जालसाज पेंटिंग नहीं खरीदते, पेंटर सीएम को खरीदते हैं...


संपादकीय
25 अप्रैल 2013
पश्चिम बंगाल में सैकड़ों या हजारों करोड़ का जो चिट फंड घोटाला सामने आया है, उसने ममता बैनर्जी को अपने साथियों सहित कटघरे में खड़ा कर दिया है। अदालती कटघरा न सही, जनता की अदालत में तो ये सब शक के दायरे में आ ही गए हैं। बरसों से जालसाजी के पूरे अंदाज में चिट फंड के नाम पर लाखों गरीबों की जमा रकम लूटते आ रहे एक जालसाज ने जब मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी की बनाई एक पेंटिंग एक करोड़ छियासी लाख रूपए में खरीदी, तब भी किसी समझदार और ईमानदार मुख्यमंत्री की आंखें खुल जानी थीं। इसके बाद इस कंपनी के खिलाफ सेबी जैसी राष्ट्रीय एजेंसी ने राज्य सरकार को सावधान किया था, उसके बाद भी किस तरह ममता की पार्टी तृणमूल कांग्रेस की अभिनेत्री सांसद इस जालसाज चिट फंड कंपनी के इश्तहारों में आकर उसे बढ़ावा देती रही, खुद ममता के बारे में खबर यह है कि इस चिट फंड कंपनी के दो अखबारों का पिछले बरस उद्घाटन उन्होंने किया था। 
अभी हम इस जालसाज की उस लंबी चि_ी को सुबूत नहीं मान रहे जिसमें उसने सीबीआई को यह लिखा है कि किस तरह तृणमूल कांग्रेस का एक सांसद सोलह लाख रूपए महीने इस कंपनी से पाता था, और कांग्रेस या तृणमूल कांग्रेस के और लोग मिलाकर हर महीने कोई पौन करोड़ रूपए इससे पाते थे। इस जालसाज ने जो लिखा है, उसके मुताबिक तो तृणमूल कांग्रेस का सांसद इस कंपनी को ब्लैकमेल कर रहा था। इसी चि_ी की एक दूसरी बात देश के आज के अखबारों में कहीं छपी है, और कहीं नहीं छपी है। इस जालसाज ने किसी एक संदिग्ध सौदे को करवाने के एवज में चेन्नई की एक महिला वकील चिदंबरम का नाम भी कई जगह लिखा है और उसे करोड़ों रूपए देने की बात भी कही है। उसने प्रणब मुखर्जी के करीबी होने का दावा करने वाले लोगों का नाम भी लिखा है, और उनको भी लंबे-चौड़े पैसे देने की बात कही है। 
ममता बैनर्जी से शुरू करके हम बात को सत्ता और जालसाजों के संबंधों पर ले जाना चाहते हैं। आज देश में सेबी से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक जो कंपनी सबसे बड़े मामले में उलझी हुई है, उस सहारा की बात करें, तो उसके चर्चित मालिक के साथ देश के बड़े-बड़े लोग उसकी दावतों में दिखते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने दो-चार दिन पहले ही इस कंपनी को फटकार लगाते हुए कहा है कि वह अदालत का बेजा इस्तेमाल कर रही है। इस कंपनी पर जो आरोप लगे हैं, और जो विरोधियों ने नहीं, सेबी जैसी संस्था ने लगाए हैं, उनके मुताबिक, और सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक यह कंपनी हजारों करोड़ जमा करने वालों के नाम नहीं बता रही है। यह पूरा सिलसिला शक से भरा हुआ है, और देश की सबसे बड़ी अदालत का आदेश भी इस कंपनी से न वसूली कर पा रहा है, और न ही जानकारी निकाल पा रहा है। ऐसे में वे सैकड़ों तस्वीरें याद पड़ती हैं जिनको सहारा के मालिक अपनी दावतों में आए हुए सत्ता पर काबिज लोगों के साथ खिंचवाते हैं, और पूरे-पूरे पन्ने के इश्तहारों में छपवाते हैं। 
अब एक तरफ देश की सबसे बड़ी अदालत, दूसरा शेयर बाजार को नियंत्रित करने वाली सेबी नाम की संस्था, और तीसरा देश-प्रदेशों की सत्ता, इनमें से अगर किसी को भी जालसाजों से, शक से घिरे हुए लोगों से परहेज नहीं होगा, तो जनता के पैसे इसी तरह डूबते रहेंगे। भारतीय लोकतंत्र में अब यह सामने आ रहा है कि जनता के पैसे उगाहने वाली कंपनियां किस तरह टीवी और अखबार निकालकर अपना एक दबदबा कायम करती हैं, और उसके साथ-साथ सत्ता को रिश्वत देकर, सितारों से अपने इश्तहार करवाकर, किस तरह जनता की आंखों में धूल झोंकते हैं, और बुलबुले के फूट जाने तक वे उसकी सतह पर तैरते और चमकते रंगों की तारीफ खरीदे हुए मीडिया में करवाते चलते हैं। 
जनता से एकदम समझदारी की उम्मीद नहीं की जा सकती। और सरकारों, संवैधानिक संस्थाओं, और लोकतंत्र का स्तंभ होने का दावा करने वाले मीडिया की यह जवाबदेही है कि शक से भरे हुए जालसाजी के कारोबारों का भांडाफोड़ समय रहते क्यों नहीं होता? और क्यों देश के सबसे महंगे वकीलों के सहारे धोखेबाज और जालसाज लोग सुप्रीम कोर्ट तक को बेबस बनाकर चलते हैं। 
बंगाल का यह मामला न अपने किस्म का पहला है, और न आखिरी। गरीब बंगाली की जमा पूंजी जिस तरह सत्ता के पसंदीदा जालसाज, उसकी रहमतले लूट रहे हैं, यह देखने लायक है। सार्वजनिक जीवन का तकाजा तो यह है कि ऐसे जालसाजों से जिन लोगों ने भी फायदा लिया है, और फिर वे चाहे सत्ता में रहे हों या विपक्ष की राजनीति में रहे हों, उनको विदा किया जाना चाहिए। ममता बैनर्जी को पौने दो करोड़ से अधिक एक पेंटिंग के लिए जब मिले, तब पार्टी अध्यक्ष का दिमाग ठनका हो या न ठनका हो, एक मुख्यमंत्री के मन तो सवाल उठना ही चाहिए था कि इतना दान देने वाले की नीयत क्या है? 

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