी, बल्कि जनता के सामने साफ-साफ रखनी चाहिए। और 1992 के अयोध्या के बाद से आज तक भाजपा पर यह आरोप लगते रहे कि वह सहूलियत के हिसाब से अपने झंडे में भगवा का अनुपात कम ज्यादा करते रहती है, मोदित्व को महत्व देने के साथ अब उसने ऐसे आरोपों से छुटकारा पा लिया है। बाबरी मस्जिद गिराने के आरोपों को झेल रहे सारे बड़े नेताओं के साथ भाजपा अब तक चलती रही है, चल रही है। और अब उसने यह साफ कर दिया है कि गुजरात दंगों के आरोपों और मामले-मुकदमों को लेकर उसके मन में कोई हिचक नहीं है। और अगर याद करें तो भारतीय राजनीति में यह नौबत 1984 के सिख विरोधी दंगों के आरोपी कांगे्रसियों को दशकों तक केंद्रीय मंत्री बनाकर रखने की परंपरा का ही विस्तार था।

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