संपादकीय
20 अप्रैल 2013
दिल्ली में हुए एक बलात्कार के बाद देश में आज लोग फिर बहुत तकलीफ में हैं। पांच बरस की बच्ची से पड़ोस के नौजवान ने कई बार बलात्कार किया और उसके शरीर में बोतल भीतर भरकर मरने के लिए छोड़ दिया। यह भयानक खबर दिल्ली की होने से मीडिया पर छाई हुई भी है, और जिस किस्म की दिल दहलाने वाली जानकारियां इस बच्ची के साथ हुए जुल्म को लेकर आ रही हैं, उससे भी पूरे देश के लोग हिल गए हैं। हम इस पर जाना नहीं चाहते कि दिल्ली की वारदात देश के बाकी इलाकों की वारदातों के मुकाबले खबरों में अधिक जगह पाती है, और सरकार उससे अधिक हिलती है, जरूरी यह है कि ऐसे मुद्दे के पहलुओं पर इस मौके पर बात हो।
कुछ लोगों ने दिल्ली के पुलिस कमिश्नर को इस मामले को लेकर हटाने की बात कही है। इसके बाद प्रदर्शन कर रही लड़कियों में से एक को पुलिस के एक मंझले अफसर ने अस्पताल में ही थप्पड़ें मारीं, और उसे निलंबित कर दिया गया। इस मामले में पुलिस पर यह भी एक आरोप लगा है कि उसने इस मामले को दबाने के लिए बच्ची के परिवार को कुछ रूपए देकर मुंह बंद रखने के लिए कहा। इसलिए हमारा यह मानना है कि पुलिस कमिश्नर से इस्तीफा दिल्ली की पिछले कुछ महीनों की वारदातों को लेकर भी मांगा जा रहा है, पुलिस कमिश्नर के पिछले बर्ताव को लेकर भी मांगा जा रहा है, और उन्होंने पिछले एक-दो बरस में जैसी बेरहमी के बयान दिए थे, उनको लेकर भी मांगा जा रहा है। लेकिन हम इस मौके पर दिल के साथ-साथ दिमाग की भी कुछ बातें करना चाहते हैं।
पुलिस कमिश्नर को हटाने के मौके पहले तो आए थे, जब उनके बेदिमागी के बयान आए थे। लेकिन आज के बलात्कार के इस मामले को देखें, तो उसका विश्लेषण करने की जरूरत है कि ऐसे जुर्म कितने रोकने लायक होते हैं, पुलिस उनमें क्या कर सकती है, और पुलिस की किस दर्जे की लापरवाही की जिम्मेदारी किस दर्जे के अफसर तक जाकर थमनी चाहिए। आखिर कुसूर को किसी न किसी जगह पर ले जाकर तो तय करना ही होगा, वरना इस देश के प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति तो हर बात के लिए जिम्मेदार हैं ही, ऐसे हर मामले में उन्हीं से इस्तीफा मांगना चाहिए, या फिर किसी राज्य की घटना को लेकर मुख्यमंत्री या राज्यपाल से सीधे इस्तीफा मांगना चाहिए। लेकिन कोई व्यवस्था तैश से तय नहीं हो सकती, उसके लिए एक न्यायसंगत, तर्कसंगत और संतुलित तरीका होना चाहिए। इस मामले में पड़ोस के नौजवान ने एक बच्ची से बलात्कार किया, जिसे पुलिस ने एक या दो दिन में गिरफ्तार कर लिया। इसके पहले पुलिस ने इस बच्ची के गुम होने की रिपोर्ट दर्ज करने में शायद कुछ घंटों या एक दिन की देरी की, उसकी जिम्मेदारी पुलिस स्टेशन से ऊपर ले जाना ठीक नहीं है। इस बात की जांच करने के बाद कुसूरवार मिलने पर वैसे थाना अफसर पर कार्रवाई होनी चाहिए। प्रदर्शन करती लड़की को जिस अफसर ने पीटा, उसे आनन-फानन निलंबित कर दिया गया। इसके बाद अब पुलिस पर और कौन सी कार्रवाई की जा सकती है? लेकिन ऐसे मौके पर इस वारदात को लेकर पुलिस कमिश्नर को हटाने का मतलब देश की आज की पूरी व्यवस्था की खामियों की हकीकत को अनदेखा करते हुए उसके नाम पर एक अफसर को हटाने से तो असली मर्ज बहस में ही नहीं आ पाएगा।
बलात्कार के बहुत से मामले पुलिस के रोके नहीं रूक सकते। जब तक परिवार और समाज में लड़की और महिला की जगह इज्जत और बराबरी के हक की नहीं होगी, जब तक इस देश की न्यायव्यवस्था में पुलिस से लेकर जज तक को महिलाओं के मुद्दों पर संवेदनशील नहीं बनाया जाएगा, जब तक न्यायव्यवस्था को कारगर नहीं बनाया जाएगा, तब तक किसी अफसर को हटाने या फांसी की सजा लाने की बातें सिवाय भावनाओं के कुछ नहीं रहेंगी, और इनसे असली खतरों की तरफ से ध्यान हट जाएगा। बीमारी की वजहों के इलाज को छोड़कर, बीमार के चेहरे पर पाउडर-लाली लगाने को इलाज समझने में यह देश माहिर है। असल मुद्दे पर टिके रहने से कुसूरवारों को दिक्कत हो सकती है, इसलिए वे लोग अपने ही कई तरह के मुखौटों से सतही वजहों को जिम्मेदार बताते हुए खुद बचे रहते हैं। भारतीय लोकतंत्र में सरकार, अदालत और संसद की खामियों, गैरजिम्मेदारियों पर गंभीर बात होने के बजाय, भारतीय समाज की गंभीर खामियों पर बात होने के बजाय, सड़कों की भीड़ एक अफसर या एक मंत्री का सिर मांगते हुए बीमारी की जड़ों को अनदेखा करती है। यह सिलसिला देश और समाज के लिए बहुत खतरनाक है। इस बच्ची से बलात्कार हो जाने तक उसमें सरकार या पुलिस की क्या खामी रही? समाज को भी सड़कों पर आने के साथ-साथ बैठकर ठंडे दिल से आईना देखना चाहिए, और अपने मर्जों का इलाज खुद भी ढूंढना चाहिए।
पिछले करीब आधे बरस में यह देश जब-जब बलात्कार को लेकर हिला है, उन तमाम मौकों पर निशाना सिर्फ सरकार पर रहा, चाहे वह उन सारे मामलों में लापरवाही के लिए जिम्मेदार रही हो, या फिर सरकार की नजरों से दूर ऐसे जुर्म सिर्फ दो लोगों के बीच हो गए हों, जिनको रोकना पुलिस के लिए मुमकिन न रहा हो। इसलिए रोके जा सकने वाले, और न रोके जा सकने वाले मामलों के बीच फर्क अगर यह समाज नहीं करेगा, तो फिर वर्दी को गाली देते हुए हर मामले के लिए उसे जिम्मेदार ठहरा देना लोकतंत्र में सबसे आसान है। लोगों की वर्दियां उतरती रहेंगी, लेकिन समाज के भीतर लड़कियों और महिलाओं के बदन पर से कपड़े भी शायद इसी रफ्तार से बलात्कारी उतारते रहेंगे।

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