सुप्रीम कोर्ट की नजरों के सामने यूपीए सरकार का ऐसा दुस्साहस


संपादकीय
26 अप्रैल 2013
सीबीआई ने आज सुप्रीम कोर्ट में कोयला घोटाले की जांच की स्टेटस रिपोर्ट को लेकर जो हलफनामा दायर किया है, वह यूपीए सरकार के लिए भयानक है। जांच की स्थिति बताने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई से यह रिपोर्ट मांगी थी, और इस रिपोर्ट के बारे में अदालत ने यह पूछा था कि क्या इसकी जानकारी सरकार के लोगों को बताई गई है, तो देश के अतिरिक्त महाधिवक्ता ने अदालत को भरोसा दिलाया था कि यह रिपोर्ट सिर्फ जजों की आंखों के लिए बनी है, यह एक गोपनीय दस्तावेज है, और यह सिर्फ अदालत को जांच की प्रगति बताने के लिए बनाई गई है, इसलिए यह रिपोर्ट जजों के अलावा किसी को नहीं बताई गई। लेकिन अदालत के अपने शक थे, जजों ने सीबीआई के निदेशक को एक निजी हलफनामा दायर करने को कहा कि अदालत को दी गई जांच-स्थिति-रिपोर्ट सरकार को नहीं दिखाई गई, और यह भी कि आगे भी यही सावधानी बरती जाएगी। इस पर आज सीबीआई निदेशक ने जो हलफनामा दायर किया, उसमें रंजीत सिन्हा ने दो पन्नों के इस हलफनामे में माना है कि उन्होंने इस मुद्दे पर बनी स्टेटस रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में पेश करने से पहले पीएमओ, कानून मंत्री और कोयला मंत्रालय के संयुक्त सचिव को दिखाई थी। लेकिन उन्होंने यह नहीं माना कि इसमें कोई बदलाव किया गया था। 
जो सरकार, और कोयला घोटाले के खास जिम्मेदार कोयला मंत्रालय के अलावा कानून मंत्रालय और प्रधानमंत्री कार्यालय सुप्रीम कोर्ट के जजों की आंखों के लिए ही बनाई गई स्थिति-रिपोर्ट को देख रहे हैं, और उस हालात में भी देख रहे हैं जब प्रधानमंत्री खुद कोयला घोटाले के वक्त के कोयला मंत्री भी थे। अब इसके बाद और क्या बचता है? इस देश में सुप्रीम कोर्ट इस मामले की निगरानी खुद कर रहा हो, उसकी आंखों तले देश का सबसे बड़ा सरकारी वकील एक झूठा भरोसा दिला रहा है, और देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी का मुखिया जांच रिपोर्ट को उस सरकार के साथ साझा कर रहा है जो कि देश के इस सबसे बड़े घोटालों में से एक के लिए जिम्मेदार हैं। 
यूपीए सरकार ने सार्वजनिक जीवन और लोकतंत्र में नैतिकता और सामाजिक जवाबदेही के पैमानों को एक-एक करके घोलकर पी लिया है। यह कौन कल्पना कर सकता है कि सुप्रीम कोर्ट की सीधी निगरानी में चल रही जांच में भी यह सरकार सीधे दखल रख रही है। इसके बाद फिर बचता क्या है? भारत सुप्रीम कोर्ट सीबीआई से ऊपर देश के बाहर की किसी जांच एजेंसी को लाकर तो जांच करवा नहीं सकता। और केन्द्र सरकार-सीबीआई की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में रात-दिन खड़े होने वाले सरकारी वकील की बात अगर ऐसी फर्जी साबित होती है, तो सुप्रीम कोर्ट क्या अब सरकारी एजेंसियों और सरकारी पदों पर बैठे लोगों से उनके हर शब्द को हलफनामे पर मांगे? फिर हमारा यह भी मानना है किसी अदालत में जजों के सामने जो बात कही जाती है, वह बात हलफनामे जैसी ही होती है, उसके लिए अदालत हलफनामा न भी मांगे, तो भी उसे खरा सच कहना ही मानना चाहिए। 
देश के लोकतंत्र पर से जनता का भरोसा ऐसी ही बातों से खत्म हो रहा है। जब लोग देख रहे हैं कि ताकत की कुर्सियों पर बैठे तमाम लोग पूरी गिरोहबंदी करके, साजिश और जुर्म के साथ अपनी लूटमार को बचाने में लग जाएं, और सुप्रीम कोर्ट को लाठी लेकर रात-दिन जांच की चौकसी करनी पड़े, तो लोग लोकतंत्र को क्यों ढोएं? ऐसे लोकतंत्र के बजाय वह नक्सलतंत्र अधिक पारदर्शी है जो कि अपने हिंसक और हथियारबंद आंदोलन के किसी पहलू को नहीं छुपाता,  गांव की चौपाल में अपने अंदाज की अदालत लगाकर जनसुनवाई कहते हुए लोगों का गला रेत देता है। उसमें कहीं कोई छल-कपट या साजिश नहीं है, सीधी-सीधी हिंसा है, लोकतंत्र पर सीधा-सीधा वार है, लोकतंत्र के खिलाफ सीधा-सीधा युद्ध है। लेकिन जिस सरकार को पारदर्शी तरीके से, ईमानदारी से देश को चलाने का जिम्मा दिया गया है वह अपनी लूटमार को दबाने के लिए सुप्रीम कोर्ट की नजरों के सामने ही ऐसा दुस्साहस दिखा रही है। इस सरकार के मुखिया डॉ. मनमोहन सिंह की इस काबिलीयत से अर्थशास्त्र की दुनिया भी अब तक नावाकिफ थी। और सुप्रीम कोर्ट के एक वकील रहते हुए देश के कानून मंत्री अश्विनी कुमार के इस दुस्साहस से सुप्रीम कोर्ट भी अब तक नावाकिफ रहा होगा, ऐसा हमारा अंदाज है। चूंकि यह मामला देश की सबसे बड़ी अदालत के सीधे-सीधे खिलाफ है, इसलिए इस पर अधिक अटकलबाजी के बजाय हम उसकी कार्रवाई का इंतजार कर रहे हैं, इस बीच यूपीए सरकार ने, और कांग्रेस पार्टी ने यह साफ कर दिया है कि उसे सीबीआई के मामलों में सरकार की ऐसी दखल में कुछ गलत नहीं लग रहा है। इसमें हैरानी कुछ नहीं है, काफी बरस हो गए हैं, यूपीए सरकार को किसी भी गलत काम में, कुछ भी गलत नहीं लगता है। 

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