यूपीए चले बाजार चाहे भौंकें हजार...


संपादकीय
30 अप्रैल 2013
सुप्रीम कोर्ट में आज मनमोहन-सरकार को जो शर्मिंदगी देखनी पड़ी है, वह  भारत के इतिहास में कम बार ही दर्ज हुई होगी, हो सकता है कि शायद कभी नहीं। और यह तो तय है ही कि निजी ईमानदारी के दावे वाले प्रधानमंत्री के राज में तो ऐसा भारतीय लोकतंत्र में कभी नहीं हुआ था, और होना भी नहीं चाहिए। इसी यूपीए सरकार के कोयला घोटाले को लेकर सुप्रीम कोर्ट के हुक्म से, उसकी निगरानी में जो जांच चल रही है, उसकी जांच-स्थिति की रिपोर्ट सीबीआई ने अदालत में पेश करने के बजाय पहले उसे सरकार को दिखाया, उन मंत्रालयों को दिखाया जिनके चेहरों पर इस कोयला-घोटाले की कालिख लगी हुई है। आज सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को लेकर सरकार को जो फटकार लगाई है, और जितना धिक्कारा है, वह इस सरकार पर तो असर डालेगा या नहीं, पता नहीं, लेकिन इसने भारत के लोकतंत्र को हक्का-बक्का कर दिया है। 
सुप्रीम कोर्ट ने आज जो कहा, उसकी कुछ बातों को यहां पर देना जरूरी है। 
अदालत ने कहा- ....रिपोर्ट में जानकारी साझा करने की बात क्यों छिपाई गई? 12 मार्च को एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ने कोर्ट को क्यों गुमराह किया और 26 अप्रैल को दिए हलफनामे में ड्राफ्ट में हुए बदलाव का  जिक्र क्यों नहीं था ?.... रिपोर्ट में क्या बदलाव किए गए।  किसके कहने पर रिपोर्ट बदली। तीन लोगों के अलावा किसको-किसको दिखाई।  किस नियम के तहत कानून मंत्री को दिखाई रिपोर्ट।.... सरकार के साथ सूचना साझा किए जाने से पूरी प्रक्रिया को गड़बड़ा दिया है।.... स्टेटस रिपोर्ट सरकार से साझा करने से हमारी जांच की बुनियाद हिल गई है।....सीबीआई की जांच स्वतंत्र होनी चाहिए और उसे कोई प्रभावित न करे। सीबीआई को राजनीतिक प्रभाव से मुक्त किया जाए। अब पहली कोशिश सीबीआई को राजनीतिक दखल से आजाद कराने की होगी। सीबीआई को राजनीतिक आकाओं से मुक्त कराना होगा और जांच एजेंसी के इनके निर्देश की जरूरत नहीं है।....सीबीआई द्वारा पर्दा डालना सामान्य बात नहीं है।...आपको अपने राजनीतिक मालिकों से निर्देश लेने की जरूरत नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट के जजों के कहे हुए ये वाक्य टुकड़े-टुकड़े में भी मनमोहन सरकार की करतूत के बारे में तस्वीर साफ करते हैं। और जिस वक्त हम यह लिख रहे हैं, उसी वक्त देश की संसद भी इस पर फिक्र कर रही है, और देश में जो सोचने-विचारने वाले लोग हैं वे भी यह सोच रहे हैं कि मीडिया, जनसंगठन, अदालतें और विपक्ष कब तक इस सरकार के खिलाफ मामले उठाएंगे, और उनका हश्र क्या होगा? यह नौबत बुरी तरह अलोकतांत्रिक और शर्मनाक हो चुकी है। इस सरकार का हाल ऐसा दिख रहा है कि हाथी बाजार से गुजर रहा है, और कुत्ते उस पर भौंक रहे हैं, और वह बेखबर, बेफिक्र चले जा रहा है। यहां पर हम एक कहावत की तरह की मिसाल दे रहे हैं, इसका मकसद किसी जानवर या इंसान की बेइज्जती नहीं है, लेकिन ऐसा लगता है कि मनमोहन सिंह, यूपीए और कांग्रेस ने इसे अपनी नीति बना लिया है कि हाथी चले बाजार, कुत्ते भौंकें हजार...।
दो ही दिन पहले सीबीआई द्वारा सुप्रीम कोर्ट में हलफनामे पर यह मंजूर करने पर कि उसने कानून मंत्री और कुछ मंत्रालयों से अदालत में देने के पहले रिपोर्ट साझा की थी, हमने इसी जगह कुछ कड़ी बातें लिखी थीं, और आज हम उससे अधिक कड़ी नई बातें लिखना चाहते हैं। हमने लिखा था- यूपीए सरकार ने सार्वजनिक जीवन और लोकतंत्र में नैतिकता और सामाजिक जवाबदेही के पैमानों को एक-एक करके घोलकर पी लिया है। यह कौन कल्पना कर सकता है कि सुप्रीम कोर्ट की सीधी निगरानी में चल रही जांच में भी यह सरकार सीधे दखल रख रही है। इसके बाद फिर बचता क्या है? भारत सुप्रीम कोर्ट सीबीआई से ऊपर देश के बाहर की किसी जांच एजेंसी को लाकर तो जांच करवा नहीं सकता।....देश के लोकतंत्र पर से जनता का भरोसा ऐसी ही बातों से खत्म हो रहा है। जब लोग देख रहे हैं कि ताकत की कुर्सियों पर बैठे तमाम लोग पूरी गिरोहबंदी करके, साजिश और जुर्म के साथ अपनी लूटमार को बचाने में लग जाएं, और सुप्रीम कोर्ट को लाठी लेकर रात-दिन जांच की चौकसी करनी पड़े, तो लोग लोकतंत्र को क्यों ढोएं?....इस बीच यूपीए सरकार ने, और कांग्रेस पार्टी ने यह साफ कर दिया है कि उसे सीबीआई के मामलों में सरकार की ऐसी दखल में कुछ गलत नहीं लग रहा है। इसमें हैरानी कुछ नहीं है, काफी बरस हो गए हैं, यूपीए सरकार को किसी भी गलत काम में, कुछ भी गलत नहीं लगता है।
दो दिन पहले ही हमारी इन बातों के बाद आज सुप्रीम कोर्ट का जो कड़ा रूख इसी तरह का सामने आया है, उसके बाद मनमोहन सिंह किस तरह आज चैन से सोएंगे, यह देश को वेबकैमरे पर लाईव दिखाना चाहिए।  

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