जंगखोरों के नगाड़ों के बीच समझदारी की बात मुश्किल


संपादकीय
27 अप्रैल 2013
पाकिस्तान की जेल में बंद एक हिंदुस्तानी पर वहां हुए हमले को लेकर भारतीय इलेक्ट्रॉनिक मीडिया खासा विचलित है। और वह इस बात पर भी विचलित है कि लद्दाख में चीन ने भारत के कहे जा रहे इलाके में घुसपैठ की है, और भारत सरकार इसके खिलाफ फौजी कार्रवाई नहीं कर रही है। पाठकों को याद होगा कि एक भारतीय सैनिक का सिर कटा बदन मिलने के बाद भारतीय मीडिया का एक तबका, और भारतीय राजनीति का एक हिस्सा, इस कदर विचलित थे कि पाकिस्तान के खिलाफ जंग की बातें छिड़ गई थीं, गनीमत कि जंग नहीं छिड़ी। इन्हीं दिनों श्रीलंका में तमिलों के साथ बुरा बर्ताव खबरों में आने पर उसके खिलाफ कड़ी अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई की मांग होने लगी थी। ये तो कुछ बातें दूसरे देशों के साथ रिश्तों को लेकर हैं। लेकिन इससे परे देश के भीतर के भी ऐसे बहुत से मामले हैं जिनको लेकर जनता के बीच तनाव और आंदोलन के चलते कई किस्म की कड़ी बातें की जाती हैं। 
सच और तथ्य का हर बार जनधारणा से कुछ रिश्ता होना जरूरी नहीं होता। जनधारणा अलग होती है, और हकीकत कई बार उससे बिल्कुल अलग। उत्तेजना में भरी हुई भीड़ के बारे में कहा जाता है कि भीड़ में सिर बहुत होते हैं, दिमाग एक भी नहीं होता, यह बात भी कई जगहों पर लागू होती है। भारत में हाल के बरसों में मीडिया, खासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अपने-आपमें एक भीड़ की तरह बर्ताव करने लगा है, और कई मौकों पर उसने यह साबित किया है कि उसके रूख का दिमाग से अधिक रिश्ता नहीं रह जाता। इसी तरह भारत के भीतर एक ऐसा राजनीतिक तबका है जो अपनी साम्प्रदायिक और धर्मांध राजनीति के चलते पाकिस्तान के साथ युद्ध को भारत की दिक्कतों का एक बड़ा इलाज मानता है, और चीन के खिलाफ फौजी कार्रवाई भी कुछ तबकों को एक आसान इलाज दिखता है। भारतीय टीवी पर कुछ रिटायर्ड फौजी अफसर इस बात पर मलाल करते दिखते हैं कि फौज को दो-दो हाथ करने देने के बजाय दिल्ली में बैठे नेता बातचीत को रास्ता मानते हैं। इन अफसरों की यह सोच उस तंग नजरिए का सुबूत है जिसके तहत लोग अपने हुनर, अपनी खूबी, अपनी ताकत और अपनी शान को ही अकेला हल मानते हैं। एक पुरानी कहावत चली आ रही है कि गिलहरी को नीम का फल मिला, तो हकीम बन बैठी। भारत में भी कुछ ऐसे लोग हैं जिनको महज बंदूक की समझ है, और वे हर खतरे का इलाज बंदूक को मानते हैं। 
जंग की बातें उन्हीं लोगों को सुहा सकती हैं, जिन्होंने जंग से कभी जख्म नहीं खाए हैं। दुनिया के किसी युद्ध से कभी यह साबित नहीं होता कि सही कौन है, किसी भी जंग से महज यह साबित होता है कि अधिक ताकतवर कौन है। दुनिया में एक ऐसा जंगखोर तबका भी होता है, जो लड़ाई के वक्त हथियार और बाकी सामान खपाकर कमाई करता है। ऐसे तबके की तरफ से मीडिया के मार्फत, राजनीति के मार्फत देश को भड़काने की साजिशों में कुछ भी छुपा हुआ नहीं है। पूरी दुनिया में जंग के सौदागर पूरे वक्त यह काम करते रहते हैं, और भूखों के निवालों के बजाय वे गोलियों को अधिक जरूरी साबित करते रहते हैं। भारत के अलावा भी दूसरे देशों में हथियार-माफिया का यही रूख रहता है, और इसके लिए वे एक नहीं, कई सिर काटकर फेंक सकते हैं। कई बार हमको यह भी लगता है कि फौज के जो रिटायर्ड आला-अफसर लोकतंत्र में विशेषज्ञ-रणनीतिकार की तरह पेश किए जाते हैं, वे भी हथियार-कंपनियों की सेहत के लिए मददगार होते हैं। 
इसलिए हिंदुस्तान हो, या कि कोई और मुल्क, लोगों को अपने दिल-दिमाग पर काबू रखना चाहिए। किसी देश के भीतर ही, उसकी जेलों में अपने ही लोग, अपने ही देश के कैदी को कितनी ही बार नहीं मारते हैं? कई बार मौतें होती हैं, और कई बार ऐसे आरोप भी सामने आते हैं कि जैसे दिल्ली-बलात्कार के मुख्य अभियुक्त के दिल्ली जेल में आत्महत्या के बाद सामने आए हैं। इसलिए अगर किसी दूसरे देश की जेल में किसी दूसरे देश के कैदी पर हमला होता है, तो उसे उस दूसरे देश पर हमला मान लेना, या करार देना ठीक बात नहीं है। कल के दिन भारत की किसी जेल में पाकिस्तान के किसी कैदी पर हमला क्या हो ही नहीं सकता? और क्या वैसे दो-दो हाथ कर लेने की बात ठीक होगी? 
मीडिया से लेकर राजनीति तक, इन तमाम ताकतों को अपनी हस्ती बचाए रखने के लिए कई किस्म के उकसावों की मदद लेनी पड़ रही है। जब जनता के कम जागरूक बनाकर रखे गए तबके के बीच भड़काने वाली बातों पर अधिक दर्शक, अधिक तालियां, अधिक वोट मिल सकते हैं, तो फिर जंग की बातें तेजी से उठाई जाती हैं। 
दुनिया के हर देश में राजनीतिक शिक्षण की जरूरत है, लोकतंत्र और इंसानियत की जरूरतों को समझने की जरूरत है, और जंग के उकसावे से बचने की जरूरत है। हमारा लिखा हुआ चूंकि हिंदुस्तान में ही अधिक पढ़ा जाएगा, या देश के बाहर बसे हिंदुस्तानी ही इसको अधिक पढ़ेंगे, इसलिए यहां पर हिंदुस्तान की मिसालें अधिक हैं। आज भारत में दिक्कत यह है कि किसी पार्टी का कोई ऐसा अमनपसंद बड़ा नेता भरोसेमंद नहीं रह गया है जिसकी कही बातों का असर युद्धोन्मादी लोगों की बातों से अधिक हो। भारत के लिए यह एक खतरनाक नौबत है। भारत के पड़ोस के पाकिस्तान में दुनिया ने देखा हुआ है कि किस तरह युद्धोन्माद युद्ध और आतंक तक ले जाकर छोड़ता है।

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