कत्ल के ठेके के पीछे स्वामी

संपादकीय
3 अप्रैल 2013
दिल्ली के एक बड़े कारोबारी, और बसपा की टिकट पर लोकसभा का चुनाव लडऩे वाले दिल्ली के सबसे रईस अरबपति की सुपारी-हत्या करवाने के मामले में उत्तर-भारत के एक किसी आध्यात्मिक गुरू या स्वामी का नाम आ रहा है। जमीन के झगड़े में एक-दो करोड़ रुपये में उसने भाड़े के हत्यारों से यह काम करवाया। दूसरी तरफ कुछ महीने पहले उत्तर-भारत के सबसे बड़े शराब कारोबारी और खरबपति पोंटी चड्ढा के कत्ल में उत्तराखंड का अल्पसंख्यक आयोग का अध्यक्ष गिरफ्तार हुआ और उसे अदालत में हत्या का जुर्म झेलना पड़ रहा है। 
अल्पसंख्यक आयोग धर्मों के आधार पर बनता है और उसकी संवैधानिक कुर्सी पर अल्पसंख्यक धर्म के लोग बैठते हैं। भारत में कई बार धर्मों से जुड़े हुए लोग उन पर होने वाली किसी कार्रवाई को लेकर धर्म की आड़ लेते हैं, दूसरे किस्म के मुजरिम अपने-आपको किसी धर्म का होने की वजह से भेदभाव का शिकार बताते हैं, और आध्यात्म या योग की ऊंची गद्दियों पर बैठे हुए बड़े-बड़े लोग अपने सारे जुर्मों को अपने चोगों के पीछे छुपाने के फेर में आखिर तक रहते हैं। और मजे की बात यह कि ऐसे मुजरिमों को बचाने के लिए सत्ता पर काबिज लोगों से लेकर जजों तक की कतार लग जाती है, कारोबार की दुनिया के मुजरिम तो धर्म और आध्यात्म के रास्ते अपने कालेधन को सफेद करने का काम हमेशा से करते ही आए हैं। 
हम छत्तीसगढ़ में ही देखते हैं कि किस तरह सत्ता की दलाली करने वाले गुरू के सामने सत्ता के लोग बिछे रहते हैं। नेता-अफसरों के अलावा जजों से लेकर मुजरिमों तक को रेलवे प्लेटफार्मों से लेकर दूसरी जगहों तक ऐसे धार्मिक या आध्यात्मिक गुरूओं के सामने माहौल बनाते देखा जाता है। बिना सुबूत बहुत सी बातें नहीं छापी जा सकतीं, लेकिन लोगों की जानकारी में ऐसी बात रहती है कि ऐसे लोगों के आश्रमों में कारोबार के मुजरिमों से लेकर हत्यारों तक के साथ सौदेबाजी करवाई जाती है, अदालतों से लेकर सरकारों तक की मेहरबानी जुटाई जाती है। इसलिए जब-जब देश या दुनिया में कहीं भी धर्म और आध्यात्म से जुड़े हुए लोगों के जुर्म सामने आते हैं, तो हमको लगता है कि शायद अब लोगों की आंखें कुछ खुलेंगी। लेकिन सरकारों में बैठे लोग सरकारी स्तर पर भी इसी में लगे रहते हैं कि किस तरह ऐसे लोगों को बढ़ावा देकर उनसे अपने वोटरों पर असर डलवाया जा सके। और जब तक हिंदुस्तान में वोटर इतने बेवकूफ बने रहेंगे, तब तक धर्म और आध्यात्म की दुकानों पर नेताओं के डेरे लगे रहेंगे। 
आज भारत में कहीं भी धर्म और आध्यात्म से जुड़े हुए ऐसे लोगों के खिलाफ कोई भी कार्रवाई आसान नहीं होती। ऐसे मुजरिमों को बचाने के लिए सत्ता के लोगों से लेकर जजों तक का दबाव छोटे-छोटे पुलिसवालों पर इस कदर पड़ता है कि वे ईमानदारी से जांच नहीं कर पाते। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। लेकिन इसके लिए धर्म को बढ़ावा देने पर सरकारी पैसे का खर्च भी खत्म करना पड़ेगा, सार्वजनिक जगहों पर धर्म के अवैध कब्जे खत्म करने पड़ेंगे। आज कहीं पर एक शंकराचार्य कत्ल के मामले में गिरफ्तार चल रहा है, तो अनगिनत धर्म-गुरू सेक्स के मामलों में फंसे हुए हैं, और उनकी हरकतों को देखने के लिए इंटरनेट पर यू-ट्यूब पर जाना ही काफी होता है। लोगों की आंखें ऐसे स्वामियों की तरफ से खुलनी चाहिए। 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें