संपादकीय
13 अप्रैल 2013
पश्चिम बंगाल के राज्यपाल एम.के. नारायणन एक बुरी बहस में उलझ गए हैं। दिल्ली में योजना आयोग के सामने बंगाल की मुख्यमंत्री और वित्त मंत्री के सामने वामपंथी छात्रों और संगठनों के प्रदर्शन के बाद राज्यपाल ने सार्वजनिक रूप से सीपीएम से मांग की थी कि अपने समर्थकों को इस प्रदर्शन के लिए वे ममता बैनर्जी से माफी मांगे। राज्यपाल ने यह तौलने की कोशिश नहीं की थी कि दिल्ली का यह प्रदर्शन कोलकाता में ममता की पुलिस की हिरासत में एक वामपंथी छात्र की चोटों से मौत के बाद हुआ था, और बंगाल के वित्त मंत्री का कुर्ता फटने के अलावा, और किसी नुकसान की बात सामने नहीं आई थी। यह जिम्मेदारी दिल्ली पुलिस की थी कि वह ऐसे अहिंसक और सार्वजनिक प्रदर्शन को काबू में रखने का इंतजाम करती, प्रदर्शन कर रहे लोगों पर कार्रवाई करती। और प्रदर्शन के दौरान जो कुछ धक्का-मुक्की हुई है, वह भारतीय राजनीतिक प्रदर्शनों के इतिहास में कोई अनोखी बात नहीं थी। हर प्रदेश और देश की राजधानी में बहुत हिंसक प्रदर्शन होते आए हैं, और दोनों तरफ से जानें जाती रही हैं। इन सबको देखते हुए दिल्ली का वामपंथी प्रदर्शन बहुत मामूली था, लेकिन उस पर ममता बैनर्जी की हायतौबा भयानक थी, और उसके दबाव में यूपीए सरकार तुरंत ही आ गई, क्योंकि संसद के भीतर ममता के विरोध से बचना उसकी एक जरूरत है। इसलिए प्रधानमंत्री से लेकर नीचे के मंत्रियों तक ने ममता से फोन पर माफी मांगी, और लोकसभा अध्यक्ष ममता से मिलने गईं।
ऐसे माहौल में राज्यपाल का सीपीएम से यह कहना कि वह ममता से माफी मांगे, उनकी यूपीए-निष्ठा तो साबित करता है, लेकिन यह राजनीति में उनकी एक पूरी तरह नाजायज दखल रही। ममता के सामने प्रदर्शन के तुरंत बाद बंगाल में जगह-जगह उनके कार्यकर्ताओं ने जिस तरह सीपीएम के दफ्तरों पर हमला किया, क्या वह नारायणन को दखल के लायक नहीं लगा? और ममता के आने के बाद से दर्जनों ऐसी तानाशाह ज्यादतियां हुई हैं, जिन पर नारायणन को ही बोलना पड़ा है। सीपीएम से माफी की मांग करने के बाद कोलकाता में विश्वविद्यालय में जिस तरह से गुंडागर्दी हुई है, और मुख्यमंत्री के समर्थकों ने वह की है, उसके लिए भी राज्यपाल ने छात्रों से माफी मांगी है। ममता समर्थक तृणमूल कांग्रेसियों ने विश्वविद्यालय की छात्राओं को बलात्कार की धमकी दी, और यह बात कैमरों पर कैद भी हो गई। ऐसी ममता बैनर्जी को दिल्ली में वामपंथियों के एक प्रदर्शन से ऐसा सदमा पहुंचा कि राज्यपाल राजनीति का हिस्सा बनने लगे? सड़क पर एक मामूली राजनीतिक प्रदर्शन पर ममता की हायतौबा से राज्यपाल का विचलित होना पूरी तरह से नाजायज बात है, और शायद यह केन्द्र सरकार के निर्देश पर जारी किया हुआ बयान रहा होगा। जिस केन्द्र सरकार ने नारायणन को मनोनीत किया है, उसे कायम रखने के लिए तो शायद यह जरूरी है कि ममता बैनर्जी को खुश रखा जाए, लेकिन इसके लिए राज्यपाल आपस में उलझे राजनीतिक दलों में से किसी को दूसरे से माफी मांगने को कहें, यह हमारे हिसाब से राज्यपाल के दायरे के बाहर की बात है। और कम से कम नारायणन जैसे गैरराजनीतिक जिंदगी से राजभवन में पहुंचे व्यक्ति के लिए बिल्कुल ही अटपटी बात भी है।
ममता बैनर्जी की तानाशाही के दर्जनों ऐसे मामले हैं, जिन पर राज्यपाल को प्रदेश के संवैधानिक प्रमुख होने के नाते ऐसी कार्रवाई करनी थी, जैसी कि उन्होंने अभी तक नहीं की है। पश्चिम बंगाल में लोकतंत्र को जहरीला करने का जो काम बददिमाग ममता बैनर्जी कर रही हैं, उसकी पहले की कोई मिसाल नहीं है। केन्द्र सरकार का हिस्सा रहते हुए ममता बैनर्जी ने इसी तरह की बदसलूकी देश के सबसे भले बर्ताव वाले प्रधानमंत्री के साथ की, केन्द्र सरकार के साथ की, और उन तमाम लोगों के साथ की जिनको वे राजनीतिक रूप से पसंद नहीं करतीं। डोलते हुए पारे जैसे अस्थिर चित्त वाली ममता बैनर्जी के राज्य का राज्यपाल रहना भी आसान नहीं है, और ऐसे में अपनी जिम्मेदारियों को राज्य में ही जब राज्यपाल पूरा नहीं कर पा रहे हैं, राज्य में हर कोई तब तक खतरे में है, जब तक ममता उन्हें पसंद नहीं करतीं, तो नारायणन को राज्य के भीतर अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों पर ध्यान देना चाहिए, बजाय एक राजनीतिक मुकाबले में वामपंथियों की आलोचना करने के। राज्यपाल को याद रखना चाहिए कि ममता के आने के बाद से वामपंथियों की कितनी लाशें गिरी हैं, उन पर कितने हमले हुए हैं। वे सीपीएम के साथ माक्र्सवाद की समझ की एक बहस में उलझ गए हैं, यह बात ठीक नहीं है। माक्र्सवाद की समझ उनको चाहे जितनी हो, अगर वे राजभवन की संवैधानिक जिम्मेदारी को पूरा नहीं करते हैं, तो यह समझ किसी काम की नहीं गिनी जाएगी।

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