संजय दत्त को रियायत से गरीबों की छाती पर लात


संपादकीय
17 अप्रैल 2013
सुप्रीम कोर्ट ने फिल्म अभिनेता संजय दत्त की चर्चित अर्जी पर उन्हें आगे की सजा काटने के लिए जेल पहुंचने में चार हफ्ते की मोहलत दी है, ताकि वे अपनी चल रही फिल्मों को पूरा कर सकें। यह फैसला कुछ अलग किस्म का है, क्योंकि संजय ने अपनी अधूरी फिल्मों में लगी लागत और उनमें लगे और लोगों के कामकाज को भी गिनाया था और छह महीने बाद जेल पहुंचने की छूट मांगी थी। इस पर उन्हें एक महीने काम करने का मौका दिया गया है। 
सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश या फैसला कुछ अटपटा लगता है। किसी व्यक्ति के कामकाज को लेकर, कारोबार को लेकर उसे इस तरह की छूट अगर दी जाती है, तो इसकी मिसाल देते हुए देश में जेल जाने वाले हर कामकाजी को अर्जी देने का एक रास्ता मिल जाएगा कि उनको भी अपने घर के काम निपटाने हैं। ऐसा कौन सा मुजरिम हो सकता है जिस पर कारोबार, घर या पेशे की जिम्मेदारियां बची हुई न हों? संजय दत्त के ही केस में जिन और लोगों को सजा सुनाई गई थी, और जिनकी सजा संजय दत्त की तरह ही जारी रखी गई है, ऐसे तीन बुजुर्ग लोगों की ऐसी ही अर्जियां सुप्रीम कोर्ट ने कल खारिज कर दी थीं। इन तीनों का कहना था कि उनकी दया की अर्जी राष्ट्रपति के पास अभी रखी हुई है, और उस पर फैसला होने तक उन्हें भी जेल न पहुंचने की रियायत दी जाए। अदालत ने इसे नहीं माना, और संजय दत्त की अर्जी को माना कि उनकी फिल्मों में पौन तीन सौ करोड़ लगे हुए हैं, इसलिए उन्हें इन्हें पूरा करने की इजाजत दी जाए। अब सवाल यह उठता है कि जिस पर ज्यादा पैसे लगे हुए हैं, उसके लिए कानून अलग कैसे हो? किसी बहुत बारीक कानूनी नुक्ते को लेकर हो सकता है कि सुप्रीम कोर्ट ने बाकी तीनों अर्जियों के मुकाबले संजय की अर्जी को कुछ अलग पाया होगा, लेकिन इससे एक बहुत बड़ा नुकसान यह हुआ है कि हमारे जैसे साधारण समझ के लोगों को एकदम से यह लगने लगा कि अरबपतियों के लिए कानून का नजरिया कुछ अलग है। सच और जनधारणा, इनमें बड़ा फर्क होता है। और इंसाफ न सिर्फ होना चाहिए, बल्कि होते हुए दिखना भी चाहिए। जब एक ही नाव पर सवार चार लोग सुप्रीम कोर्ट से किसी किस्म की रहम की अपील कर रहे हैं, तो उसी वक्त उनमें से एक को छूट और बाकी को जेल, इससे जनता के बीच पैसों की ताकत को लेकर एक सोच तो बनेगी ही। इसी मामले की अधिक जानकारियों को अगर देखें तो यह बात साफ है कि एक दूसरी महिला, 75 साल की जैबुन्निसा 8 महीने जेल में गुजार चुकी हैं। उसे भी संजय दत्त की तरह 5 साल की सजा सुनाई गई है, वह बीमार है, ऑपरेशन के बाद बुरी हालत से गुजर रही है, गरीब है, और संजय दत्त के बाहर रहते-रहते उसे तुरंत जेल पहुंचना है। 
संजय दत्त के मामले में हमने अपनी एक अलग सोच उसे सजा मिलने के तुरंत बाद लिखी थी, जब जस्टिस मार्कण्डेय काटजू ने संजय को माफी देने की एक औपचारिक अपील की थी। तब हमने इसी अखबार में संपादकीय में लिखा था- ''क्या ऐसा कुछ हो सकता है कि कानून में फेरबदल करके ऐसा इंतजाम किया जाए कि गैरपेशेवर मुजरिमों की ऐसी कैद कुछ कट जाने के बाद, उनकी क्षमता का इस्तेमाल समाज के लिए किया जा सके? मिसाल के तौर पर अगले जितने बरस संजय दत्त को कैद में काटने हैं, क्या उसकी जगह उनको अपने पेशे का काम करते रहने देने की रियायत दी जाए, और उसकी पूरी कमाई को समाज में इस्तेमाल किया जाए? और क्या ऐसी रियायत कम कमाई वाले, कम चर्चित, कम महत्वपूर्ण समझे जाने वाले दूसरे लोगों को भी दी जा सकती है? क्या इससे मुजरिम और सजा को एक अधिक सकारात्मक मोड़ दिया जा सकता है? ऐसी कई बातें इस मामले को लेकर शुरू हुई चर्चा के बाद बातचीत के लायक हैं। जब कभी किसी कानून या व्यवस्था में किसी फेरबदल की बात होती है, तो वह ऐसी किसी एक घटना, या कुछ घटनाओं के बाद ही शुरू होती है। कुछ महीने पहले दिल्ली में निर्भया से हुए बलात्कार के बाद आज देश में एक नया कानून लागू हुआ है। उसी हादसे के बाद के माहौल से वह कानून बना, और अब लागू हुआ। इसलिए अगर संजय दत्त को लेकर एक नई चर्चा शुरू होती है, और कानून में एक ऐसा लचीलापन लाया जाता है, जिसका बेजा इस्तेमाल रोका जा सके, और जिससे समाज का कुछ फायदा हो सके, सजायाफ्ता की जिंदगी को खराब करने के बजाय उसका समाज के लिए कोई उत्पादक उपयोग हो सके, तो उसके बारे में सोचना चाहिए। हम इसी मामले को लेकर सोचते हैं, तो लगता है कि जिस तरह जेल के भीतर कैदियों से तरह-तरह के काम करवाए जाते हैं, या जैसे छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में ही जेल के कैदी बाहर खाने-पीने की दुकान चलाते हैं, पेट्रोल पंप चलाते हैं, कई शहरों में कैदी बैंड पार्टी बनाकर बाहर जाकर काम करते हैं, और उनकी कमाई जेल में जमा होती है, तो यह भी एक रास्ता निकल सकता है कि संजय दत्त को रोज जेल से बाहर जाकर उनके हुनर का काम करने दिया जाए, और उसकी कमाई को जेल में जमा किया जाए, और उन्हें उसमें से उतना ही हिस्सा मिले, जितना कि किसी कैदी को मिलता है। ऐसा आज देश में जगह-जगह आम कैदियों को जेल के बाहर जाकर काम करने मिल रहा है, ताकि जब वे सजा काटकर बाहर निकलें, तो भूखे न मरें, या बेरोजगार न हों।ÓÓ 
सुप्रीम कोर्ट को यह चाहिए था कि काम को लेकर, या आराम को लेकर, देश के कैदियों के लिए मौजूदा इंतजाम के तहत संजय दत्त को दिनभर काम करने की छूट देता, और बैंड बजाकर लौटने वाले कैदियों की तरह वापिस आकर जेल में रात गुजारने का हुक्म देता। लेकिन अभी जो आदेश अदालत ने दिया है, उससे देश के कमजोर और गरीब लोगों की छाती पर एक लात पड़ी है। 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें