राजनीतिक शिक्षण का साल

संपादकीय
9 अप्रैल 2013
अब तक के चुनावों से अलग, इस बार लोकसभा के आम चुनाव के सालभर पहले ही देश में दोनों बड़े गठबंधनों की ओर से भाषणों का सिलसिला शुरू हो गया है। मोदी, राहुल या मनमोहन सिंह जगह-जगह जाकर, फिलहाल कारोबारियों के बीच बोल रहे हैं, लेकिन आगे-पीछे और तबकों के बीच भी वे बोलेंगे ऐसी उम्मीद की जा सकती है। इससे एक तो लोगों को सत्ता की दौड़ से जुड़े हुए नेताओं के व्यक्तित्व को समझने में कुछ मदद मिल रही है, कुछ उनकी सोच सामने आ रही है, और कुछ उनकी पार्टी की बातें भी। कुल मिलाकर ये दोनों गठबंधन धीरे-धीरे साफ होते चल रहे हैं, और यह भी साफ हो रहा है कि किसी तीसरे गठबंधन के मजबूत आसार फिलहाल नहीं हैं। 
अब दो बातें सोचने की हैं। यूपीए और एनडीए, इन दोनों गठबंधनों के मुखिया, या प्रधानमंत्री पद के भावी प्रत्याशी चाहे जो भी हों, उनका असर अपनी खुद की पार्टी के उम्मीदवारों की चुनावी संभावनाओं पर पड़ेगा, या कि पूरे गठबंधन की संभावनाओं पर? कुछ लोगों का यह भी सोचना है कि अमरीका में जिस तरह राष्ट्रपति पद के दो उम्मीदवारों के बीच व्यक्तित्व का मुकाबला होता है, कुछ उसी तरह का व्यक्तित्व का मुकाबला मोदी और राहुल के बीच हो सकता है। लेकिन लोकसभा की करीब चालीस फीसदी सीटें ऐसी हैं जहां पर इन दोनों की पार्टियों से परे की क्षेत्रीय पार्टियों का असर रहता है, उन्हीं के उम्मीदवार रहते हैं, उन्हीं के चुनाव चिन्ह रहते हैं। इससे यह अंदाज लगाना मुश्किल हो जाता है कि गठबंधन के प्रधानमंत्री पद प्रत्याशी ऐसे क्षेत्रीय असर में कुछ जोड़ सकेंगे या नहीं? या उनकी बदनामी की साख से क्षेत्रीय असर पर बुरा असर पड़ेगा? एक चुनाव विश्लेषक ने कल यह कहा है कि 28 में से कुल 8 राज्य ऐसे हैं जहां पर यूपीए और एनडीए के मुखिया ये दो दल, कांग्रेस और भाजपा अकेले एक-दूसरे के सामने हैं। बाकी राज्यों में ये दो बड़ी पार्टियां दूसरी पार्टियों के साथ-साथ मुकाबले में है, और कहीं-कहीं पर ये पार्टियां क्षेत्रीय साथियों की पीठ पर सवार होकर चुनाव की नदी पार कर रही हैं। 
इस मामले पर आज लिखने का इसलिए भी सूझ रहा है कि अभी घंटेभर पहले नरेन्द्र मोदी ने पश्चिम बंगाल के उद्योगपतियों के बीच कोलकाता में जाकर केन्द्र पर यह आरोप लगाया है कि वह राज्यों की उपेक्षा कर रहा है। चूंकि बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी लगातार केन्द्र के साथ टकराव करते चल रही हैं, इसलिए उस राज्य में जाकर ममता की तारीफ करते हुए केन्द्र को कोसना, एनडीए की बुनियाद को लंबा-चौड़ा करना भी है। कल को दिल्ली में सरकार बनाने की नौबत रहने पर मोदी या उनकी पार्टी को ममता की जरूरत पड़ेगी। इसलिए जब मोदी राज्यों के अधिक हक की बात कर रहे हैं, तो वे संघ परिवार और भाजपा की उस पुरानी सोच के खिलाफ जाकर बात कर रहे हैं, जिसमें एक मजबूत केन्द्र को बेहतर और जरूरी माना गया था। लेकिन आज किसी बड़ी पार्टी के लिए यह मुमकिन नहीं रह गया है कि वह केन्द्र में सत्तारूढ़ गठबंधन की मुखिया रहते हुए गठबंधन के साथी दलों के प्रदेशों को कमजोर रख सके, और दिल्ली में लगाम अपने हाथ रख सके। 
एनडीए के भीतर भाजपा, और भाजपा के भीतर मोदी को आज देखना एक दिलचस्प मामला है। जिस तरह से वे अलग-अलग प्रदेशों में जाकर अपनी लोकप्रियता और अपनी संभावनाओं को तौल रहे हैं, और भाजपा के भीतर अपनी जगह को मजबूत कर रहे हैं, ऐसा खुद भाजपा ने अब तक देखा-सुना नहीं था। दूसरी तरफ मुकाबले में राहुल या मनमोहन सिंह, जो भी हों, वे एक घर से छांटे हुए मुखिया होंगे, और उनको कुछ भी साबित नहीं करना है। यूपीए के भीतर भी साथी दलों को मनमोहन या राहुल को लेकर कोई दिक्कत नहीं है। इसके ठीक उल्टे एनडीए के भीतर साथी दलों को भाजपा के संभावित प्रधानमंत्री प्रत्याशी को लेकर कई तरह के शक हैं, और भाजपा के भीतर भी ऐसी दुविधा है। लेकिन यह दुविधा भाजपा के भीतर अधिक लोकतांत्रिक संभावनाओं का सुबूत भी है। जहां एक से अधिक लोगों को छांटने का मौका रहेगा, दावेदारी का मौका रहेगा, अपने को साबित करने का मौका रहेगा, वहीं तो मोदी या अडवानी जैसे नामों पर चर्चा होगी, इनकी अलग-अलग वकालत होगी। 
लोकसभा के आम चुनावों के पहले पांच राज्यों में विधानसभाओं के चुनाव होने हैं। लोकसभा के लिए लीडरशिप तय होने का सिलसिला इन विधानसभाओं के चुनाव पर भी कुछ असर डाल सकता है, और दूसरी तरफ विधानसभाओं के नतीजे कुछ महीने बाद के लोकसभा आम चुनाव पर असर डाल सकते हैं। देश के मतदाताओं की समझ-बूझ को बढ़ाने का यह एक मौका है, और देश में मायने रखने वाले मुद्दों पर नेताओं, पार्टियों और गठबंधनों की सोच सामने लाने की कोशिश मीडिया को भी करनी चाहिए। कुल मिलाकर यह माहौल आने वाले पूरे एक बरस जनता के राजनीतिक शिक्षण का भी हो सकता है, अगर उसे सिर्फ सतही बयानों की जंग में उलझाकर न रख दिया जाए। 

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