सुप्रीम कोर्ट को अपनी लालबत्तियां अब भी क्यों नहीं सूझ रहीं?


संपादकीय
4 अप्रैल 2013
सुप्रीम कोर्ट ने कल इस बात पर नाराजगी जाहिर की कि हिन्दुस्तान में इन दिनों सत्ता से जुड़े जरा सी भी ताकत वाले लोग अपनी गाडिय़ों पर लालबत्ती लगाकर घूमने लगते हैं। इस बारे में अदालत की पूरी बात पहले पन्ने पर खबर में जा रही है, इसलिए उसे यहां पर हम पूरा नहीं दोहरा रहे हैं, लेकिन इससे जुड़े हुए उन तर्कों को हम यहां दुहरा रहे हैं जिन्हें हम बरसों से लिखते आ रहे हैं। 
सुप्रीम कोर्ट की फिक्र या नाराजगी कुछ आधी-अधूरी है। अदालत की फटकार अभी इस बात पर लगी है कि बहुत से छोटे-छोटे लोग भी लालबत्तियां लगाकर घूम रहे हैं और सड़कों पर इससे आम जनता के हक छिनते हैं। हमने इस बात पर लंबे समय से विचार का एक अभियान सा चला रखा है, और सत्ता के लोगों में संवेदनशीलता लाने की कोशिश कर रहे हैं। और सत्ता से हमारा मतलब सिर्फ सरकारी सत्ता नहीं है, भारत में अदालती सत्ता, संसदीय सत्ता, संवैधानिक सत्ता, कई तरह की सत्ता है, जो कि लालबत्ती का ऐसा इस्तेमाल करती हैं, कि जहां इन तमाम किस्म की सत्ताओं का एक साथ इक_ा होना होता है, तो वह इलाका रेड लाईट इलाके जैसा लगने लगता है। 
दुनिया के सभ्य देशों में ऐसे ताकतवर तबकों के लोगों के सड़कों पर हक ऐसे नहीं होते कि वे बाकी नागरिकों के हकों को कुचलते हुए चलें। लेकिन हिन्दुस्तान में सत्ता सिर चढ़कर बोलती है, इंसानों के भी, और गाडिय़ों के भी। गाडिय़ों के सिर पर वह लाल-पीली बत्ती बनकर चढ़ जाती है। सुप्रीम कोर्ट को यह बात समझने की जरूरत है कि सड़कों पर बाकी लोगों को किनारे करके, तेज रफ्तार से आगे बढऩे का अधिकार उन्हीं लोगों को होना चाहिए, जिनकी जिम्मेदारियों में ऐसी रफ्तार से पहुंचकर किसी मुसीबत से निपटना आता हो। एक दावत से निकलकर घर पहुंचने तक, और घर से निकलकर दफ्तर पहुंचने तक के जो रोज के काम होते हैं, उनके लिए भी ताकतवर तबके की लालबत्तियां इस तरह चीखती हुई चलती हैं कि मानो वे कहीं आग बुझाने जा रही हैं। जिस अदालत में यह सुनवाई चल रही है, उस अदालत, और उसकी मातहत अदालतों तक, देश की राजधानी से जिलों तक जज लालबत्तियोंं के साए में घर से अदालत तक का सफर तय करते हैं, कि मानो अदालत पहुंचते ही इंसाफ करने में उन्हें कुछ पल और लग जाएंगे, तो देश के साथ बड़ी बेइंसाफी हो जाएगी। इसके अलावा भी जब हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के जज सड़कों पर चलते हैं, तो उनके सामने पायलट गाड़ी चलती है, सायरन बजते हैं, और बाकी जनता को किनारे धकेल दिया जाता है कि इंसाफ में कहीं देर न हो जाए। 
यह पूरा सिलसिला घोर अलोकतांत्रिक, सामंती, और गैरबराबरी का है, जिसे सुप्रीम कोर्ट को पूरे का पूरा खारिज कर देना चाहिए। लाल-पीली या नीली बत्ती का हक, एक हक के रूप में नहीं होना चाहिए, काम की एक सहूलियत के रूप में होना चाहिए ताकि लोग मुजरिम को पकडऩे, जख्मी को बचाने, या आग को बुझाने तेजी से पहुंच सकें, और जिंदगी का नुकसान न हो सके। इससे परे किसी इंसान का ऐसा कोई हक नहीं बनता कि वे दूसरों को पीछे छोड़कर अपने रोज के कामकाज के लिए लालबत्ती और सायरन के साथ आएं-जाएं। सुप्रीम कोर्ट अगर संवैधानिक पदों का नाम लेकर कुछ लोगों को ऐसी रियायत देता है, तो उससे गैरबराबरी का सिलसिला तो कायम ही रहेगा। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को सड़क पर किसी साइकिल वाले को हटाकर आगे बढऩे का कोई हक क्यों होना चाहिए? हर किसी का काम उसके लिए महत्वपूर्ण है, और काम की जरूरत न हो, तो सिर्फ ओहदे की शान के लिए ऐसा सामंतवाद शर्मनाक है। 
हम पहले भी इस बारे में कई बार लिख चुके हैं, और हैरानी इस बात की है कि उत्तरप्रदेश के एक नागरिक को सुप्रीम कोर्ट तक जाकर एक जनहित याचिका दायर करनी पड़ी, तब जाकर अदालत इस मुद्दे पर सोच रही है। खुद होकर जजों को यह सोचना था, और इस गैरबराबरी को खत्म करना था। आम और खास का ऐसा कोई भी फर्क लोकतांत्रिक नहीं हो सकता, और न्यायसंगत नहीं हो सकता। इसलिए पूरे देश से लालबत्तियां एक साथ खत्म होनी चाहिए, और सुप्रीम कोर्ट को खुद होकर जजों के सिर से इसे सबसे पहले हटवाना चाहिए। 

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