संपादकीय
10 अप्रैल 2013
कल दिल्ली में योजना आयोग की बैठक में पहुंचते हुए सड़क पर बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी और वहां के वित्त मंत्री अमित मित्रा को वामपंथी छात्र संगठन के प्रदर्शन का सामना करना पड़ा। दिल्ली की पुलिस ने इन दोनों को झूमा-झटकी से बचाने की पूरी कोशिश की, लेकिन इस दौरान बुजुर्ग अमित मित्रा का कुर्ता फट गया। और ममता ने योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंतेक सिंह अहलूवालिया के सामने अपनी नाराजगी जाहिर की, और केन्द्र सरकार के साथ कल और आज की अपनी बैठकों को रद्द करके वे बंगाल लौट गईं।
यह पूरा सिलसिला बंगाल की स्थानीय राजनीति और स्थानीय घटनाओं से जुड़ा हुआ है। सीपीएम के छात्र संगठन एसएफआई के एक नौजवान की पुलिस हिरासत में पिछले दिनों कोलकाता में हुई मौत को ममता बैनर्जी ने पिद्दी सा मामला करार देते हुए, किसी भी जांच के पहले पुलिस को बेकसूरी का सर्टिफिकेट दे दिया था। इस बात को लेकर बंगाल की जनता और वामपंथी संगठन उनसे नाराज चल रहे थे, और उसी के खिलाफ कल उन्हें विरोध झेलना पड़ा। सार्वजनिक जीवन में जिस तरह की तानाशाही, हिंसा, बददिमागी, और बदतमीजी ममता बैनर्जी दिखाते आई हैं, उससे उनके समर्थक मतदाता भी एकदम हक्का-बक्का हैं। वे बलात्कार की शिकार महिला को कभी बदचलन बताती हैं, कभी अपनी सरकार को बदनाम करने की साजिश का हिस्सा बताती हैं, और इसके बाद उन्हीं की मातहत पुलिस बलात्कार की शिकायत को सही पाती है। एक मुख्यमंत्री होने के नाते, गृहमंत्री होने के नाते, और एक महिला होने के नाते उनमें जिस इंसानियत की उम्मीद की जाती है, वह इंसानियत सत्ता में आते ही चल बसी दिखती है। जो महिला अपने राज में महिलाओं पर होने वाले जुल्म, बलात्कार और हत्या पर हमदर्दी भी न रखती हो, वह यह उम्मीद करती है कि अपने साथी को बंगाल पुलिस की हिरासत में खोने वाले छात्र दिल्ली में उनके खिलाफ प्रदर्शन भी न करें। क्या यह पहली बार हुआ है कि सड़क पर हुए प्रदर्शन में किसी का कुर्ता न फटा हो? क्या ममता के सारे प्रदर्शन बिना पुलिस इंतजाम के, बिना धक्का-मुक्की के हो जाया करते थे? जिस महिला मुख्यमंत्री को बलात्कार की शिकार का दर्द न लगे, जिसकी सच्ची शिकायत उसे झूठी लगे, उसे एक प्रदर्शन ने आक्सीजन लेने पर मजबूर कर दिया? सड़क की लड़ाकू यह कैसी मुख्यमंत्री है जो बंगाल में विपक्षी वामपंथियों को कत्ल करने, वहां के अफसरों की हत्या करने वाले अपने कार्यकर्ताओं को बचाती है, और शायद उकसाती भी है। और दिल्ली में वह चाहती है कि उसके लिए केन्द्र सरकार रेशमी कालीन बिछाकर हाथ जोड़े खड़े रहे, पूरी दुनिया में कोई भी उस पर एक कार्टून न बनाए, उससे कोई असुविधाजनक सवाल न पूछे, उसके खिलाफ कोई कुछ लिखे नहीं। और वे खुद जरूर हाईकोर्ट तक के खिलाफ ओछी बात करना चाहती हैं, प्रधानमंत्री की बेइज्जती को अपना हक समझती हैं, और लोकतंत्र पर जिनका कोई भरोसा नहीं है।
ममता बैनर्जी की तानाशाही इन दिनों खबरों में चल रही इमरजेंसी की याद दिलाती है, और उन्हीं दिनों के आसपास संजय गांधी के साये में जो लोग पनपे थे, ममता बैनर्जी उन्हीं में से एक थी। संजय-पीढ़ी की ममता बैनर्जी अब तक यह नहीं समझ पाई हैं कि अब न इमरजेंसी है, और न अब तानाशाही का मिजाज चल सकता है। खुद के राज में रात-दिन लोगों को मारा जाए, महिलाओं से बलात्कार हो, सवाल पूछने पर जेल हो, कार्टून को जान से मारने की साजिश करार देकर जेल में डाला जाए, और ऐसी ममता और उसके मंत्री के खिलाफ सड़क पर प्रदर्शन भी न हो? यह पूरी बददिमागी भारतीय लोकतंत्र के ठीक खिलाफ है, और इसे जल्द से जल्द खारिज किया जाना चाहिए। अगले चुनाव में पश्चिम बंगाल में जनता इसे शायद खारिज कर भी दे। लेकिन एक राज्य के निर्वाचित मुख्यमंत्री के रूप में लोकतंत्र को रौंदती हुई यह बुलडोजर अपने खिलाफ प्रदर्शन पर पुलिस घेरे के भीतर भी छुई-मुई पौधे की पत्तियों की तरह आहत हो जा रही है, और ऑक्सीजन मांग रही है।
ममता बैनर्जी को एक आईने की सख्त जरूरत है, और एक मनोचिकित्सक की भी। उनका पूरा इलाज होने में वक्त लगेगा, क्योंकि चुनाव में अभी वक्त है। तब तक उन्हें दिमागी इलाज दिया जाना चाहिए।

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