स्याहीसोख्ते को कुछ सूखा भी रखें


22 अप्रैल 2013
आज के कॉलम की यह सुर्खी उन लोगों को कुछ मुश्किल से समझ आएगी, जिन्होंने अपने बचपन की शुरूआत डॉटपेन जैसी कलम से की है। जिन लोगों ने स्याही भरने वाली कलम का इस्तेमाल भी किया हो, उनको भी आमतौर पर स्याहीसोख्ते की जरूरत नहीं पड़ती रही होगी। इसका चलन और इसकी जरूरत उस समय की बात है जब कलम को स्याही की दवात में डुबा-डुबाकर लिखा जाता था, और एक बार की स्याही से कुछ शब्द ही कागज पर दर्ज हो पाते थे। उस वक्त कलम की निब पर लगने वाली स्याही पर काबू नहीं रहता था, इसलिए कुछ शब्द अधिक गीले रह जाते थे। इसी तरह वैसे कलम से किए गए दस्तखत गीले रह जाते थे, और उनका कानूनी दर्जा खत्म न हो जाए इसलिए वैसी कलम के साथ-साथ स्याहीसोख्ता भी इस्तेमाल होता था जो अधिक गीली लिखावट को सोख लेता था। 
अब इस भूली-बिसरी याद की जरूरत आज इसलिए पड़ी कि मैं बीच-बीच में कुछ घंटे खबरों से परे रहने की नौबत से गुजरता हूं, तो एक फर्क सा लगता है। और इस फर्क को सोचने की कोशिश करते हुए, समझने की कोशिश करते हुए स्याहीसोख्ते की मिसाल सूझी। 
आज का वक्त अनगिनत अच्छे और बुरे अखबारों का है, टीवी की खबरों और इंटरनेट का है, एसएमएस पर मिलते खबरों के बुलेटिन का है, और पल-पल पहुंचती ईमेल-खबरों का भी है। नतीजा यह है कि सूचना का बोझ इतना अधिक है कि दिमाग का हाल कुछ बेहाल सा हो जाता है। रात तक तन चाहे जितना थके, या न थके, मन तो बुरी तरह थक चुका होता है, खासकर उन लोगों का जो अपने पेशे या दिलचस्पी से, चाहे या अनचाहे खबरों के सैलाब में सराबोर रहते हैं। अंगे्रजी में इसके लिए एक शब्द इस्तेमाल होता है, इनफरमेशन-ओवरलोड।
किसी कागज पर से गीली स्याही को अगर हटाना हो तो स्याहीसोख्ते (ब्लॉटिंग पेपर) का इस्तेमाल होता है। लेकिन अगर यह स्याहीसोख्ता ही अगर पहले से नमी से लबालब हो, तो वह और गीलेपन को कैसे सोखेगा? कुछ इसी तरह का हाल दिल और दिमाग का रहता है। कहने को तो इंसान का दिमाग दुनिया के सबसे तेज और सबसे बड़े कम्प्यूटर के मुकाबले भी अधिक तेज और अधिक क्षमता का होता है, लेकिन हकीकत यह है कि किसी भी कम्प्यूटर पर जब पन्ने जरूरत से अधिक खुले होते हैं, हर पन्ने पर कुछ न कुछ काम चलते रहता है, जब उस कम्प्यूटर पर जानकारी एक सीमा से अधिक दर्ज रहती है, तो वह कम्प्यूटर भी जवाब देने लगता है। कभी ऐसा कम्प्यूटर टंग जाने (हैंग) लगता है, तो कभी पूरा चूर-चूर (क्रैश) हो जाता है। अगर हमारे दिल-दिमाग में दर्ज और घूम रही बातों का सैलाब समंदर के नमकीन पानी और रेत को हर कुछ पल में आंखों में झोंक रहा है, तो उन आंखों से बहुत दूर तक दिखना भी बंद हो जाता है, और आसपास का अंदाज लगना भी गड़बड़ा जाता है।
ऐसी नौबत से बचने का एक ही जरिया है, और यह भी हो सकता है कि मेरे जैसे लोग बहुत अधिक न हों, जो कि पल-पल दुनिया की नब्ज पर हाथ रखने पर भरोसा रखते हों। लेकिन जो लोग भी अपने दिल-दिमाग के स्याहीसोख्ते को गैरजरूरी नमी से भिगाकर रखते हैं, उनको यह खतरा समझना चाहिए कि उनका ध्यान, उनकी सोच, उनके नतीजे, और उनकी प्रतिक्रिया, ये सबके सब तब मंदे पड़ जाते हैं, जब उनमें नई बातों को सोखने की क्षमता नहीं बचती। इसलिए आज के सूचना-ओवरलोड के वक्त में ठंडे दिल-दिमाग से कुछ सोचने के लिए यह जरूरी है कि दिन का कुछ वक्त  फोन, टीवी, इंटरनेट, और मेरी तरह के अधिक बोलने वाले दोस्तों से परे भी गुजारा जाए। ऐसा वक्त कुछ सोचने का मौका भी देगा, और समझने का भी। और ऐसा मौका टीवी-इंटरनेट के चलते हुए मुमकिन नहीं हो सकता। 
एक वक्त टीवी को बुद्धू बक्सा कहा गया था। अब अनगिनत चैनलों के साथ इस ईडियट बॉक्स की ताकत और अधिक बढ़ गई है। अब उसने दिमाग को पूरी तरह कुंद कर देने, और फिर मंद कर देने की ताकत हासिल कर ली है। और अब उसका फोन और इंटरनेट से इसी काम में तगड़ा मुकाबला चल रहा है। 
एक वक्त बड़े बुजुर्ग कहा करते थे कि अच्छी जिंदगी के लिए मोटा खाओ और मोटा पहनो। मोटा कपड़ा सस्ता भी होता था, और टिकाऊ भी। इसी तरह मोटा अनाज सेहत के लिए बेहतर हुआ करता था, आज भी बेहतर रहता है, यह एक और बात है कि उसे अब गरीबी और फटेहाली की बेबसी मान लिया गया है, और पैसे वाले लोग बारीक से बारीक अनाज पसंद करने लगे हैं, जो कि सेहत के लिए चाहे अच्छे न हों। 
मोटा खाओ और मोटा पहनो की बात से यह भी आज लग रहा है कि लोगों को खबरों की मोटी-मोटी बातों तक पहुंचकर रूक जाना चाहिए। हर खबर के बारीक से बारीक खुलासे तक जाने की न तो जरूरत होती है, और न ही उतनी बारीक जानकारी किसी काम की होती है। आज दिमागी दीवालियापन लोगों को किसी एक बात की खबरों के बीच इस कदर घेर देता है, कि दुनिया की दूसरी जरूरी बातें धरी रह जाती हैं, जिनको टीवी की खबरें अपना धंधा चलाने के लिए फायदे की नहीं पातीं। 
कुल मिलाकर इस पल मैं यही सोच रहा हूं कि किस तरह दिन के कुछ घंटे अगर खबरों के, इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल सैलाब के हमलों से आजाद रहें, तो जिंदगी कितनी सेहतमंद हो सकती है? और इसके लिए जरूरी है कि अपने तन-मन के स्याहीसोख्ते को कुछ सूखा भी रखा जाए।

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