संपादकीय
24 अप्रैल 2013
कुछ दशक पहले छत्तीसगढ़ के बस्तर में बुरी तरह पेचिश फैला, जिसमें बहुत लोग मारे गए। गांव-गांव तक जब जांच की गई, तो कुछ मरीज ऐसे भी मिले जिन्हें डॉक्टरों ने दवाई का पत्ता देकर रोज एक गोली लेने कहा था, और वे रोज एक गोली ले भी रहे थे, फिर भी वे नहीं बचे। उसकी वजह यह निकली कि वे पत्ते से दवाई को निकालकर खाने के बजाय उसके कवर सहित खा रहे थे। अब ऐसे में वह दवाई असर करे तो क्या करे? और दवा को बेअसर जानकर अगर कोई उसकी खुराक को बढ़ाते चलें, तो उससे भी क्या फर्क पड़ेगा?
कुछ उसी तरह का माहौल आज देश में बना हुआ है, जब बलात्कार पर कानून को कड़ा करते जाने की कवायद चल रही है। आज माहौल ऐसा हो गया है कि कुछ लोग अगर बलात्कारियों को फांसी देने के खिलाफ बात करें, क्योंकि वे मौत के सजा के ही खिलाफ हैं, तो लोग उन्हें बलात्कारियों का हमदर्द मान लेंगे। लेकिन दवा की पन्नी को उतारे बिना उसकी खुराक बढ़ाने का कोई फायदा हो सकता है?
कल की एक खबर है कि नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के अनुसार 2001 से लेकर 2010 तक दर्ज किए गए बलात्कार के मामलों में मात्र 36,000 अभियुक्तों के खिलाफ ही जुर्म साबित हो सके। वर्ष 2001 और 2010 के बीच एक लाख चालीस हजार से भी ज्यादा दर्ज किए इस तरह के मामलों में से कम से कम एक लाख ऐसे अभियुक्त थे, जिन्हें सुबूतों के अभाव में बेकसूर करार दिया गया। गौर करने वाली बात ये भी है कि इस एक लाख में 14,500 से भी ज्यादा मामले ऐसे थे, जिनमें अभियुक्तों के खिलाफ नाबालिग लड़कियों का बलात्कार करने का आरोप था। साथ ही इस एक लाख से भी ज्यादा के आंकड़े में करीब 9,000 ऐसे भी मामले थे, जिन्हें पुलिस की शुरुआती जांच के बाद बंद करना पड़ा।
हम पिछले हफ्ते में दो-तीन बार इस बारे में लिख चुके हैं कि समाज और सरकार, संसद और अदालत, अपनी नालायकी को छुपाने के लिए कानून को अधिक लायक बनाने में जुट जाते हैं। अगर चौकीदार सो रहा है, तो उसकी लाठी की जगह बंदूक, या मामूली बंदूक की जगह मशीनगन दे देने से क्या फर्क पड़ेगा? अगर कोई बच्चा पढऩे में दिलचस्पी नहीं रखता, तो उसे एक किताब की जगह दस किताबें दे देने से क्या फर्क पड़ेगा? दरअसल कड़े कानून की कड़ी-कड़ी बातें, लोगों के मुंह को अपने निकम्मेपन की कड़वाहट से बचा लेती हैं। यह सिलसिला बहुत घातक है। जहां समाज में महिला को पैदा होने के पहले से ही बराबरी के हक से परे कर दिया जाए, पेट में ही मार दिया जाए, या पैदा होते ही घूरे पर फेंक दिया जाए, ट्रेन में छोड़ दिया जाए, या पटक-पटककर मार दिया जाए, जहां कदम-कदम पर उससे शारीरिक और मानसिक बलात्कार हो, जहां उसे घर में बराबरी का खाना न मिले, दहेज की कमी से जिसे प्रताडऩा मिले या मर जाने पर मजबूर होना पड़े, जहां उसके साथ हुए बलात्कार की पुलिस जांच देश के आम निकम्मेपन की वजह से कमजोर हो, जहां पर अदालतें एक-एक पीढ़ी लगा दें फैसला करने में, जहां पर आखिरी अदालत के फैसले के बाद भी बच्चियों के बलात्कारी-हत्यारों को एक महिला राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल माफ कर दे, उनको फांसी से बचा ले, वहां पर बलात्कारियों को फांसी की सजा का इंतजाम करने से क्या हो जाएगा? अपने काम को ठीक से न करने वाली लोकतांत्रिक संस्थाएं, और उनको हांकने वाले, उन पर काबिज लोग कड़े-कड़े कानूनों की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं। यह सिलसिला बहुत खतरनाक है और अपने आपको धोखा देने का है। कड़े कानून के झांसे में उन लोगों को आना चाहिए जो कि नर्म कानून को असरदार होते देख चुके हों। आज देश में बलात्कारियों में से अधिकतर, और बाकी किस्म के जुर्मों में भी अधिकतर मुजरिम जब अदालत से छूट जाते हैं, उनमें से अधिकतर बाइज्जत बरी होते हैं, तो नया और कड़ा कानून क्या खाकर किसी को सजा दिला देगा?
बलात्कारियों को फांसी का इंतजाम अगर सजा में किया जाता है, तो उससे एक बात की गारंटी हो जाएगी, कि फांसी से बचने के लिए बलात्कारी अपनी हिंसा की शिकार को मार डालेंगे। जब बलात्कार की सजा फांसी, और उसके बाद हत्या की सजा भी फांसी, तो फिर सुबूत को पूरी तरह खत्म करके अपनी जिंदगी बचाने की कोशिश में क्या बुराई है? आज अगर कोई बलात्कारी किसी बच्ची या लड़की को, या महिला को, सिर्फ उसकी देह लूटकर जिंदा छोड़ देते हैं, तो चार-छह फांसियों की खबर छपते ही ऐसी जिंदगी बचना खत्म हो जाएगा। लेकिन आज संसद से लेकर सड़क तक जिन लोगों की हस्ती नारों पर चलती है, उनको मौत की सजा का नारा अपनी जनता के लिए, अपने वोटरों के लिए लुभावना लग रहा है। मौत की सजा की मांग खत्म होनी चाहिए, और समाज को, सरकार को, संसद को, अदालत को यह सोचना चाहिए कि कैसे बलात्कार थमें, कैसे जांच बेहतर हो, कैसे अदालतों में जुर्म साबित हो, और कैसे सजा मिले। इससे परे की बात करना आज की नाकामयाबी पर एक नए कानून का कफन ढांकने जैसा है।

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