लोगों के सब्र का इम्तिहान


संपादकीय 
7 अप्रैल 2013
रसूखदार और दौलतमंद लोगों के हाथों प्रजातंत्र की मिट्टीपलीद और इस वजह से फैली निराशा पर कल इसी जगह की गई बात को आगे बढ़ाने के लिए आज इसके एक और पहलू का जिक्र करना पड़ रहा है, कार्पोरेट जगत के फायदे के लिए देश की दौलत की बेरहम लूट। बेरहम इसलिए कि इसमें पैसे के जोर पर आजमाई जा रही ताकत के आगे बहुत से जिम्मेदार लोग जनता के जायज हक की कीमत पर घुटने टेक चुके हंै और बेबस, बेआवाज तबका दुश्वारियां भुगत रहा है।  
इसके सुबूत में बहुत सी मिसालें दी जा सकती हैं, लेकिन बात महाराष्ट्र से शुरू करते हंै, जहां 40 बरसों का सबसे बुरा सूखा पड़ा बताया जा रहा है। अब वहां से खबरें आ रही हैं कि शक्कर मिलों के लिए गन्ना उगाने वालों को जनता के हक का पानी दे दिया गया, और अब आम जनता, मवेशी सब बूंद-बूंद को तरस रहे हैं। पिछले बरस बारिश पर्याप्त न होने पर भी महाराष्ट्र में गन्ने की फसल बड़े पैमाने पर उगाई गई, और खेतों के हक का पानी गन्ने की फसल को दे दिया गया ताकि नेताओं की शक्कर मिलों के लिए गन्ना मिल सके। विकास के जानकार कह रहे हैं कि महाराष्ट्र का मौजूदा सूखा कार्पोरेट और नेताओं की मिलीभगत का नतीजा है। कुछ दिनों पहले मनसे नेता राजठाकरे ने महाराष्ट्र सरकार पर राज्य में पीने का पानी इंडिया बुल्स को दिए जाने का आरोप लगाया और उनके दल के कार्यकर्ताओं ने महाराष्ट्र में इंडिया बुल्स के दफ्तरों में तोडफ़ोड़ भी की।
ऐसे कितने ही मामले हम देख सकते हैं। रिलायंस के.जी. बेसिन से प्राकृतिक गैस निकालने के मामले में कैग को दस्तावेज मुहैया नहीं करवाती, संवैधानिक दर्जा हासिल देश की सबसे बड़ी ऑडिटर संस्था रिलायंस के दफ्तर के धक्के खाती है और सरकार सफाई देने से ज्यादा कुछ नहीं करती। छत्तीसगढ़ में एस्सार कंपनी नक्सलियों को पैसे देती पाई जाती है, उसके लोग पकड़ाते भी हंै, लेकिन उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होती। छत्तीसगढ़ में बाल्को हजारों-करोड़ों की सरकारी जमीन हड़पकर एक या दूसरी अदालती कार्रवाई के बहाने बच निकलती है। कोलगेट घोटाले में सरकार पर सारे नियम कायदे ताक पर रखकर कुछ कुबेरों को मिट्टी के मोल कोयला खदानें बांटकर सरकारी तिजोरी को लाखों-करोड़ों का चूना लगाने की बात अभी पुरानी भी नहीं हुई थी, कि राजस्थान में गड़बडिय़ों पर हल्ला मचने पर कांग्रेसी मुख्यमंत्री को 54 हजार खदानों की लीज रद्द करनी पड़ी। टू-जी स्पेक्ट्रम मामले में देश ने देखा कि भ्रष्टाचारियों ने किस तरह नियम कायदे तोड़कर सरकारी तिजोरी को बेहिसाब नुकसान पहुंचा कर टेलीकाम कंपनियों को फायदा पहुंचाया, और सरकार आखिरी दम तक इसके जिम्मेदार लोगों का बचाव करती रही। आज माहौल यह है कि जिस किसी के भी पास दौलत है, ताकत है, रसूख है वह चाहे तो  बेखौफ होकर देश की दौलत लूटे ,या जनता का हक मारे। ऐसा करके उसके बच निकलने की पूरी गुंजाइश है। उसकी मदद को महंगे वकील, भ्रष्ट नेता, अफसर सब  हाजिर हंै। तुलसीदास त्रेता युग में जो कह गए है कि 'समरथ को नहीं दोस गुंसाईÓ वह  बात आज भी उतनी ही सच साबित हो रही है। नियम कायदे सब आम जनता के लिए हंै, भ्रष्ट नेताओं, अफसरों और कारोबारियों ने लोकतंत्र को अपना बंधक बनाकर रखा हुआ है।
यह बेवजह नहीं है कि छत्तीससगढ़ में एक ट्रेन का अपहरण करने वाले ने बताया कि उसने बिहार से चुनाव लडऩे पैसा जुटाने यह किया। पिछले दिनों खबर आई थी कि कर्नाटक के विधायकों की दौलत पांच बरसों के उनके कार्यकाल में 364 फीसदी, और मंत्रियों की दौलत 665 फीसदी बढ़ गई है। कायदे तोड़कर पैसा कमाना, और जितना ज्यादा दौलत इक_ी की, नियम कायदे तोडऩे की उतनी ही ताकत जुटाना यह जीने का मंत्र बन गए हैं। ऐसे में जब यह दिखता है कि किस तरह कानून तोड़कर गलत काम करके भी लंबी चलती अदालती कार्रवाई  ऐसे लोगों को ठाठ से रहने की पूरी छूट देती है, और दूसरी तरफ नियम-कायदे से जीने वालों को इंसाफ के लिए लंबे इंतजार की सजा मिलती है, तो गलत काम करने का हौसला और बढ़ता है, और कायदे से जीने की हिम्मत टूटती चली जाती है। लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए जो खंबे संविधान के निर्माताओं ने खड़े किए, उनका इस्तेमाल उसका माखौल उडऩे के लिए किया जाए, तो लोकतंत्र पर फख्र नहीं, हताशा पैदा होती है। ऐसे में जनता के सब्र का पैमाना कभी ना कभी तो छलकेगा! लोकतंत्र की आड़ में देश लूटने के कारोबार को जब देश चलाने का नाम दिया जाएगा, तब ऐसा दिन जरूर आएगा। देश में भारी हताशा के माहौल के बीच काबिल लोगों को लगता है कि मेहनत करके खुश रहना यहां मुमकिन नहीं, उसके लिए वतन का मोह छोड़कर विदेश ही जाना पड़ेगा। पिछले दिनों हुए एक सर्वे में भारत के एक करोड़ लोगों ने कहा कि वह अमरीका चले जाना चाहते हैं। संसद में 10-20 सांसदों के समर्थन के लिए बड़े-बड़े घोटाले बर्दाश्त कर लेने वाली सरकार इससे जरा भी चौंकी है, या नहीं, पता नहीं, लेकिन देश में ताकतवरों, दौलतमंदों का बड़े-बड़े गलत काम करके छोटी-मोटी सजा पाकर छूट जाना बदस्तूर जारी है।
तरह-तरह के घोटालों से हताश जनता के जख्मों पर हाल ही में देश की सबसे बड़ी अदालत के फैसले ने जो नमक छिड़का है उसने हताशा का अहसास और गहरा कर दिया है। तमिलनाडु में शर्तों का खुला उल्लंघन करके दरियाई पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने के आरोप में मद्रास उच्च न्यायालय ने स्टरलाईट इंडस्ट्रीज को बंद करने का जो आदेश दिया था उसे खारिज करके सर्वोच्च न्यायालय ने उसे उसका तांबा संयंत्र जारी रखने की छूट दे दी। सर्वोच्च न्यायालय ने उसे 5 सालों में 100 करोड़ का जुर्माना भरने की सजा सुनाई। भारत के खनिज खोदकर, पर्यावरण दूषित करके यहां के जनजीवन, पानी, जमीन का दोहन करके तीन महीने में 12 सौ 88 करोड़ कमाने वाली कंपनी को, इस देश के कायदे तोडऩे के एवज में 5 साल में महज 100 करोड़ का जुर्माना भरने की सजा मिलती है। इसका मतलब है कि तीन महीने में बारह सौ करोड़ से अधिक की कमाई जारी रहे, और इसमें से छह करोड़ रुपये का जुर्माना लगा दिया जाए, और कारखाने को चलने दिया जाए। इंसाफ का यह कैसा अनुपात है? 
भारत का लोकतंत्र सोने की तरह और निखरेगा या दम तोड़ देगा, यह बात तो वक्त ही बताएगा, लेकिन इस तरह जनता के सब्र का इम्तिहान लेने की नौबत आए इसलिए तो हमने लोकतंत्र नहीं चुना था।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें