मां का क्या हुआ?


संपादकीय
14 अप्रैल 2013
भारतीय जनता पार्टी के पिछले राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी कल टीवी पर एक बयान देते दिखे- मैं मर्द का बच्चा हूं, जो काम करना रहता है वह सामने से करता हूं, पीछे से नहीं करता। 
इसके साथ-साथ उन्होंने यूपीए सरकार को गिराने की किसी साजिश के बारे में भी कोई बात कही थी, जिसे लेकर आज उन्होंने उसका खंडन भी जारी किया है कि उन्होंने वैसा नहीं कहा था। अब उनसे यूपीए सरकार के किसी बड़े नेता ने सरकार को गिराने के बारे में मदद मांगी थी, या नहीं मांगी थी, गडकरी ने मीडिया के सामने वैसा कहा था, या नहीं कहा था, हम उस पर नहीं जा रहे। राजनीति में रोजाना ऐसे बयान आते हैं, और उनका कई बार खंडन भी होता है। इसलिए यह बात अधिक मायने नहीं रखती। हम गडकरी की उस बात पर आज यहां चर्चा कर रहे हैं जिसका कि उन्होंने खंडन नहीं किया है, और जिसे हमने टीवी पर देखा और सुना है। यह पहली बार नहीं है कि गडकरी ने मर्द या मर्दानगी की बात कही हो। वे पहली भी कई बार ऐसा कह चुके हैं और अपनी कंपनियों को लेकर जब उन्हें पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष पद छोडऩा पड़ा, तब भी उन्होंने अपनी मर्दानगी और मर्द का बच्चा होने को लेकर कुछ बयान दिए थे। आज उसी पर बात होनी चाहिए। 
हम यह सोच रहे हैं कि कोई भी बच्चे जब पैदा होते हैं, तो वे अनिवार्य रूप से मां से पैदा होते हैं। मां उन्हें नौ महीने पेट में रखती है, और फिर इससे शायद दुगुने समय तक अपने सीने पर रखती है, कई बार खुद भूखे रहकर भी बच्चे को दूध पिलाती है। दुनियाभर की दिक्कतें झेलकर मां बच्चे को बड़ा करती है। ऐसे में जब कोई यह कहे कि वह मर्द का बच्चा है, तो हमारे जैसे मातावादी लोगों के सीने पर लात सी पड़ती है, कि उस मां का क्या ऐसे बच्चों के पैदा होने में कोई योगदान ही नहीं रहा? सच तो यह है कि बच्चे मां के ही होते हैं। 
भारत की राजनीति में एक महिला के अपमान का कोई मौका नहीं छोड़ा जाता। जिस अरविंद केजरीवाल को भारत का एक तबका आज नेता मानता है, उसने अपनी पार्टी का नाम आम आदमी पार्टी रखा है। मतलब यह कि भारत की करीब आधी आबादी से उस पार्टी के नाम को तो काट ही दिया गया है। जब कभी सत्ता में बैठे हुए कोई लोग कायर साबित होते हैं, या किसी को कायर साबित करना होता है, तो लोग उन्हें ले जाकर चूडिय़ां भेंट करते हैं। मानो चूडिय़ां कायरता का एक प्रतीक हो। और यह काम उस कांग्रेस के लोग भी करते हैं, जिसकी मुखिया इंदिरा गांधी को अटल बिहारी बाजपेयी तक ने दुर्गा कहा था, और जिसे बांग्लादेश बनवाने वाली साहसी महिला माना जाता था, परमाणु परीक्षण करवाने वाली महिला माना जाता था। इसी तरह उस भाजपा के लोग चूडिय़ों को कायरता के प्रतीक के रूप में ले जाकर अफसरों को भेंट करते हैं, जो भाजपा भारतमाता की तस्वीर की पूजा करती है, जो कि  विजयाराजे सिंधिया जैसी नेता की पार्टी रही है। इन दोनों पार्टियों की महिलाएं भी प्रदर्शन करते हुए ले जाकर चूडिय़ां भेंट करने में पीछे नहीं रहतीं। 
इस देश की अदालतों में कानून में नागरिक के लिए पुरूष का शब्द ही इस्तेमाल किया जाता है, जिससे कि समाज का, अदालत का, और कानून बनाने वालों का रूख पता लगता है। हम पहले भी कई बार लिख चुके हैं कि किस तरह लाल किले से स्वतंत्रता दिवस का भाषण देते हुए भारत के प्रधानमंत्री दस-दस बार आम आदमी की चर्चा करते हैं, मानो आम औरत का कोई दुख-दर्द ही नहीं है, उसकी कोई हस्ती ही नहीं है। जबकि चिकित्सा विज्ञान की हकीकत यह कहती है कि आम औरत के भीतर तो आम आदमी हो सकते हैं, औरत के भीतर ही होते हैं, आम औरत कभी आम आदमी के भीतर नहीं होती। लेकिन सोच और भाषा की यह नाइंसाफी हिंसा की हद तक फैली हुई है, और इसका कोई अंत नहीं दिखता है। 
गडकरी और उनके जैसे दूसरे लोग जब अपने आपको मर्द का बच्चा करार देते हैं, तो उनसे अगली बार मौका मिलते ही मीडिया को यह सवाल करना चाहिए कि वे अपनी मां को क्यों अनदेखा कर रहे हैं, जिसने कि नौ महीने उन्हें पेट में रखा। 

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