तात्कालिक तनाव के असर में लंबे समय के फैसलों की चूक


संपादकीय
23 अप्रैल 2013
भारतीय सर्वोच्च न्यायालय ने इंदौर के एक वकील ने जनहित याचिका दायर करके अश्लील सामग्री को देखने वाले लोगों पर भी सजा का इंतजाम करने की मांग की है। उसका तर्क है कि इंटरनेट पर अश्लील सामग्री देखकर लोग बलात्कार जैसे जुर्म कर रहे हैं और इससे समाज के भीतर लोगों की मानसिक सेहत भी खराब हो रही है। उसका कहना है कि आज भारत में लोगों को सेक्स और हिंसा की सामग्री, बच्चों से सेक्स की सामग्री, अश्लील और हिंसक वीडियो गेम, सामूहिक बलात्कार की ट्रेनिंग देने वाली वेबसाइटें, सभी कुछ हासिल है और इससे देश तबाह हो रहा है। काफी अनमने ढंग से सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को मंजूर किया और केन्द्र और राज्य सरकारों को इस पर अपनी राय देने के लिए नोटिस जारी किया है। आज भारत में ऐसी सामग्री तैयार करने, और उसे इंटरनेट पर भेजने पर तो सूचना तकनीक कानून के तहत सजा है, लेकिन इसे देखने वालों पर कोई सजा नहीं है। यह याचिका इसी की मांग कर रही है ताकि इसे देखने में कमी आए। 
यह बात पहली नजर में ठीक लग सकती है, लेकिन यह बहस के लायक मुद्दा है। दुनियाभर में जहां-जहां पोर्नोग्राफी और सेक्स-अपराधों पर शोध हुए हैं, उनके नतीजे इन दोनों के बीच कोई रिश्ता नहीं जोड़ पाए हैं। बहुत ही कम मामलों में ऐसे नतीजे मिले हैं कि पोर्नोग्राफी (अश्लील) देखने वाले लोग सेक्स-अपराधों तक पहुंचते हैं। वहीं दूसरी तरफ कुछ ऐसे नतीजे भी मिले हैं कि अश्लील सामग्री देखने वाले लोग संतुष्ट होकर, यौन अपराधों से बचते हैं। इसलिए भारत में किन्हीं एक-दो बलात्कार की घटनाओं से पोर्नोग्राफी के जुड़े होने की बात सामने आते ही उसे बलात्कार के लिए जिम्मेदार मान लेना हड़बड़ी की बात होगी। यह बात जरूर है कि इससे लोगों के सामाजिक और पारिवारिक रिश्ते प्रभावित होते हैं, और बाजारू अश्लीलता का एकदम आक्रामक नजारा देखने के बाद स्वाभाविक देह संबंधों की जगह लोगों को हिंसक और आक्रामक यौन संबंध की बात भी सूझने लगती है, लेकिन फिर भी इसे सीधे-सीधे अपराध से जोड़ पाने जैसी कोई बात भारत में किसी अध्ययन में सामने नहीं आई है। दूसरी तरफ इस देश में शुद्धतावादियों का एक आक्रामक तबका हर किस्म के वयस्क मनोरंजन के खिलाफ झंडे-डंडे लेकर लगा रहता है, और ऐसा विरोध वयस्क लोगों का शायद नुकसान अधिक करता है। 
पोर्नोग्राफी या अश्लीलता के पैमाने बड़े ही धुंधले होते हैं। अलग-अलग देशों में वहां संस्कृतियों के मुताबिक तो वे अलग होते ही हैं, भारत में आज भी एक थानेदार अश्लीलता की शिकायत पर अपनी सीमित मनोवैज्ञानिक और सामाजिक समझ के साथ किसी मामले को अदालत तक ले जा सकता है। ऐसा कोई कानून अगर बनता है कि अश्लील सामग्री को देखना अपराध हो जाए, तो उस कानून का कैसा बेजा इस्तेमाल नहीं होगा? आज भी जगह-जगह पुलिस पर लोगों को यह शक रहता ही है कि वह कहीं नक्सल साहित्य रखकर, तो कहीं चरस की एक पुडिय़ा रखकर, कहीं एक देसी कट्टा रखकर बेकसूरों को फंसाने की तरकीबें जानती है। अब अगर अश्लील सामग्री के खिलाफ, वयस्क मनोरंजन के खिलाफ, पोर्नोग्राफी के खिलाफ ऐसा कानून बन जाएगा, तो किसी के सामान में एक सीडी रखकर उसे जेल भेजने का हथियार पुलिस के हाथ होगा, या किसी के जेब से एक छोटी सी पेनड्राइव की बरामदगी दिखाकर उसे अदालत तक पहुंचाने का इंतजाम आसान होगा। 
आज दरअसल भारत बलात्कारों को लेकर जिस तरह के मानसिक तनाव के अंधड़ से गुजर रहा है, उसमें सेक्स-अपराधों पर काबू के लिए लोग कई किस्म के नुस्खे लेकर आ रहे हैं। हमको कोई हैरानी नहीं होगी कि कुछ दिनों में टीवी पर कोई ऐसे रूद्राक्ष बेचने लगे जिसे गले में पहनने पर लड़की के बलात्कार से बची रहने का दावा किया जाएगा। आज देश में किसी को लग रहा है कि बलात्कारी को फांसी देने से बलात्कार कम होंगे, किसी को लग रहा है कि बलात्कारी को बधिया बना दिया जाए, किसी को लग रहा है कि चौराहे पर फांसी दी जाए, या गोली मारी जाए। जितने मुंह उतनी बातें। लेकिन तात्कालिक तनाव के असर में जो लोग लंबे समय के फैसले लेते हैं, वे आमतौर पर चूक करते हैं। भारत आज ऐसी ही गलतियां करने जा रहा है। आज समाज से लेकर संसद और सरकार तक के लोग, अदालतों के जज, सामाजिक हकीकत, बलात्कार के पीछे के सामाजिक कारणों तक जाने के बजाय सड़कों पर चल रहे प्रदर्शन को शांत करने के लिए आनन-फानन किसी ब्रांड की रामबाण दवा बनाकर पेश करने के फेर में हैं। इससे उस समाज का ही सबसे बड़ा नुकसान होने जा रहा है, जिस समाज की फिक्र करते हुए आंदोलनकारी सड़कों पर हैं। आंदोलन और विरोध का यह रूख ठीक नहीं है, राजनीतिक दलों और नेताओं का उतावलापन ठीक नहीं है, और अदालतों की हड़बड़ी भी ठीक नहीं है। जनआक्रोश की नोंक पर लिए जा रहे फैसले बहुत भारी पड़ेंगे। 
हम भारत के विचलित लोगों से समझदारी की अपील करते हैं, और इसी समाज के भीतर के इंसान बलात्कार कर रहे हैं, उसके सामाजिक इलाज को ढूंढने की सलाह देते हैं। कानूनों को कड़ा बना-बनाकर असरदार नहीं बनाया जा सकता। और संविधान संशोधन, सामाजिक सुधार का विकल्प नहीं हो सकता। 

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