संपादकीय
6 अप्रैल 2013
उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले के माधवपुर में 31 साल पहले एक फर्जी मुठभेड़ में एक डीएसपी समेत 13 लोगों की हत्या के मामले में, तीन पुलिस अफसरों को मौत और पांच को उम्र कैद की सजा सुनाई गई है। इकतीस साल पहले उत्तर प्रदेश में जब राष्ट्रपति शासन लगा हुआ था। कुछ छोटे पुलिस अफसरों ने अपने ऊपरी अफसर डीएसपी को गांव में डकैत होने की झूठी खबर देकर तड़के बुलवाया, और गोली मार दी। फिर डकैतों से मुठभेड़ में डीएसपी के मारे जाने की अपनी कहानी को सच साबित करने के लिए गांव के 12 बेकुसूर लोगों को भी गोली मार दी। गोंडा पुलिस की इस कहानी पर विश्वास नहीं करने वाली मृत डीएसपी की पत्नी अगर देश की सबसे ऊंची अदालत न जाती, और अदालत अगर इस मामले में सीबीआई जांच का हुक्म न देती, तो खाकी वर्दी का यह गुनाह पर्दे में ही छिपा रहता। घटना के समय महज पांच महीने की बच्ची रही मृत पुलिस अफसर की बेटी अब आईएएस अफसर बन चुकी है। अदालत में फैसला आने पर वह फूट-फूटकर रो पड़ी और उसने इंसाफ होने पर संतोष जाहिर किया, लेकिन इसे इंसाफ हुआ माना जाए, या नहीं, यह गौरतलब है।
सीबीआई ने इस मामले की जांच के बाद 19 लोगों के खिलाफ मुकदमा दायर किया था, जिनमें से दस मुकदमे के दौरान मर गए। दिवंगत अफसर की पत्नी की भी इस दौरान मौत हो गई। दोषी पुलिस अफसरों में से बस एक सेवा में बचा है, बाकी सब रिटायर हो चुके हैं। देश में होने वले जुर्मों में से हर एक सीबीआई को जांच के लिए नहीं सौंपा जाता। देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी को गिने-चुने मामले ही जांच के लिए सौंपे जाते हंै, उसकी अपनी अदालत ने इस मामले में सीबीआई के खिलाफ जो गंभीर टिप्पणियां की हैं, वह भी गौर करने लायक है। अदालत ने कहा कि सीबीआई ने टरकाने के अंदाज में जांच की। अदालत ने कहा है कि सीबीआई ने इस तथ्य से पूरी तरह आंखें मूंद ली कि यह साजिश पुलिस के छोटे अफसरों के स्तर पर नहीं, उससे बड़े स्तर पर हुई होगी, कि डीएसपी को गोली मारने के बाद पुलिस कर्मियों के एक गिरोह ने गांव के प्रधान की मदद की और उसकी मदद से 12 लोगों की निर्ममता से हत्या की। सीबीआई अदालत के जज की यह टिप्पणी सीबीआई की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े करती है। तिस पर उसे फैसला देने में लगा 31 साल का वक्त! सरकारी नौकरी में ऊंचे पदों पर बैठी मारे गए अफसर की बेटियां सरकारी कामकाज की असलियत जानती होंगी, शायद इसलिए अपने साथ इंसाफ होने का अहसास उन्हें हो रहा होगा, लेकिन क्या इसी दिन के लिए हमारे देश में लोकतंत्र की महंगी व्यवस्था हम झेल रहे हैं? क्या जनता की सरकार का इतना महंगा नाटक देश की ज्यादातर आबादी को अच्छा लगता होगा, उसके लिए किसी काम का होगा?
सीबीआई की अदालत को फैसला देने में 31 साल लगे। अब लोकतांत्रिक व्यवस्था में मिली तमाम सहूलियत का फायद उठाते हुए सजा पाए लोग बड़ी अदालतों का दरवाजा खटखटाएंगे, मामले को और लंबा खींचेंगे, इस मामले में गुनाह के शिकार हुए लोगों, या इसमें बेकुसूर फंसाए गए लोगों के साथ आखिर कब इंसाफ होगा? ऐसे और भी बहुत से मामले हंै, जहां कथित रूप से पुलिस की मिलीभगत से किए गए गुनाह साबित करने में एक पूरा दौर बीत रहा है। खाकी और खादी की मिलीभगत में गुनहगार कितने बेखौफ होते हंै, यह उत्तर प्रदेश के हाल ही के मामले से साफ है, जहां कुंडा में एक और डीएसपी मारा गया, और उसकी हत्या में एक दबंग नेता और उसके अपने साथियों के शामिल होने का शक जाहिर किया जा रहा है। सीबीआई को कुंडा के 103 स्थानीय पुलिस अफसरों का तबादला करने को कहना पड़ा है। अभी बहुत दिन नहीं हुए हैं, जब केंद्र सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री अपनी पत्नी के ट्रस्ट द्वारा की गई गड़बडिय़ों पर आवाज उठाने वालों को उत्तर प्रदेश से जिंदा लौटकर दिखाने की चुनौतियां देते टीवी पर नजर आए थे। इस तरह के राजनीतिक आतंकवाद के साए में जीने की मजबूरी लोकतंत्र का मजाक है। अगर समय रहते गुनाहों का हिसाब न हो,तो कैसी व्यवस्था और काहे का संविधान?
देश में कई कानून आयोगों ने जल्दी और असरदार तरीके से इंसाफ करने के लिए बहुत सी सिफारिशें दी हैं, लेकिन उन पर किसी दल की सरकार को अगर संजीदगी से कोई काम न ही करना हो,तो उनकी रिपोर्टों के पुलिंदे सरकारी दफ्तरों में रखने की क्या जरूरत है? दिल्ली में सर्दियों में इनकी होली जला दी जाए, कम से कम बेघरों की ठंड भगाने के काम तो आएंगे। या जैसा कि कई बार हम देखते हैं कि हमारे देश के कानून निर्माता विधानसभाओं, संसद के सदन में कागज फाड़कर बिखेर देते हंै, वैसे ही यह रिपोर्टें, पुलिस सुधार की सिफारिशें भी फाड़कर बिखेर दी जाएं, कम से कम जनता की ये झूठी उम्मीद तो खत्म हो जाए कि कहीं किसी कोने में ये रिपोर्टें पड़ी हैं। और कभी कोई तो ऐसा आएगा, जो इन्हें उठाकर देखेगा, इन पर कभी तो अमल करेगा। भारत में जनता की सरकारों का सपना देखने वालों ने ऐसी जम्हूरियत का सपना तो नहीं ही देखा होगा।
इस बदइंतज़ामी, बदनीयती का सबसे ज्यादा शिकार पिछड़े, कमजोर, दलित, विकलांग, बूढ़े, बच्चे, औरतें होती हैं जिनके हाथ में कोई ताकत नहीं, जिनकी कोई आवाज नहीं। आज अगर सीबीआई जैसी एजेंसी को कुंडा के पुलिस वालों के आगे बेबसी महसूस कर रही है, तो बेबस लोगों की बिसात ही क्या है। ऐसे में अगर लोग इंसाफ मिलने का इंतज़ार किए बिना, खुद इंसाफ करने लगें, तो इसमें किसी को ऐतराज तो हो सकता है ,लेकिन ताज्जुब किसी को नहीं होना चाहिए।
दिल्ली में निर्भया का बलात्कार-हत्या हुई तो बलात्कार कानूनों पर सलाह देने आयोग बिठा दिया गया, कुंडा के डीएसपी की हत्या हुई तो उनके घर के लोगों को सरकारी नौकरियां दे दी गर्इं, यह सभी लोकतंत्र को जमीन पर सच्चे अर्थ में लागू करने की सरकारों की नाकामी का नतीजा है। देश को ऐसे फैसलों की नहीं, जवाबदेही लेने वाली सरकारों की जरूरत है, जिनमें कानून का अमल करने वाली एजेंसियों को जवाबदेह बनाने की कूबत हो। जब तक ऐसा नहीं होगा, खाकी और खादी इसी तरह एक-दूसरे की पीठ खुजाते रहेंगे, और बेबस जनता बरसों बरस इंसाफ का इंतजार करती रहेगी, लोकतंत्र जैसी बेमिसाल व्यवस्था के लिए लोगों के दिलों में नफरत बढ़ती ही चलेगी।

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