जनता के नमक का हक अदा न करने वाले सांसदों के लिए


29 अपै्रल 2013
संपादकीय
भारतीय संसद ने काम करना फिर ठप कर दिया है। देश में बहुत से ऐसे मामले संसद के हर सत्र के पहले होते ही रहेंगे, जिनको लेकर संसद में काम न करने का एक रास्ता निकाला जा सके। लेकिन देश की जनता सांसदों की इस हरकत को देख-देखकर थक चुकी है। जिस काम के लिए जनता सांसदों को चुनती है, उन्हें बंगले देती है, हवाई टिकटें देती है, मोटी तनख्वाह देती है, बारातियों जैसा आलीशान खाना फुटपाथ के रेट पर देती है, वह जनता संसद में काम ठप देखकर सिर्फ नफरत करती है, और सांसदों को हिकारत से देखती है। आज ही कुछ ऐसे आंकड़े आए हैं जो बताते हैं कि आजादी के बाद से पांच बरसों में इस बार संसद सबसे कम काम वाली है। कार्यकाल पूरा करने के बावजूद जो सबसे कम उत्पादक रहे, उस पर भारतीय लोकतंत्र कैसा फख्र कर सकता है? लोकसभा सचिवालय के आंकड़े बता रहे हैं कि यह पन्द्रहवीं लोकसभा वक्त की बर्बादी में इसके ठीक पहले कि चौदहवीं लोकसभा से कड़ा मुकाबला कर रही है, और शायद यह पिछली लोकसभा से भी कम उत्पादक रहने जा रही है। लोगों को दो बातें याद रखने की जरूरत है। एक तो यह कि ये दोनों लोकसभा के कार्यकाल यूपीए की सत्ता के रहे, और एनडीए के विपक्ष के रहे। दूसरी बात यह कि यूपीए ने अपने इस दूसरे कार्यकाल में विरोध के बहुत मौके दिए, और एनडीए ने संसद के वक्त की पेटभर बर्बादी की। और संसद की रियायती कैंटीन मेें पेट भर-भरकर भी संसद का पेट खाली रखा। 
यह हालत इतनी शर्मनाक है कि जिस विपक्ष को संसद के भीतर सरकार को घेरना चाहिए, वह सिर्फ टीवी चैनलों की बहसों में यह काम कर रहा है। तो क्या इसे ऐसा समझा जाए कि यह संसद का इलेक्ट्रॉनिक-निजीकरण हो गया है? आज का जमाना आर्थिक उदारीकरण के चलते हर काम के निजीकरण का हो रहा है। और ऐसे में संसद में बहस से बचकर जब विपक्ष सिर्फ टीवी स्टूडियो में, और टीवी कैमरों के सामने, टीवी के परदों पर सत्ता से बहस करता है, तो यह लगता है कि इन सांसदों को खाना भी टीवी चैनलों से ही मांगना चाहिए, और अपना भत्ता भी, वेतन भी इन्हीं चैनलों से लेना चाहिए। जो जनता के पैसों का खाए, और टीवी के धंधे के लिए गाए, उसे क्या कहा जा सकता है, यह पाठक सोचें। उर्दू में इसके लिए एक शब्द है, जिसे संसद अपनी कार्रवाई में घुसने नहीं देती, लेकिन जिसे हम गाली नहीं मानते, सही तस्वीर बयां करने वाला एक शब्द ही मानते हैं। जब देश की गरीब जनता के पसीने के नमक का हक इस संसद के लोग अदा न कर सकें, तो उनके बारे में वह जनता क्या सोचती है, इसे काम न करने वाले सांसद पता लगा लें।
संसद का काम संसद में ही हो सकता है। वहां काम न करके विपक्ष कुछ साबित नहीं करता। हमको विरोध के तरीके में जापान के हड़ताली कर्मचारियों का तरीका याद पड़ता है, जो कि काम के घंटों के बाद अतिरिक्त घंटे काम करके इतना उत्पादन कर देते हैं कि कंपनी परेशानी में पड़ जाती है। अगर भारतीय संसद में विपक्ष को सत्ता को घेरना ही है, तो उसके लिए संसद से बेहतर कोई जगह नहीं हो सकती, जहां पर कि विपक्ष के विशेषाधिकार भी रहते हैं। जहां पर सरकार झूठ बोलने के पहले चार बार सोचने को मजबूर रहती है। ऐसी जगह को छोड़कर विपक्ष को टीवी चैनल सूझते हैं, यह शर्मनाक है। फिर संसद बाकी देश के लिए एक मिसाल भी रहती है। वह प्रदेशों की विधानसभाओं को रास्ता दिखाती है, और इसी किस्म की बर्बादी बाकी जगह भी होने लगती है। विपक्ष को बहिष्कार करने का कोई मुद्दा चाहे कितना ही महत्वपूर्ण क्यों न लगता हो, वह संसद में काम करने से अधिक महत्वपूर्ण नहीं हो सकता। अब समय आ गया है कि सरकारी नौकरी की तरह सांसदों और विधायकों के लिए काम नहीं-तो-वेतन नहीं का इंतजाम लागू करना चाहिए। संसद की कार्रवाई जितने घंटे तय होते हैं, उनमें से जितने घंटे सांसद काम करें, उतनी देर उनका मीटर घुमाकर उनको वेतन भत्ते मिलने चाहिए। भारतीय लोकतंत्र की बर्बादी उस संसद में सबसे अधिक हो रही है, जो संसद अपनी बहसों के लिए आज भी लोकतंत्र के इतिहास में दर्ज है।

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