दर्शक दीर्घा से सीधे कप्तानी!


विशेष संपादकीय
5 अप्रैल 2013
- सुनील कुमार 
देश के सबसे बड़े उद्योग-संगठन के बीच राहुल गांधी के भाषण से मीडिया लबालब है और आयोजक तो शिष्टाचार की वजह से भी इस भाषण की तारीफ करते नहीं थक रहे। कांग्रेस के प्रवक्ताओं को मात करते हुए कुछ ऐसे अखबारनवीस हैं जिन्हें टीवी चैनलों पर राजनीतिक विश्लेषकों की तरह पेश किया जाता है, वे लोग इस भाषण में नेहरू और गांधी की झलक देख रहे हैं। भारत के प्रधानमंत्री पद के एक संभावित प्रत्याशी नरेंद्र मोदी को कारोबार ने पहले सुना, फिर मनमोहन सिंह को मंच पर बुलाया और कुछ हफ्तों के भीतर इस तीसरे संभावित प्रधानमंत्री का भाषण भी हो गया। आज इसी की चर्चा की जाए। 
पहले से लिए हुए भाषणों के पन्नों को हाथ में लेकर भाषण देना या लिखे हुए को सीधे-सीधे पढ़ देने में कोई बुराई नहीं है। राहुल गांधी से हर मायने में पूरी तरह अलग मायावती बिना लिखा कुछ नहीं बोलतीं, लेकिन वे अपने दम पर पहली पीढ़ी की नेता तो हैं ही। कुछ विश्लेषकों और उद्योगपतियों को राहुल गांधी का दोस्ताना अंदाज अच्छा लगा, कुछ को उनके शरीर की भाषा असरदार लगी। कुछ को उनकी बातों में भविष्य की उम्मीद अच्छी लगी। लेकिन सवाल यह है कि भारत के भावी प्रधानमंत्री में क्या खूबियां होनी चाहिए?
राहुल गांधी ने भारत के सैकड़ों-हजारों बरस के इतिहास को गिनाते हुए गंगा, जमुना, सरस्वती के योगदान की चर्चा की। उन्होंने भारत की सरकारी खामियां गिनाईं, शिक्षा व्यवस्था की खामियां गिनाईं। बहुत सारी और खामियां भी गिनाईं। इसमें कोई नई बात इसलिए नहीं थी कि कारोबार की दुनिया का हर इंसान भारत की हजार-हजार सरकारी खामियों को बखूबी जानता है। यह भाषण मायने रख सकता था अगर राहुल गांधी अपनी पार्टी और परिवार की सरकारों की आधी सदी के बारे में कहते, और यह बताते कि पिछले दस बरस की अपनी खुद की दखल से वे क्या कर पाए? राहुल और उनका परिवार देश की पिछली आधी से अधिक सदी के लिए जिम्मेदार है और इसके नफे-नुकसान के हिसाब-किताब के बिना महज भावनाओं के दोस्ताना बखान का क्या मतलब हो सकता है?
राहुल गांधी भारतीय राजनीति की जुबान में नौजवान हैं। इंसानी बदन के हिसाब से वे अधेड़ हैं। उन्हें वयस्क हुए भी चौथाई सदी गुजर गई है। सांसद बने दस बरस होने को हैं। राजनीति को वे घर के भीतर घुटनों पर से देखते आ रहे हैं। इसलिए अब उनकी बातें सुहानी बातें भर होने से वजनदार नहीं मानी जा सकतीं। इस विशाल भारतीय लोकतंत्र के भावी प्रधानमंत्री को अपनी पार्टी और सरकार के किए हुए का हिसाब देते हुए ही बातचीत करनी चाहिए। राहुल गांधी की बातों को उनकी घरेलू संभावनाएं देखते हुए सुनकर कारोबारी तालियां बजा सकते हैं, कुछ मुसाहिबी अखबारनवीस उसमें नेहरू-गांधी तलाशकर पेश कर सकते हैं, लेकिन यह भाषण इम्तिहान के हासिल आया शून्य जैसा है, क्योंकि यह हकीकत को दूर-दूर से भी देखने वाला भी नहीं है।
राहुल गांधी ने देश के हाल को इस तरह देखा है मानो योगनिद्रा करने वाला कोई इंसान अपनी ही मुर्दा सी पड़ी देह को देखता है। योगनिद्रा में सिखाया जाता है कि लेटकर, शरीर को मुर्दे की तरह ढीला छोड़कर, फिर कल्पना की आंखों को ऊपर ले जाकर, वहां से अपनी ही देह को देखें। राहुल गांधी ने देश की दिक्कतों को इसी तरह देखा है। लेकिन सत्ता के भागीदार रहते हुए वे अगर एक दशक से योगनिद्रा ही कर रहे हैं, तो फिर अचानक उठकर कर्मयोग क्या वे सीधे प्रधानमंत्री का करेंगे?
भारत में सैकड़ों-हजारों बरस से कहा जाता है कि मन, वचन और कर्म में एकरूपता होनी चाहिए। हम राजनीति या कारोबार के किसी व्यक्ति के मन की बात नार्को-टेस्ट के बिना नहीं जान सकते, इसलिए उसकी बात नहीं करते। बच गए वचन और कर्म। राहुल गांधी के वचनों से उनकी पार्टी के कर्मों का कोई भी लेना-देना नहीं है। इसलिए सिर्फ बातों पर क्या कहा जाए? देश की सत्ता में राहुल का वजन इतने बरसों से रहने के बाद भी अगर देश के आज के सरकारी हाल पर उनके पास महज अफसोस है, तो उनकी बातों पर हमारे पास भी महज अफसोस है। इस विशाल और महान लोकतंत्र के भावी प्रधानमंत्री के पास देने के लिए, नाकामयाबियों का हिसाब भी होना चाहिए। गैलरी में बैठकर मैच देखने के अंदाज वाले खेलपे्रमी को रातों रात टीम का कप्तान बनाना कांगे्रस की बेबसी हो सकती है।

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