15 अपै्रल 2013
तमिलनाडु के सलेम में एक गरीब औरत अपने पति और दो बच्चों के साथ जब सुबह-सुबह के अंधेरे में अस्पताल पहुंची तो उसे भर्ती करने के लिए नर्सों ने हजार रुपये रिश्वत मांगी। पैसे न होने पर उसे निकाल दिया, और उसने बाहर सड़क पर एक नाली के करीब बच्चे को जन्म दिया। अब अस्पताल इस मामले की जांच कर रहा है।
अस्पतालों में गरीबों का ऐसा हाल नया नहीं है। पिछले महीनों में छत्तीसगढ़ और बिहार जैसे कई राज्यों में सरकारी बीमा कार्ड से रकम निकाल लेने के लिए बड़े-बड़े अस्पतालों ने साजिश करके जवान महिलाओं के गर्भाशय निकाल दिए। उनको कैंसर का डर दिखाया और रातों-रात उनके बदन से खिलवाड़ करके उन्हें मौत के करीब ला दिया। जिस गर्भाशय को अधेड़ हो जाने के बाद किसी-किसी मामले में जांच के बाद निकालना ठीक समझा जाता है उसे 25 बरस की उम्र में ही निकाल फेेंका।
चूंकि गरीब को उस काल्पनिक ईश्वर ने भी तकलीफ के लायक माना है, इसलिए उस ईश्वर की भावना का सम्मान करते हुए, उसकी योजना के मुताबिक उसके भक्तजन अपनी पूरी कोशिश लगा देते हैं कि किस तरह इन गरीबों को और तकलीफ दी जाए, लूटा जाए। देश के कई हिस्सों में ऐसे गरीबों की किडनी निकालकर बेच देने के मामले में सामने आए, कहीं उनका खून निकालकर कोई डॉक्टर बेच देता है तो कहीं बदन का कोई और हिस्सा।
छत्तीसगढ़ में जब यह गर्भाशय कांड हुआ और साबित हुआ कि हजारों महिलाओं के गर्भाशय उनकी भरी जवानी में निकालकर फेंक दिए गए, तो भी सरकार ढीली-ढाली रही। सरकार के एक ताकतवर बड़े आदमी का यह कहना था कि अगर कड़ी कार्रवाई की गई तो इस छोटे से राज्य के सैकड़ों डॉक्टर जेल में रहेंगे। अब सवाल यह उठता है कि ऐसे डॉक्टरों को बचाकर या अस्पताल के दूसरे भ्रष्टाचार में शामिल ऐसे कर्मचारियों को बचाकर सरकार किसका भला कर रही है, जिनकी वजह से गरीब मां को नाली के किनारे बच्चे को जन्म देना पड़ता है?
आज अगर ताकतवर तबके के लोग गरीबों के साथ भ्रष्टाचार की ज्यादती करते हैं, और उनके मामलों की सुनवाई भी दस-बीस, पचीस बरस तक चलती है, तो कोई गरीब ऐसी लंबी सुनवाई नहीं झेल सकते। इसलिए इस देश में अगर फास्ट ट्रैक कोर्ट की जरूरत है, तो दलित-आदिवासी की तरह, महिलाओं की तरह, गरीबों के लिए अलग अदालत होनी चाहिए। जिस तरह एक गैरदलित-आदिवासी अगर दलित-आदिवासी पर हिंसा करते हैं, तो उसकी तेज रफ्तार सुनवाई अलग अदालत में होती है, उसी तरह गरीब से भ्रष्टाचार करने वाले गैरगरीब को तेजी से सजा मिलनी चाहिए।
इसी सोच को एक और पहलू तक बढ़ाने की जरूरत है। गरीबों के खिलाफ भ्रष्टाचार में भी जहां पर इलाज या अनाज से जुड़ा हुआ भ्रष्टाचार है, तो उस पर तेजी से सुनवाई, अधिक कड़ी सजा तो होनी ही चाहिए, किसी भी अदालती फैसले के पहले ऐसे मामलों में गरीब को तुरंत राहत का इंतजाम भी होना चाहिए। उसे उसके हक का अनाज या इलाज पाने के लिए अदालती कार्रवाई की राह देखने पर बेबस नहीं किया जाना चाहिए।
कुछ लोगों को यह लग सकता है कि जिस तरह आज कुछ मामलों में लोगों को शक होता है कि कोई महिला झूठी रिपोर्ट लिखाती है, कोई-कोई दलित -आदिवासी शायद कभी झूठी रिपोर्ट लिखाते हैं, उसी तरह हो सकता है कि कोई गरीब भी गैरगरीब के खिलाफ झूठी रिपोर्ट लिखाए। लेकिन सामाजिक न्याय की राह में ऐसे खतरे तो रहेंगे ही। एक महिला मुख्यमंत्री के राज में एक महिला को नाली के किनारे बच्चे को जन्म देना पड़े, तो यह जाहिर होता है कि इस मुख्यमंत्री जयललिता के खिलाफ अनुपातहीन संपत्ति का मामला अदालत तक क्यों पहुंचा होगा और वहां पर जयललिता कटघरे में क्यों है?
गरीबों के इलाज और अनाज के हक पर जब ताकतवर तबके इस तरह से डाका डालते हैं, और जब ऐसा काम नक्सल पहुंच के इलाकों से बाहर होता है, तो कुछ फिल्म और उपन्यास याद पड़ते हैं। इसी किस्म की शहरी ज्यादतियां से जूझने के लिए कुछ कहानियों में खबरदार शहरी नाम के कुछ ऐसे किरदार बनते हैं, जो कानून को हाथ में लेकर अदालत से पहले ही इंसाफ करने में जुट जाते हैं, क्योंकि अदालतें गरीब और अमीर के बीच ज्यादती की लड़ाई में कोई इंसाफ शायद ही कर पाती हैं।
जब डॉक्टरों के संगठित भ्रष्टाचार के मामले सामने आते हैं, तो लोग सड़क पर उनके फैसले की बात करने लगते हैं। लोगों के बीच यह चर्चा होती है कि कुछ मुस्लिम देशों की तरह चौराहों पर उन्हें टांग देना चाहिए। मैं किसी को भी टांगने के खिलाफ हूं, लेकिन लोगों की सोच हिंसक हो जाने को समझ सकता हूं, और मेरे पास भारत के आज के लोकतंत्र में इस सोच को ठंडा करने के लिए पानी की कोई बोतल नहीं है।
हिंदुस्तानी सचमुच ही बहुत ठंडे मिजाज के लोग होते हैं...

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