संपादकीय
19 अप्रैल 2013
मध्यप्रदेश में कल एक मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा क्योंकि उसने एक सार्वजनिक कार्यक्रम में कुछ महिलाओं के खिलाफ भद्दी और ओछी बातें कही थीं। इसके अलावा उसने मुख्यमंत्री की पत्नी को लेकर भी कुछ गलत बातें कही थीं। अब इस्तीफे के बाद उसने अपने विधानसभा क्षेत्र के लोगों के बीच पहुंचकर कुर्सी को लात मारकर आने की बात कही, और मानो इस्तीफे की वजह काफी नहीं थी, उसने इसके बाद सार्वजनिक रूप से और भी गंदी-गंदी बातें कहीं। और राज्य की भाजपा के लिए मानो इतनी फजीहत और गंदगी काफी नहीं थी, उसके प्रदेश अध्यक्ष ने कांग्रेस नेताओं की पत्नियों को लेकर फूहड़ बातें कहकर कसर पूरी कर दी।
दिक्कत यह है कि सार्वजनिक जीवन में रोजाना ऐसी बदबूदार बातों से निपटने का जिम्मा यह समाज दूसरे नेताओं पर छोड़कर बेफिक्री से बैठे रहता है। कहने के लिए बहुत से साहित्यकार, कलाकार, पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता अपने आपको बुद्धिजीवी नाम के एक काल्पनिक तबके का हिस्सेदार मानते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि बुद्धि का इस्तेमाल करने के बजाय यह तबका आमतौर पर अपनी खोपड़ी पर हेलमेट लगाए हुए अपने घर की छत तले चुप बैठे रहता है। इस तबके का मानो समाज के किसी और हिस्से लेना-देना न हो, और नेताओं की फैलाई जा रही गंदगी से इन बुद्धिजीवियों के बच्चों को बचाना मानो दूसरे नेताओं की जिम्मेदारी हो। यह सिलसिला भयानक इसलिए है कि समाज में जो तबका इस गंदगी को समझ सकता है, इसे समझता है, वह सिर्फ अपनी आंखों का इस्तेमाल करता है, अपने कानों का इस्तेमाल करता है, दिमाग में उसे सोख लेता है, लेकिन अपने मुंह का, अपनी ऊंगलियों का, और अपनी उस तथाकथित बुद्धि का कोई इस्तेमाल नहीं करता। और तो और, किसी चुनावी मौके पर भी ऐसा कोई पढ़ा-लिखा, समझदार तबका अपनी समझ का और अपनी जिम्मेदारी का इस्तेमाल नहीं करता।
आज राजनीति और सार्वजनिक जीवन में बहुत सी पार्टियों के नेता मुंह खोलते हैं, और गटर जैसी बदबू आती है। मीडिया अपने पापी पेट के फेर में गंदगी को तश्तरी में पेश करने का आदी है, क्योंकि अच्छी बात के मुकाबले गंदी बात को अधिक दिलचस्प बनाने की एक संस्कृति मीडिया ने बना रखी है। ऐसे में अगर समाज के जिम्मेदार लोग अपनी खोल और खाल की फिक्र छोड़कर अगर सवाल उठाना शुरू नहीं करेंगे, तो इससे होने वाला नुकसान कांटों की फसल की तरह बढ़ते ही चलेगा, और राजनीति में यह संस्कृति बढ़ती चलेगी कि हर पार्टी के कुछ लोग महज गंदगी फैलाने के लिए ओवरटाईम पर रखे जाएंगे।
राजनीतिक दलों से भी यह सवाल किए जाने चाहिए कि वे गंदगी फैलाने वाले अपने नेताओं का कब तक बर्दाश्त करेंगे। वीडियो तकनीक की मेहरबानी से अब बहुत से मामलों में नेताओं के लिए अपने मुंह से उगली हुई गंदगी से मुकर जाना आसान नहीं रह गया है, और इसीलिए इन दिनों पहले के मुकाबले इस्तीफे कुछ होने लगे हैं। लेकिन जनता के जागरूक तबकों को ऐसे मौकों पर खड़े होना चाहिए, और आक्रामक होकर इस्तीफे मांगने चाहिए। इस्तीफों के अलावा अगले चुनाव में ऐसे गटर को हराने के लिए भी लोगों को कोशिश करनी चाहिए, ऐसी कोशिश तभी असरदार और कारगर होगी जब वह गैरराजनीतिक लोगों द्वारा की जाएगी। (हमारी आज की बात में मिसाल के लिए गटर और कांटों का जो इस्तेमाल हुआ है, उसके लिए हम उनसे माफी चाहते हैं, क्योंकि ये दोनों ही ऐसे इंसानों से बेहतर होते हैं।)

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