जनता का भ्रष्टाचार बर्दाश्त कर लेना एक झूठी बात है सच नहीं

संपादकीय
2 अप्रैल 2013
भारत में चुनाव को लेकर बहुत सारे लोगों का यह मानना रहता है कि अब यहां भ्रष्टाचार कोई मुद्दा नहीं रह गया है और लोग भ्रष्ट होने से चुनाव नहीं हारते। कुछ लोगों का यह विश्लेषण है कि जनता ने अब भ्रष्टाचार को मंजूर कर लिया है,  और यही वजह है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन लंबे नहीं चल पाते, या ईमानदार लोग चुनाव नहीं जीत पाते। आमतौर पर शहरी लोग, शहरी लोगों को देखते हुए ऐसे नतीजे निकालते हैं। 
इस मुद्दे पर थोड़ा सा सोचें तो हिन्दुस्तान की गरीबी की रेखा के नीचे वाले आधी से अधिक आबादी के पास तो भ्रष्ट होने का कोई जरिया भी नहीं है। हमारा यह कहने का यह मतलब नहीं है कि मौका मिला होता तो यह आबादी भ्रष्ट हो गई होती। मौका मिलने पर वे ही सबसे अधिक और सबसे जल्द भ्रष्ट होते हैं जिनके पास भ्रष्ट होने की कोई मजबूरी नहीं होती। सबसे संपन्न और सबसे ताकतवर तबके सबसे पहले भ्रष्ट होते हैं। कोई साइकिल खरीदने को भ्रष्ट नहीं होते, अपने पहले जूते या पहली चप्पल खरीदने को भ्रष्ट नहीं होते। सबसे पहले वे भ्रष्ट होते हैं जिनको अपनी कार बड़ी करनी होती है, जिनको अपने बंगले बड़े करने होते हैं, जिनको अपने कारखाने खड़े करने होते हैं। इसलिए गरीबी की रेखा के नीचे की जो आबादी छब्बीस रूपए रोज से नीचे में जिंदा रहती है वह भ्रष्ट नहीं है। इसके बाद इस रेखा के ठीक ऊपर की आबादी की बात करें, तो उसके पास भी भ्रष्ट होने की कोई गुंजाइश नहीं निकलती। इस तरह करीब तीन चौथाई आबादी के पास चाह कर भी भ्रष्ट होने के मौके नहीं हैं, और यह अंदाज लगाने का हमारे पास कोई तरीका नहीं है कि यह तीन चौथाई आबादी मौका मिलने पर भ्रष्ट हो जाएगी। इस तरह एक मोटा अंदाज यह है कि समाज में सबसे अधिक कमाने वाला एक चौथाई ऊपरी तबका जो कि आज भी मलाईदार है, वही दूसरे के कटोरों की रोटी पर भी नजर रखता है। 
भारत में दरअसल जिस आबादी के बारे में लोग यह मानते हैं कि उसने भ्रष्टाचार को मंजूर कर लिया है, या उसे बर्दाश्त करना मंजूर कर लिया है, उसके पास किसी लड़ाई का कोई जरिया भी नहीं है। देश के थोड़े से आदिवासी हिस्से को छोड़ दें, जहां कि नक्सली हिंसा चल रही है, तो बाकी देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ कौन से आंदोलन में नीचे की यह तीन चौथाई आबादी शरीक हो सकती है? हाल के बरसों में अन्ना-बाबा और केजरीवाल जैसे आंदोलनों ने यह साबित किया है कि बेईमानी का कोई विकल्प सामने आने पर लोग उसके साथ जुडऩा चाहते हैं। और इस तरह जुडऩे वालों में अधिकतर लोग नीचे की तीन चौथाई आबादी वाले ही थे। लेकिन जब अन्ना-बाबा-केजरीवाल अपनी विश्वसनीयता खो बैठते हैं तो फिर जनता के सामने कोई विकल्प नहीं रह जाता, और वह एक बार फिर भ्रष्टाचार से लडऩे के सपने जीना बंद कर देती है। दरअसल शहरी और ऐसी एक चौथाई ऊपरी आबादी ही यह सोच पाती है कि जनता ने भ्रष्टाचार को मंजूर कर लिया है क्योंकि आबादी का यह हिस्सा भ्रष्टाचार की मार को कुछ हद तक बर्दाश्त करने के लायक ताकत रखता है। इसके पास रिश्वत देने की कुछ क्षमता है, रिश्वत से बचने की कुछ पहचान है, रिश्वत देकर अपनी कमाई को बढ़ाने के कुछ रास्ते हैं, और इन वजहों से वह भ्रष्टाचार के खिलाफ खुद तो नहीं लड़ता, वह अपने से कमजोर तबके पर इस लड़ाई को न लडऩे की तोहमत जरूर जड़ देता है। 
भ्रष्टाचार को आम जनता ने बर्दाश्त कर लिया है ऐसा सोचने वाले लोग यह नहीं सोचते कि आम जनता के पास संघर्ष का क्या रास्ता है? वह कौन सी लड़ाई लड़ सकती है? जंगलों में जो आदिवासी नक्सलियों के हमदर्द हो जाते हैं, उनको खतरों के साथ जिंदगी जीने की आदत रहती ही है। उनको सबकुछ खो जाने का डर उतना अधिक नहीं रहता जितना कि शहरी लोगों को रहता है। इसलिए वे ऐसी लड़ाई में तन या मन, या दोनों से शामिल हो पाते हैं। दूसरी तरफ ऐसे आदिवासी यह भी पाते हैं कि उनके सामने साथ मांगते जो नक्सली खड़े हैं, वे अपने मुद्दों पर शहरी नेताओं के मुकाबले, लोकतांत्रिक चुनाव लडऩे वाले नेताओं के मुकाबले अधिक ईमानदार हैं। हिंसक हैं, आतंकी हैं, लेकिन खुलकर इसे मंजूर करने वाले हैं, और बिना लुकाछिपी वाले हैं। दूसरी तरफ शहरों का तजुर्बा बहुत खराब रहता है। जिस अन्ना और बाबा को लोगों ने सिर-माथे पर बिठाया, जनसैलाब की शक्ल में जिनके पीछे लगे, उन्होंने एक बरस पूरा होते न होते खुलकर यह साबित कर दिया कि कांग्रेस के भ्रष्टाचार और भाजपा के भ्रष्टाचार पर उनके मन, वचन और कर्म में खासा फर्क है। उनकी पूरी नीयत कांग्रेस के भ्रष्टाचार के खिलाफ थी, और भाजपा के भ्रष्टाचार पर उनकी खामोशी थी। अन्ना टोली के ही जस्टिस संतोष हेगड़े की रिपोर्ट पर भी अन्ना टोली के होंठ सिले हुए थे। यही हाल केजरीवाल का था, और है। यही वजह है कि आज केजरीवाल अनशन के दस या पता नहीं कितने दिन बाद आज जीने-मरने के बीच हैं, लेकिन उनके साथ न देश का मीडिया है, न जनता है, न हमदर्दी है। 
जब भ्रष्टाचार के खिलाफ पूरे देश में लड़ाई छीडऩे की बात कहते-कहते केजरीवाल आज दिल्ली चुनाव के पहले, दिल्ली के दो मुद्दों को लेकर जान देने के अंदाज में हैं, तो इसकी बाकी देश के लिए क्या अहमियत हो सकती है? क्या नक्सली मुद्दों पर शहर की जनता साथ रहती है? क्या उत्तर-पूर्व और कश्मीर में सेना की ज्यादती पर देश के बाकी हिस्सों की जनता साथ रहती है? क्या महाराष्ट्र के सूखे को लेकर बाकी देश में जनता के बीच किसी तरह की फिक्र रहती है? तो फिर आज दिल्ली में बिजली और पानी के बिलों तक ही अपनी लड़ाई को समेट लेने वाले केजरीवाल की चुनावी नीयत सामने है। और दिल्ली के एक उम्मीदवार को बाकी देश कितना साथ दे और क्यों दे? मतलब यह कि पूरे देश के हिस्से की लड़ाई छेडऩे के बाद उसे अपने चुनाव तक समेट लेने को लोग देश की लड़ाई कैसे मानें? 
इसलिए जब-जब देश के नेता जनता को धोखा देते हैं, वह भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई की किसी संभावना पर भी भरोसे खो बैठती है। इसे भ्रष्टाचार को लेकर जनता का बर्दाश्त मान लेना ठीक नहीं है। जब राजनीतिक और सामाजिक नेता दगाबाज निकल जाते हैं, तो तोहमत जनता झेलती है। लेकिन हम इस बात को बिल्कुल नहीं मानते कि जनता भ्रष्टाचार को बर्दाश्त कर रही है। नीचे की तीन चौथाई जनता पर भ्रष्टाचार की मार सबसे अधिक है और उसी के हक सबसे अधिक छिनते हैं, वह क्यों बर्दाश्त करेगी, लेकिन सवाल यह है कि बर्दाश्त नहीं करेगी तो क्या कर लेगी? 

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