संपादकीय
12 अप्रैल 2013
छत्तीसगढ़ में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की सुनवाई चल रही है। इसमें पुलिस और बाकी सुरक्षा दस्तों की ज्यादतियों की शिकायतें तो हैं हीं, एक बड़ी शिकायत इस बार डॉक्टरों के खिलाफ है जिन्होंने जवान महिलाओं के गर्भाशय निकालकर फेंक दिए थे क्योंकि बीमा कंपनियों से इस ऑपरेशन का भुगतान मिलना था। केन्द्र और राज्य सरकारों ने गरीबों के इलाज के लिए बीमा योजना बनाई हैं, और उन योजनाओं को लूट लेने के लिए डॉक्टरों के पेशे में लगे हुए लोग, अस्पताल चलाने वाले लोग एक बहुत संगठित साजिश और जुर्म के तहत छत्तीसगढ़ में यह भयानक हैवानियत करते रहे, और सरकार इनके साथ नर्मदिली दिखाई है। सरकार के कुछ लोगों का यह मानना है कि अगर कड़ाई से डॉक्टरों पर कार्रवाई की जाएगी, तो बीमा-दावा लूटने के लिए गैरजरूरी चीरफाड़ करने वाले सैकड़ों डॉक्टर जेल में होंगे, और उनके बिना हजारों मरीज और मर जाएंगे।
मानवाधिकार आयोग के किए इस राज्य में कुछ होगा या नहीं, यह तो पता नहीं, लेकिन इस मामले में तो मानवाधिकार आयोग के बिना ही राज्य सरकार को एक ऐसी कड़ी कार्रवाई करनी थी कि जो मिसाल की तरह डॉक्टरों की जमात की अगली पीढ़ी को भी याद रहती, और उनकी हैवानियत थम जाती। आज हालत यह है कि जिनके पास पैसा है, जिनके सत्ता पर पहुंच है, ऐसे सारे लोगों ने अनपढ़ और गरीब महिलाओं के गर्भाशय बेच खाए, और उनके खिलाफ मामले इतने कमजोर बने हैं, कि वे सब आज फिर अपने धंधों से लगे हुए हैं। राज्य सरकार ने इस मामले में जो नरमी दिखाई है, हम यह उम्मीद करते हैं कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग उसे समझ सकें और अपनी सख्ती से राज्य सरकार को सख्त कार्रवाई के लिए मजबूर कर सके।
दूसरी बात यह कि बस्तर से नक्सल मोर्चे में घिरे हुए गरीब और बेजुबान आदिवासियों पर तरह-तरह के वर्दीधारी जुल्म की बात हमेशा से सामने आती है। और यह बात सिर्फ बस्तर की नहीं है, सिर्फ पुलिस की नहीं है। दो दिन पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने यह कहा कि देश के जिन हिस्सों में सेना तैनात है, उन हिस्सों में सेना देश के नागरिकों को ही मार रही है। उसकी तैनाती होती तो है विदेशी और घरेलू हमलों को रोकने के लिए, लेकिन उसकी गोलियों का शिकार आमतौर पर हमेशा ही हिन्दुस्तानी ही होते हैं, आम नागरिक होते हैं। यह तो गनीमत है कि नक्सल मोर्चे पर सेना की मांग करने वाले कुछ उत्साही तबकों की मांग को छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने सिरे से ही खारिज किया है, वर्ना सेना के काम करने के अंदाज के चलते और भी कई किस्म के जुल्म और जुर्म बस्तर में हुए रहते। फिलहाल वहां से जो आरोप निकलकर आते हैं, उन पर मानवाधिकार आयोग को इस दौरे से परे भी कड़ी जांच करनी चाहिए, और सही कार्रवाई करनी चाहिए। ऐसी कार्रवाई खुद राज्य सरकार के भले की होगी, क्योंकि राजधानी में बैठी सरकार जंगलों में तैनात अपने खुद के लोगों पर अगर काबू नहीं रख पाती है, तो उनमें से जो लोग जुल्म और जुर्म करते हैं, उन पर जांच और कार्रवाई होनी ही चाहिए। अपनी ही वर्दी पहनाकर मुजरिमों को तैनात करने वाली सरकार संविधान के खिलाफ काम करती ही है, आगे के लिए भी वह एक बड़ा खतरा खड़ा करती है। इसलिए इस आयोग के दौरे में, सुनवाई में और जांच में अगर कुछ वजन है, तो उसका दबाव राज्य सरकार पर पडऩा चाहिए, जो कि राजनीतिक कारणों से अपने मातहत किसी गलत कार्रवाई से हमेशा ही मुकरते रहेगी। यह बात सिर्फ इसी सरकार के साथ, सिर्फ इसी राज्य में नहीं है। पूरी दुनिया में सरकारें अपनी वर्दियों को अधिक से अधिक दूरी तक बचाते चलती हैं। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए, क्योंकि पंजाब में आतंक के खिलाफ पुलिस ने जिन ज्यादतियों के साथ कार्रवाई की थी, वो अंदाज आज के जमाने में नहीं चल सकता। आज सरकारों को अधिक जिम्मेदार, अधिक पारदर्शी, अधिक जवाबदेह और अधिक मानवीय होने की जरूरत है। अब छोटी-छोटी सी पिटाई भी वीडियो-कैद हो जाती है, और सरकारें उनसे पहले की तरह मुकर नहीं सकतीं। इसलिए मानवाधिकार के मुद्दे पर सरकार को अपने अमले को अधिक संवेदनशील बनाना होगा। इस आयोग की इस सुनवाई को सरकार को एक आईने की तरह लेना चाहिए, और अपनी कमजोरियों को देखना चाहिए। इनको अनदेखा करके सरकारों का हाल वही होता है जो कैंसर के एक मरीज का होता है जो कि अपने भीतर के ट्यूमर को अनदेखा करते चलता है। सरकारी वर्दियों की हिंसा के दिन अब पहले की तरह नहीं चल सकते। अब जनता, मीडिया, जनसंगठन, अदालतें, इन सब की जागरूकता और सक्रियता का एक नया दौर शुरू हो चुका है। और इसके हिसाब से सरकारों को अपना पुराना तानाशाह रवैया छोडऩा चाहिए, वर्ना एक वीडियो रिकॉर्डिंग बहुत से लोगों को जेल भेजने के लिए काफी होगी।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें